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संगम के नीचे दबी मिली 5 किमी चौड़ी 'रहस्यमयी' नदी, साइंटिस्ट्स ने किया चौंका देने वाला दावा!

प्रयागराज के संगम पर अब तक हम सिर्फ गंगा-यमुना की अठखेलियां देखते थे, पर जमीन के 15 मीटर नीचे कुछ ऐसा मिला है जिसने विज्ञान और आस्था को एक मंच पर ला खड़ा किया है. क्या सदियों से 'अदृश्य' कही जाने वाली सरस्वती वाकई वहीं मौजूद है? वैज्ञानिकों की ड्रिलिंग और सर्वे में निकले इस 'पाताल लोक' के राज को जानकर आप भी दंग रह जाएंगे.

संगम के नीचे दबी मिली 5 किमी चौड़ी 'रहस्यमयी' नदी, साइंटिस्ट्स ने किया चौंका देने वाला दावा!
प्रयागराज में जमीन चीर कर निकली विशालकाय नदी, 5 किलोमीटर चौड़ी नदी देख उड़े होश!
AI

Prayagraj Sangam Mystery: प्रयागराज का संगम सिर्फ स्नान की जगह नहीं है, ये तो रहस्यों का 'पिटारा' निकला. हम बरसों से सुनते आए हैं कि यहां गंगा और यमुना के साथ सरस्वती जी भी मिलती हैं, पर वो दिखती नहीं थीं. अब हैदराबाद के NGRI (National Geophysical Research Institute) के उस्ताद वैज्ञानिकों ने जमीन के सीने में ड्रिल मारके ऐसी चीज खोज निकाली है, जिसने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है.

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जमीन के नीचे 5 किलोमीटर चौड़ा 'पाताल लोक' (Underground Paleo River Channel Discovered at Sangam)

वैज्ञानिकों ने हेलीकॉप्टर में सेंसर लगाकर आसमान से नीचे ताका-झांकी की, तो पता चला कि गंगा-यमुना के बीच जमीन के करीब 10-15 मीटर नीचे एक विशाल प्राचीन नदी (Paleo-river) सो रही है.

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Photo Credit: Photo: CSIR-NGRI

यह कोई छोटी-मोटी जलधारा नहीं है, बल्कि 4 से 5 किलोमीटर चौड़ी है. इसकी गहराई और रुतबा बिल्कुल वैसा ही है जैसा आज की गंगा और यमुना का है. डॉ. सुबाष चंद्रा की टीम ने तो बाकायदा बोरिंग करके इसका 'फिजिकल प्रूफ' भी निकाल लिया है.

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कानपुर तक फैली है ये प्राचीन जलधारा (Ancient River Spans 200 KM from Prayagraj to Kanpur)

शुरुआत में लगा कि ये सिर्फ 45 किलोमीटर लंबी है, लेकिन जब 'नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा' के साथ मिलकर जांच आगे बढ़ी, तो पता चला कि ये तो कानपुर तक करीब 200 किलोमीटर के दायरे में बिछी हुई है. मजेदार बात ये है कि ये नदी कोई पुरानी गंगा या यमुना का रास्ता नहीं है, बल्कि इसका अपना अलग ही मिजाज और वजूद है. संगम से 25 किलोमीटर पहले तक तो इसके निशान बिल्कुल साफ दिखे हैं, पर प्रयागराज की घनी आबादी की वजह से शहर के नीचे सर्वे करना थोड़ा पेचीदा हो गया था.

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आस्था और विज्ञान का बेजोड़ मेल (Scientific Basis for the Legend of Saraswati River)

इस खोज ने उन लोगों के मुंह पर ताला लगा दिया है, जो सरस्वती नदी को सिर्फ एक कोरी कल्पना मानते थे. इसकी लोकेशन और चौड़ाई पौराणिक कथाओं में बताए गए सरस्वती के वर्णन से हुबहू मेल खाती है. यह दबी हुई नदी आज भी पूरी तरह सूखी नहीं है. इसमें कहीं-कहीं पानी है जो जमीन के अंदर के वाटर लेवल को बनाए रखने में मदद कर रहा है. आने वाले वक्त में इसे 'रिचार्ज' करके क्षेत्र के सूखे की समस्या को भी जड़ से खत्म किया जा सकता है.

(डिस्क्लेमर: यह जानकारी सोशल मीडिया पर वायरल खबर के आधार पर दी गई है. NDTV इसकी पुष्टि नहीं करता.)

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