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‘नो डील’ की मजबूरी: ट्रंप से शांति समझौते पर ईरान क्यों नहीं कर पा रहा हस्ताक्षर, मोजतबा फैक्टर के अलावा ये 5 वजहें भी खास

ईरान अब तक अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ किसी शांति समझौते पर हस्ताक्षर नहीं कर पाया है. इसकी बड़ी वजह बाहरी दबाव से ज्यादा ईरान के भीतर चल रही राजनीतिक उथल‑पुथल मानी जा रही है. वहीं ईरान की मौजूदा लीडरशिप पर जनता और विपक्ष का दबाव भी है.

‘नो डील’ की मजबूरी: ट्रंप से शांति समझौते पर ईरान क्यों नहीं कर पा रहा हस्ताक्षर, मोजतबा फैक्टर के अलावा ये 5 वजहें भी खास
  • ईरान के भीतर सत्ता संघर्ष और नेतृत्व की अनिश्चितता के कारण US के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हो पा रहे.
  • सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई का लंबे समय तक सार्वजनिक रूप से न दिखना निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा है.
  • देश के विदेश मंत्रालय और सैन्य नेतृत्व के बीच मतभेद कूटनीतिक बातचीत को जटिल बना रहे हैं
नई दिल्ली:

युद्ध, प्रतिबंध और कूटनीतिक दबाव. तीनों के बीच फंसा ईरान बातचीत की मेज तक तो पहुंचा है, लेकिन ‘डील' से अब भी दूर खड़ा है. अमेरिका के साथ संभावित शांति समझौते पर हस्ताक्षर न होने की असली वजह सिर्फ अमेरिकी दबाव नहीं, बल्कि ईरान के भीतर चल रही सत्ता की खामोश लड़ाई और अनिश्चित नेतृत्व है.

विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान इस वक्त 'नो डील' की ऐसी स्थिति में है, जहां निर्णय लेने की क्षमता ही बिखर चुकी है. ऊपर से दबाव है, लेकिन भीतर की उथल-पुथल ज्यादा बड़ी रुकावट बन गई है.

मोजतबा फैक्टर: ‘गायब' सर्वोच्च नेता और ठहरी हुई मंजूरी

मोजतबा खामेनेई का लंबे समय से सार्वजनिक रूप से सामने न आना सबसे बड़ा सवाल बन गया है. ईरान में किसी भी बड़े फैसले के लिए सर्वोच्च नेता की मंजूरी जरूरी होती है, लेकिन मौजूदा हालात में वही मंजूरी धुंध में है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, वार्ताकारों और सैन्य नेतृत्व तक की उनकी सीधी पहुंच स्पष्ट नहीं है. ऐसे में विदेश में बातचीत चल रही है, लेकिन देश के भीतर फैसले लेने वाला केंद्र ठप पड़ गया है.

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1. न्यूक्लियर ‘रेड लाइन': सेना झुकने को तैयार नहीं

ईरान की सैन्य ताकत, खासकर IRGC परमाणु कार्यक्रम को अपनी रणनीतिक ढाल मानती है. अमेरिका यूरेनियम संवर्धन और स्टॉकपाइल पर कड़ी शर्तें चाहता है, लेकिन ईरानी सैन्य नेतृत्व इसे ‘लाल रेखा' मान रहा है. युद्ध में नुकसान सहना मंजूर है, लेकिन बातचीत में झुकना उनके लिए अपमान जैसा है. यही जिद कूटनीतिक रास्ता रोक रही है.

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2. सत्ता के भीतर टकराव: अलग-अलग आवाजें, अलग संदेश

ईरान का विदेश मंत्रालय और सैन्य नेतृत्व एक सुर में नहीं दिख रहे. एक तरफ कूटनीतिक लचीलापन दिखता है, तो दूसरी तरफ सख्त बयानबाजी. वार्ता की मेज पर दिए गए संकेत अक्सर बाद में पलट दिए जाते हैं. नतीजा यह होता है कि अमेरिका के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि असली निर्णय लेने वाला कौन है.

3. ‘पावर ब्रोकर' का अभाव: सिस्टम को जोड़ने वाला चेहरा गायब

ईरान की राजनीति लंबे समय तक ऐसे पर्दे के पीछे काम करने वाले नेताओं पर टिकी रही, जो सेना, धर्मगुरुओं और नेताओं के बीच संतुलन बना सकें. लेकिन फिलहाल ऐसा कोई मजबूत चेहरा नजर नहीं आता. सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल भी पहले जैसा प्रभावी नहीं दिख रहा. नतीजतन, मतभेद सुलझने के बजाय और गहराते जा रहे हैं.

4. जनता का दबाव: समझौता या ‘समर्पण'?

ईरान के आम लोग युद्ध और प्रतिबंधों से थक चुके हैं, लेकिन सत्ता के समर्थक वर्ग को ‘मजबूती' चाहिए. ऐसे में अमेरिका के साथ किसी भी समझौते को विपक्ष 'कुर्बानी के बाद सरेंडर' के रूप में पेश कर सकता है. यही डर नेतृत्व को जोखिम लेने से रोक रहा है.

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5. ‘कमजोर दिखने' का डर 

ईरानी नेतृत्व के सामने सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक चुनौती भी है. अगर अभी झुके, तो यह संदेश जाएगा कि दबाव काम कर गया और अगर नहीं झुके, तो आर्थिक और सैन्य संकट गहराता जाएगा. इसी दुविधा ने फैसले को ठंडे बस्ते में डाल दिया है.

बातचीत जारी, लेकिन फैसला दूर

ईरान आज उस मोड़ पर खड़ा है, जहां उसके पास अब भी क्षेत्रीय प्रभाव, सैन्य ताकत और कूटनीतिक विकल्प मौजूद हैं, लेकिन एकजुट निर्णय नहीं है. जब तक तेहरान के भीतर सत्ता का यह धुंधलापन साफ नहीं होता, तब तक शांति समझौते की कोई भी कोशिश अधूरी ही रहेगी. बातचीत लौट सकती है, लेकिन ‘डील' अभी दूर है.

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