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This Article is From Feb 14, 2026

बांग्लादेश कहीं 'पाकिस्तान' न बन जाए! क्‍या है ‘जुलाई चार्टर' जिसने बढ़ाई तारिक रहमान की टेंशन

जनमत संग्रह में जनता की सहमति मांगी गई थी कि ‘जुलाई नेशनल चार्टर' 2025 को मंजूरी दी जाए, जिसका उद्देश्य देश के शासन प्रणाली में बदलाव लाना है.

बांग्लादेश कहीं 'पाकिस्तान' न बन जाए! क्‍या है ‘जुलाई चार्टर' जिसने बढ़ाई तारिक रहमान की टेंशन
  • बांग्लादेश चुनाव में बीएनपी गठबंधन ने 210 सीटों पर जीत दर्ज कर नई सरकार गठन का रास्ता साफ कर दिया है
  • चुनाव के साथ ही 84 सूत्री सुधार पैकेज पर जनमत संग्रह हुआ जिसमें 60.26 प्रतिशत मतदान और हां को बहुमत मिला है.
  • चार्टर में प्रधानमंत्री के लिए कार्यकाल सीमा, दो सदनों वाली संसद और कार्यकारी शक्ति में कमी के प्रस्ताव हैं.

बांग्‍लादेश चुनाव में बीएनपी के नेतृत्‍व वाले गठबंधन ने 210 सीटों पर जीत हासिल की है. इसके साथ ही पार्टी अध्‍यक्ष तारिक रहमान के नेतृत्‍व में नई सरकार के गठन का मार्ग साफ हो गया है. तारिक रहमान के रूप में बांग्‍लादेश को करीब 35 सालों के बाद एक पुरुष प्रधानमंत्री मिलने जा रहा है. हालांकि चुनाव के साथ ही बांग्‍लादेश में 84 सूत्री सुधार पैकेज को लेकर जनमत संग्रह भी कराया गया, जिसमें 60.26 प्रतिशत मतदान हुआ और 'हां' को साफ तौर पर बहुमत मिला. उधर, आशंका जताई जा रही है कि जनमत संग्रह को लेकर 'हां' विकल्‍प चुनने से बांग्‍लादेश भी पाकिस्‍तान की राह पर जा सकता है. विशेषज्ञ जनमत संग्रह को लेकर चेतावनी दे रहे हैं तो यह तारिक रहमान के लिए भी परेशानी का सबब बन सकता है. 

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 4,80,74,429 लोगों ने 'हां' के पक्ष में मतदान किया, जबकि 2,25,65,627 मतदाताओं ने 'नहीं' का विकल्प चुना. चुनाव आयोग के वरिष्ठ सचिव अख्तर अहमद ने चुनाव आयोग में पत्रकारों से बात करते हुए यह जानकारी दी है. इन आंकड़ों का अर्थ है कि करीब 70 फीसदी लोगों ने हां के पक्ष में मतदान किया है. 

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क्‍या है ‘जुलाई चार्टर'?

जनमत संग्रह में जनता की सहमति मांगी गई थी कि ‘जुलाई नेशनल चार्टर' 2025 को मंजूरी दी जाए, जिसका उद्देश्य देश के शासन प्रणाली में बदलाव लाना है. इसे जुलाई 2024 में छात्रों के नेतृत्व में हुए विद्रोह के बाद तैयार किया गया था, जिसके बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना को पद से हटा दिया गया था. एक संवैधानिक सुधार परिषद से इन सुधारों को 270 कार्य दिवसों में लागू करना है.  

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इस चार्टर में क्या प्रस्ताव हैं?

