Trending Story: दुनिया के कई अमीर और विकसित देशों में रोजगार दर 72.1 प्रतिशत होने के बावजूद लोगों की असली कमाई बढ़ने के बजाय घट रही है. इसका खुलासा ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कॉरपोरेशन एंड डेवलपमेंट की एम्प्लॉयमेंट आउटलुक 2026 (OECD Employment Outlook 2026) की रिपोर्ट में हुआ है. ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, स्वीडन और डेनमार्क जैसे देश सैलरी ग्रोथ के मामले में सबसे पीछे छूट गए हैं.
5 साल में 6% कम हुई रियल वेज
इस ग्लोबल स्टडी में कुल 38 विकसित और हाई-इनकम वाले देशों को शामिल किया गया है, जिसमें न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, जापान, कनाडा, दक्षिण कोरिया, स्वीडन, डेनमार्क, इटली, स्पेन, फिनलैंड और नॉर्वे जैसी दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे बुरा हाल न्यूजीलैंड का हुआ है, जो 37 देशों की लिस्ट में सबसे आखिरी (37वें) पायदान पर आ गिरा है. यहां के कर्मचारियों की असल कमाई (Real Wages) पिछले साल के मुकाबले 1% और साल 2021 के मुकाबले सीधे 6% तक कम हो चुकी है. इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन, इटली और डेनमार्क जैसे बड़े देशों में भी लोगों की सैलरी 2021 के मुकाबले 2% से लेकर 6% तक नीचे गिर चुकी है.
आसान शब्दों में कहें तो लोग काम तो उतना ही कर रहे हैं, लेकिन उनकी जेब में आने वाले पैसे की वैल्यू कम हो गई है.
न्यूनतम मजदूरी सिर्फ 45 पैसे बढ़ी
इस संकट की सबसे बड़ी वजह महंगाई है. इन देशों में रोजमर्रा की चीजों के दाम इतनी तेजी से बढ़े हैं कि सैलरी की बढ़ोतरी उसके सामने टिक ही नहीं पाई. उदाहरण के लिए, न्यूजीलैंड की सरकार ने अप्रैल में न्यूनतम मजदूरी (Minimum Wage) में महज 45 सेंट (लगभग 45 पैसे) प्रति घंटे की मामूली बढ़ोतरी की, जिससे प्रति घंटा वेतन $23.95 (करीब 1339 रुपये) हुआ. लेकिन आसमान छूती महंगाई के सामने यह नाममात्र की बढ़ोतरी पूरी तरह हवा हो गई.
'सैलरी बढ़ाओ' बोलने में लग रहा डर
आर्थिक जानकारों का कहना है कि कोरोना महामारी के समय जहां कंपनियों को कर्मचारियों की भारी जरूरत थी, वहीं अब पासा पूरी तरह पलट चुका है. मंदी और कमजोर आर्थिक नीतियों के चलते कंपनियां अब बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की छंटनी कर रही हैं. बाजार में नौकरियों का संकट इतना गहरा गया है कि कर्मचारी अब अपने बॉस से सैलरी बढ़ाने की मांग करने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहे हैं. उन्हें डर सता रहा है कि वेतन मांगने के चक्कर में कहीं बची-कुची नौकरी भी हाथ से न चली जाए.
ग्लोबल जॉब मार्केट में आए ये 5 बड़े बदलाव भी जानें
OECD की इस रिपोर्ट में सिर्फ सैलरी घटने की बात ही नहीं है, बल्कि दुनिया भर के नौकरीपेशा लोगों और युवाओं से जुड़े 3 ऐसे चौंकाने वाले ट्रेंड्स भी बताए गए हैं जो आपके बहुत काम के हैं:-
- आम तौर पर माना जाता है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी आसानी से मिल जाती है, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक विकसित देशों में कॉलेज ग्रेजुएट्स के लिए नौकरी पाना पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है.
- आज के समय में दुनिया का हर तीसरा कर्मचारी कंपनियों के 'नॉन-कंपीट क्लॉज' के जाल में फंसा हुआ है. यह एक ऐसा नियम है जो आपको नौकरी छोड़ने के बाद किसी दूसरी प्रतिस्पर्धी कंपनी में काम करने से रोकता है. कंपनियां इसका इस्तेमाल आम कर्मचारियों पर भी कर रही हैं, जिससे लोगों की सैलरी ग्रोथ रुक रही है और वे मनचाही जगह स्विच नहीं कर पा रहे हैं.
- रिपोर्ट के 'सर्वे ऑफ एडल्ट Skills' से पता चला है कि पिछले एक दशक में सिर्फ डिग्री या किताबी ज्ञान के भरोसे बड़ी सैलरी पाने का दौर अब कमजोर हो रहा है. अब बाजार में उन लोगों को ज्यादा पैसा और तरक्की मिल रही है जिनके पास व्यावहारिक हुनर जैसे- लीडरशिप, टीमवर्क और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट की कला है.
- बड़े मेट्रो शहरों या राजधानी से दूर छोटे कस्बों में रहने वाले लोगों के लिए तरक्की की राह बहुत मुश्किल है. पिछड़े इलाकों के कर्मचारियों के अगले 5 साल तक सबसे कम आय वाले ग्रुप में ही फंसे रहने की आशंका 40% तक ज्यादा होती है.
- मंदी और महंगाई के बावजूद कंपनियों ने अपना मुनाफा कम नहीं होने दिया. उन्होंने बढ़ती लागत का पूरा बोझ कर्मचारियों की सैलरी ग्रोथ को रोककर उन्हीं पर डाल दिया.
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