- अंतरिक्ष यात्रा के दौरान स्पेस कैप्सूल का अत्यधिक शोर मानसिक तनाव पैदा करता है और बातचीत में बाधा डालता है
- शुभांशु शुक्ला गगनयान मिशन के लिए शोर से बचाव की नई तकनीक और पर्सनल मैपिंग पर काम कर रहे हैं
- एक्टिव नॉइज कैंसलेशन तकनीक शोर कम करती है लेकिन जरूरी अलार्म और आवाजें छुपाने का खतरा रहता है
अक्सर फिल्मों में अंतरिक्ष को एकदम शांत दिखाया जाता है, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट और काफी खतरनाक है. भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन और अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला ने हाल ही में अंतरिक्ष यात्रा के एक ऐसे पहलू से पर्दा उठाया है, जो किसी भी मिशन की सफलता और क्रू की जान के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है और वह है 'स्पेस कैप्सूल का शोर'. शुभांशु इन दिनों एक खास तकनीकी पर भी काम कर रहे हैं, जिससे गगनयान के एस्ट्रोनॉट को काफी मदद मिल सकती है.
स्पेस कैप्सूल का शोर सबसे बड़ी चुनौती
शुभांशु शुक्ला ने बताया कि रॉकेट के लॉन्च और पृथ्वी के वायुमंडल में दोबारा एंट्री के दौरान शोर का स्तर इतना भयावह होता है कि वह न केवल मानसिक तनाव पैदा करता है, बल्कि आपस में बातचीत को भी पूरी तरह दबा देता है. इस शोर के चक्रव्यूह से निकलने के लिए अब वे एक ऐसी तकनीक और पर्सनल मैपिंग पर काम कर रहे हैं, जो गगनयान मिशन के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है.
कौन सी तकनीक का किया जाता है इस्तेमाल?
इस समस्या से निपटने के लिए इंजीनियरों ने कई उपाय किए हैं, लेकिन यह एक बेहद जटिल काम है. शुभांशु शुक्ला ने बताया इसके कुछ समाधानों का भी जिक्र किया.
Space capsules are not quiet places. During launch & re-entry, noise levels can spike enough to stress crews—and even drown out communication entirely.
— Shubhanshu Shukla (@gagan_shux) March 17, 2026
Taming that chaos isn't just about comfort. It's about survival. #space #shubhanshushukla #shux #india #axiom4 pic.twitter.com/YmfkMC4NjM
- एक्टिव नॉइज कैंसलेशन (ANC): इस तकनीक का उपयोग शोर कम करने के लिए किया जाता है, लेकिन इसे बहुत अधिक फिल्टर नहीं किया जा सकता. ज्यादा फिल्टरिंग से जरूरी अलार्म या क्रू की आवाजें गायब होने का खतरा रहता है.
- कस्टम इयरपीस: 'क्रू ड्रैगन' जैसे आधुनिक यानों में अंतरिक्ष यात्री ऐसे इयरपीस पहनते हैं जो उनके कान के आकार के अनुसार लिक्विड का इस्तेमाल करके ढाले जाते हैं. इससे शोर से काफी हद तक राहत मिल जाती है.
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खास टेक्नोलॉजी की कर रहे टेस्टिंग
शुभांशु शुक्ला फिलहाल एक खास टेस्टिंग कर रहे हैं, जिसमें वह अलग-अलग फ्रीक्वेंसी पर अपनी सुनने की क्षमता की मैपिंग कर रहे हैं. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मिशन के सबसे कठिन चरणों यानी लॉन्च और लैंडिंग के दौरान, वह शोर के बावजूद हर जरूरी अलर्ट को आसानी से सुन सकें.
गगनयान के लिए भी जरूरी
शुभांशु शुक्ला ने हाल ही में Axiom-4 (Ax-4) मिशन के तहत इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) पर 18 दिन बिताए. वहां से लौटे उनके अनुभवों और इस तरह की तकनीकी बारीकियों का उपयोग भारतीय स्पेस एजेंसी ISRO अपने गगनयान मिशन के सिस्टम को और ज्यादा सुरक्षित और बेहतर बनाने के लिए कर रहा है.
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