इस चार्टर का मुख्य उद्देश्य प्रमुख राज्य संस्थानों का मौलिक रूप से पुनर्गठन करके सत्तावादी और फासीवादी शासन को रोकने के लिए कार्यकारी शक्ति के केंद्रीकरण को रोकना है. बांग्लादेश के बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार, 84 सुधार प्रस्तावों में से 47 के लिए संवैधानिक संशोधनों की जरूरत है, जबकि शेष 37 को कानूनों या कार्यकारी आदेशों के जरिए लागू किया जा सकता है. आइए जानते हैं कि इसके प्रमुख प्रस्‍ताव क्‍या हैं- 

कार्यकाल सीमा: इसमें निरंकुश शासन को रोकने के लिए प्रधानमंत्रियों के लिए सख्त कार्यकाल सीमा लागू करने का प्रस्‍ताव किया गया है. 

दो सदनों वाली संसद: साथ ही विधायी शक्ति में संतुलन बनाने का भी प्रस्‍ताव है, जिसके लिए दलों के राष्ट्रीय मतों के आधार पर सीटों के आवंटन के साथ 100 सीटों वाले एक नए ऊपरी सदन के गठन का प्रस्‍ताव है. 

कार्यकारी शक्ति में कमी: प्रधानमंत्री कार्यालय में शक्ति के केंद्रीकरण को कम करने के लिए राष्ट्रपति की भूमिका को मजबूत करने का भी प्रस्‍ताव है. 

न्यायिक और संस्थागत स्वतंत्रता: न्यायपालिका और अन्य प्रमुख राज्य संस्थाओं को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखने के उपाय. 

विपक्ष की भागीदारी: विपक्षी नेताओं को प्रमुख संसदीय समितियों का नेतृत्व करने और उपाध्यक्ष के रूप में कार्य करने के प्रावधान भी शामिल किए गए हैं. 

"जुलाई फाइटर्स" को संरक्षण: इसमें "जुलाई फाइटर्स" कहे जाने वाले विद्रोह में भाग लेने वालों को संरक्षण प्रदान करने का भी प्रस्ताव है. 

महिलाओं का प्रतिनिधित्व: इसमें संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में बढ़ोतरी का भी प्रस्‍ताव है.  

बांग्लादेश में सुधारों का चार्टर तीसरी बार प्रस्तुत किया गया है. 

चेतावनी दे रहे विशेषज्ञ

बांग्लादेश का संविधान 1972 में लागू हुआ था और अब तक इसमें 17 बार संशोधन किया जा चुका है. हालांकि, आलोचकों का कहना है कि इस बार यूनुस द्वारा वादा किए गए नए बांग्लादेश के निर्माण के लिए बुनियादी संवैधानिक सिद्धांतों और ‘निस्तारित हो चुके मुद्दों' को पलटने के लिए कई प्रस्ताव पेश किए गए हैं. 

प्रख्यात अधिवक्ता और संविधान विशेषज्ञ तानिया अमीर ने कहा कि जनमत संग्रह और संवैधानिक सुधार बांग्लादेश के मूलभूत इतिहास और कानूनी विरासत के लिए खतरा हैं. उन्होंने कहा कि ये वस्तुतः ‘‘हमारे इतिहास को निष्फल'' कर रहे हैं और बांग्लादेश की 1971 की स्वतंत्रता की कानूनी नींव को काफी हद तक कमतर कर रहे हैं. 

दूसरा पाकिस्‍तान न बन जाए बांग्‍लादेश 

पाकिस्‍तान में कई मौके ऐसे आए जब अधिकार सत्ता हासिल करने वाले तानाशाहों के पास केंद्रित हो गए. पाकिस्‍तान के 1999 में हुए सबसे हालिया सैन्‍य तख्‍तापलट के बाद जनरल परवेज मुशर्रफ देश के राष्‍ट्रपति बने और फिर उन्‍होंने राष्‍ट्रपति की शक्तियों को मजबूत करने का काम किया था. इसी ने उन्‍हें निरंकुश बना दिया और बाद में अन्‍य राजनेताओं को उन्‍होंने हाशिये पर धकेल दिया. बांग्‍लादेश के जुलाई चार्टर में राष्‍ट्रपति की भूमिका को मजबूत करने का प्रस्‍ताव है. ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि कहीं बांग्‍लादेश दूसरा पाकिस्‍तान न बन जाए. 

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