डरबन:
डरबन खूबसूरत, लेकिन अनसेफ शहर (बताया जाता) है, लेकिन इस सच्चाई का सबसे अधिक फायदा शायद अमीर देश उठा रहे हैं... यहां चल रहे क्लाइमेट चेंज समिट में हर कोई जैसे एक टेंट में घुसा बैठा है और अपनी जगह से हिलने को तैयार नहीं दिखता... ऐसा लगता है, जैसे बाहर ग्रीनहाउस गैसों और सामाजिक कार्यकर्ताओं (जो दिन-रात 'सेव कोयोटो' के नारे लगा रहे हैं) के अलावा इस शहर के कुख्यात झपटमारों का खतरा सबसे अधिक उन्हें ही है... वैसे यह इतना पेचीदा विषय है कि इस पर मुझ जैसे पत्रकार का कुछ लिखना हास्यास्पद ही कहा जाएगा, फिर भी सूत्रों से मिली जानकारी और दस्तावेजी सच यही कहते हैं कि वर्ष 2015 तक कानूनी रूप से सारे देशों पर यह ज़िम्मेदारी डालने की कोशिश हो रही है कि वे कार्बन उत्सर्जन कम करें... अब मुश्किल यह है कि अमेरिका इस कानूनी बाध्यता को नहीं मानना चाहता... यूरोपियन यूनियन कानूनी बंदिश के लिए तो तैयार है, लेकिन उसका ज़ोर इस बात पर है कि पर्यावरण को गंदा करने के लिए किए गए पुराने पापों को भुला दिया जाए और कुछ साल बाद (वर्ष 2015 या 2020 से) अमीर-गरीब सभी को एक समान मानकर बंदिश लगें... गरीब और विकासशील देश कहते हैं कि पहले पुराने समझौतों को लागू करो और हमें बिजली बनाने की आधुनिक तकनीक सस्ते में मुहैया कराओ, फिर आगे नई संधि करने पर बात होनी चाहिए... मज़ेदार बात यह है कि चीन भी (जिसका प्रदूषण अमेरिका और यूरोप की तरह धुआंधार बढ़ रहा है) इन गरीबों के पीछे छिपकर अपना हित साध रहा है, लेकिन भारत इस ताकतवर साथी को खोना नहीं चाहता... ऐसे में अमीरों को यह कहने का मौका मिल गया है कि भारत और चीन जैसे देशों को भी ज़िम्मेदारी संभालना सीखना चाहिए, तभी बात बनेगी... इस बीच अमीर देश दक्षिण अफ्रीका और ब्राज़ील जैसे देशों पर डोरे डाल रहे हैं, ताकि विकासशील देशों के ग्रुप में फूट पड़ सके... यह मत समझिए कि यह सिर्फ डरबन की कहानी है... पिछले 20 साल से बिगड़ते पर्यावरण के खतरे के बीच दुनिया को बचाने की लड़ाई तकरीबन इन्हीं झगड़ों में फंसी हुई है... लेकिन इस सम्मेलन में आकर कुछ बातें बेहतर तरीके से समझ में आ जाती हैं... एक, पर्यावरण का बिल्ला लगाए कई दलाल घूम रहे हैं, जो किसी को कार्बन और किसी को तकनीक बेचने का धंधा करते हैं (इसे कार्बन क्रेडिट पढ़ा जाए)... दूसरा, अमीरों से यह कहना - कि अब आप अपना प्रदूषण कम करें, ताकि गरीब और मध्यमवर्गीय देश भी पनप सकें - वैसा ही है, जैसे किसी खांटी पूंजीवादी को समाजवादी बनने के लिए कहा जाए... यह बात वैसी ही है, जैसे किसी संस्थान में सबसे अधिक वेतन पाने वाला कह दे कि अब मेरी तनख्वाह न बढ़ाओ, जिनकी कम है, उन्हें भी ऊपर आने दो... तीसरी बात एक क्लाइमेट फंड बनाने को लेकर चल रही है, जिसमें बड़े देश गरीबों के लिए चंदा देंगे, लेकिन डरबन में तो यही लग रहा है कि अमेरिका और यूरोपीय देश फिलहाल ऐसी किसी कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के लिए तैयार नहीं हैं... वे चंदे के नाम पर खाली डिब्बा दिखा रहे हैं... अमीर देशों से अपने रहन-सहन में बदलाव करने की भी बात की जा रही है... सवाल यह है कि जब दिल्ली में भी छोटी कार चलाने वाले को हिकारत से देखा जाता है तो न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन में ऐसी कल्पना करना भी कठिन है... इसीलिए हर साल इस सम्मेलन को कवर करने वाले भी परेशान हैं, क्योंकि बात घूम-फिरकर वहीं आ-जा रही है... डरबन में यह परेशानी कहीं ज़्यादा बड़ी है, क्योंकि भीतर अमीर-गरीब की लड़ाई की झुंझलाहट है तो बाहर डरबन की अनसेफ सड़कों पर लुटने का खतरा... पी.एस. : हालांकि फ्लोरिडा रोड पर अच्छे रेस्तरां, बार और नाइट क्लबों में वक्त बिताने के बाद बनी कैब्स या मोज़िज़े जैसी किसी भी रेडियो टैक्सी से आप सुरक्षित घर जा सकते हैं, लेकिन टेंट में घुसे लोगों को यह समझाने का काम कौन करे...
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कठिन, क्लाइमेट, चेंज, Hridayesh Joshi, हृदयेश जोशी