What happens after death science: मौत का नाम सुनते ही जेहन में सन्नाटा छा जाता है, लेकिन जनाब, साइंस की दुनिया इसे 'द एंड' नहीं बल्कि एक 'नया आगाज' मानती है. मशहूर वैज्ञानिक नील डीग्रेस टायसन ने हाल ही में अपने 'स्टारटॉक' पॉडकास्ट में मौत के बाद के उस सफर से पर्दा उठाया है, जिसे सुनकर किसी का भी दिमाग चकरा जाए. टायसन का कहना है कि हमारा शरीर कोई रद्दी नहीं है जिसे फेंक दिया जाए, बल्कि यह ऊर्जा का एक खजाना है, जो मरने के बाद बस अपना चोला बदल लेता है.

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टायसन को मिट्टी में दफन होना ज्यादा रास आता है. उनका तर्क बड़ा सीधा और देसी है. वो कहते हैं कि जब हमें दफनाया जाता है, तो हमारे शरीर के फैट, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट को छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े, बैक्टीरिया और फंगस बड़े चाव से खाते हैं. इस तरह हमारे शरीर की ऊर्जा वापस धरती मां की गोद में समा जाती है और पेड़-पौधों के जरिए फिर से जीवन का हिस्सा बन जाती है.

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मौत के बाद खत्म नहीं होता वजूद (Neil deGrasse Tyson StarTalk death)
अब बात करते हैं उन लोगों की जिन्हें जलाया जाता है. टायसन बताते हैं कि दाह संस्कार (Cremation) के दौरान शरीर की ऊर्जा नष्ट नहीं होती, बल्कि वो गर्मी (Heat) में बदल जाती है. यह गर्मी 'इन्फ्रारेड एनर्जी' के रूप में प्रकाश की रफ्तार से अंतरिक्ष की ओर भागती है. मिसाल के तौर पर, अगर किसी शख्स को चार साल पहले जलाया गया था, तो उसके शरीर से निकली ऊर्जा अब तक हमारे सौर मंडल के सबसे करीबी सितारे 'अल्फा सेंटौरी' तक पहुंच चुकी होगी, यानी रूह रहे न रहे, आपकी ऊर्जा सितारों के बीच मटरगश्ती कर रही होती है.
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मिट्टी से आए थे और मिट्टी में ही मिल गए (Human body energy after death)
इंजीनियर अर्विन ऐश ने भी इस गुत्थी को सुलझाते हुए बताया कि, हमारे परमाणु (Atoms) कभी मरते नहीं हैं. राख बनने के बाद भी हम मिट्टी में मिलकर पौधों का हिस्सा बनते हैं और फिर किसी दूसरे जीव के शरीर में पहुंच जाते हैं. यह सब थर्मोडायनामिक्स के उस पहले कानून पर टिका है, जो कहता है कि ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है और न ही खत्म किया जा सकता है.
(डिस्क्लेमर: यह जानकारी सोशल मीडिया पर वायरल खबर के आधार पर दी गई है. NDTV इसकी पुष्टि नहीं करता.)
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