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क्या आप भी शादी और पार्टियों में करते हैं भोजन? जान लीजिए Premanand Maharaj के विचार

प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि पहले जब गांवों में शादी या कोई बड़ा उत्सव होता था, तो भोजन सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं होता था.

क्या आप भी शादी और पार्टियों में करते हैं भोजन? जान लीजिए Premanand Maharaj के विचार
प्रेमानंद जी महाराज

Premanand Maharaj Ji: आजकल शादी हो, बर्थडे पार्टी हो या कोई बड़ा फंक्शन..हर जगह खाने का बुफे सिस्टम देखने को मिलता है. गांव से लेकर शहर तक में यह कल्चर तेजी से चल रहा है. इसमें कई लोग एक साथ प्लेट लेकर खाना खाते हैं और फिर उसी हाथ से बार-बार खाना निकालते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि खाने का यह तरीका हमारे लिए सही है या नहीं. इसका हमारी सोच, सेहत और व्यवहार पर क्या पड़ रहा है. इसी सवाल को लेकर वृंदावन के संत प्रेमानंद जी महाराज का एक वीडियो इंस्टाग्राम पेज bhajanmarg_official ने शेयर किया गया है. जानिए महाराज जी ने इसे लेकर क्या कहा.

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प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि पहले जब गांवों में शादी या कोई बड़ा उत्सव होता था, तो भोजन सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं होता था, बल्कि एक पवित्र प्रक्रिया मानी जाती थी. मेहमानों के पैर धुलवाए जाते थे, उन्हें साफ आसन पर बैठाया जाता था. भोजन पत्तल में परोसा जाता था और पूरा माहौल सादगी और सम्मान से भरा होता था. इस दौरान महिलाएं भजन या मंगल गीत गाया करती थीं. सब लोग पंक्ति में बैठकर, शांति से भोजन करते थे. उस समय खाने के साथ-साथ संस्कार भी परोसे जाते थे.

आज की पार्टी कल्चर में क्या बदल गया?

महाराज जी कहते हैं कि आज दावत का तरीका पूरी तरह बदल चुका है. अब एक ही जगह सब लोग खड़े होकर प्लेट लेकर खाते हैं. कोई एक ही चम्मच से बार-बार खाना निकाल रहा है, कोई उसी जूठे हाथ से खाना निकालता रहता है. उसी प्लेट में खा भी रहा है और उसी हाथ से दूसरी चीजें भी उठा रहा है. ऊपर से आजकल कई जगह शराब भी परोसी जाती है. अब खाने में न कोई शुद्धता और ना ही साफ-सफाई का ध्यान रखा जा रहा है. इससे सब जूठा होता जाता है और साथ ही हमारी बुद्धि भी अपवित्र होती जा रही है.

हमारे शरीर पर खाने के तरीके का असर

हम अक्सर सोचते हैं कि खाना बस पेट भरने के लिए है, लेकिन भारतीय परंपरा में माना गया है कि जैसा भोजन, वैसा मन होता है. अगर भोजन अशुद्ध तरीके से किया जाए, तो उसका असर हमारी सोच, फैसले और व्यवहार पर भी पड़ता है. प्रेमानंद जी महाराज इसे कलयुग का प्रभाव बताते हैं, जहां धीरे-धीरे हमारी धार्मिक और नैतिक आदतें कमजोर होती जा रही हैं. हम सुविधा और दिखावे के चक्कर में अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं.

क्या मॉर्डन होना गलत है?

यहां सवाल यह नहीं है कि मॉर्डन होना गलत है. सवाल यह है कि क्या आधुनिकता के नाम पर हम अच्छी चीजें छोड़ते जा रहे हैं. महाराज जी का संदेश यह नहीं है कि सब कुछ पुराना ही अपनाएं, बल्कि यह है कि पुरानी अच्छी आदतों को नई जिंदगी में भी जगह दें, ताकि शुद्धता बनी रहे और सिस्टम भी खराब न होने पाए.

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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