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बांग्लादेश चुनाव 2026: बैलेट बॉक्स से तारिक रहमान के लिए निकला संदेश, बीएनपी की चुनौतियां क्या हैं

Dr Amar Singh
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    फ़रवरी 14, 2026 00:02 am IST
    • Published On फ़रवरी 13, 2026 23:56 pm IST
    • Last Updated On फ़रवरी 14, 2026 00:02 am IST
बांग्लादेश चुनाव 2026: बैलेट बॉक्स से तारिक रहमान के लिए निकला संदेश, बीएनपी की चुनौतियां क्या हैं

बांग्लादेश का 13वां आम चुनाव 12 फरवरी 2026 को संपन्न हुआ. यह चुनाव केवल एक नियमित राजनीतिक प्रक्रिया नहीं था, बल्कि इसे देश के लोकतांत्रिक भविष्य की दिशा तय करने वाला निर्णायक मोड़ माना जा रहा है. यह चुनाव ऐसे समय में हुआ जब बांग्लादेश हाल के सालों की सबसे गंभीर राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर चुका था. वहां सत्ता, संस्थाओं और  समाज, तीनों स्तरों पर पुनर्संरचना की प्रक्रिया जारी थी. जुलाई 2024 में 'जेन जी' के नेतृत्व वाले छात्र आंदोलन ने 15 साल पुरानी शेख हसीना की सरकार को अपदस्थ कर दिया था. कभी बांग्लादेशी लोकतंत्र की प्रतीक मानी जाने वाली हसीना पर आलोचकों का आरोप था कि उनके शासन के अंतिम सालों में सत्ता तेजी से सत्तावादी और दमनकारी होती चली गई. हसीना के पतन के कुछ ही दिन बाद नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस ने अंतरिम नेतृत्व की ज़िम्मेदारी संभाली. इस बीच शेख हसीना भारत की राजधानी दिल्ली में निर्वासन में रह रही हैं. इससे भारत-बांग्लादेश संबंधों में भी नई संवेदनशीलताएं पैदा हुई हैं.

संसद की संरचना और चुनावी व्यवस्था

बांग्लादेश की संसदीय व्यवस्था एक-सदनीय (Unicameral) है. इसे जातीय संसद (Jatiya Sangsad) कहा जाता है. संसद में कुल 350 सदस्य होते हैं. इनमें से 300 सदस्य प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुने जाते हैं. बाकी की 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं. इन महिलाओं का चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से नहीं किया जाता, बल्कि संसद में निर्वाचित दलों को उनके प्राप्त सीटों के अनुपात में आवंटित किया जाता है. इस व्यवस्था का उद्देश्य संसद में महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाना और राजनीतिक समावेशन सुनिश्चित करना है, ताकि लोकतांत्रिक प्रणाली अधिक संतुलित बन सके.

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बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की निर्णायक जीत

बांग्लादेश की मुख्य विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) इस चुनाव में सबसे मज़बूत शक्ति के रूप में उभरी. पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे और पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान 17 साल के निर्वासन के बाद 25 दिसंबर 2025 में स्वदेश लौटे थे. चुनाव परिणामों में बीएनपी ने 212 से सीटें जीती हैं.उसे स्पष्ट बहुमत मिला है.पार्टी ने स्वयं को एक लिबरल-सेंट्रिस्ट, राष्ट्रवादी और लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में पेश किया, हालांकि उसके सामने अतीत से जुड़े भ्रष्टाचार और अस्थिरता के आरोपों से उबरने की चुनौती बनी हुई है. अब बीएनपी के सामने ये चुनौतियां हैं-

  • शहरी मध्यम वर्ग और युवा मतदाताओं को आकर्षित करना
  • मानवाधिकार और संस्थागत सुधारों पर ज़ोर
  • आर्थिक अवसरों और रोज़गार सृजन का वादा

बांग्लादेशी चुनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू इस्लामी राजनीति का पुनर्संगठन है. जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाला यह गठबंधन विशेष रूप से छात्रों, ग्रामीण क्षेत्रों और धार्मिक मतदाताओं में प्रभाव बढ़ा 'लिबरल बनाम इस्लामिस्ट' ध्रुवीकरण की ओर बढ़ा है. यह भविष्य की नीति दिशा और सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करेगा. जमात का समर्थन करने वाली 11 पार्टियों में नेशनल सिटिजन पार्टी भी शामिल है. यह छात्रों और युवाओं का वही संगठन है जो हसीना विरोधी प्रदर्शनों से उभरा है. इस चुनाव में जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन को अभी तक 77 सीटें मिलीं हैं.

जेन-जी से प्रेरित दुनिया का पहला चुनाव

बांग्लादेश के इस चुनाव को बैलेट बॉक्स के माध्यम से जेन जी की पहली वास्तविक राजनीतिक परीक्ष माना जा रहा था. सोशल मीडिया, विश्वविद्यालय आंदोलनों और नागरिक मंचों के जरिए सक्रिय यह पीढ़ी पारंपरिक दल-आधारित राजनीति से असंतुष्ट दिखाई देती है.युवाओं के प्रमुख मुद्दे हैं-

  • रोज़गार और आर्थिक अवसर
  • भ्रष्टाचार-मुक्त और जवाबदेह शासन
  • मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  • लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय

यह पीढ़ी बांग्लादेश की राजनीति में नैतिकता और पारदर्शिता की नई अपेक्षाएं लेकर आई है. 

बांग्लादेश चुनाव के अंतरराष्ट्रीय आयाम 

बांग्लादेश का 2026 का आम चुनाव केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव भी व्यापक हैं. भारत, चीन, अमेरिका और यूरोपीय देशों ने इस चुनावी प्रक्रिया पर कड़ी नज़र रखी है, क्योंकि बांग्लादेश दक्षिण एशिया की सामरिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक संरचना में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है. भारत के लिए यह चुनाव विशेष रूप से संवेदनशील रहा है, क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का मुद्दा और नई सरकार की विदेश नीति की दिशा सीधे भारत–बांग्लादेश संबंधों को प्रभावित करने वाली है.

बाग्लादेश चुनाव में तारीक रहमान की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्

बाग्लादेश चुनाव में तारीक रहमान की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने 212 सीटें जीत ली हैं. उसे दो तिहाई बहुमत हासिल हो गया है.

चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीएनपी और उसके नेता तारिक रहमान को निर्णायक जीत के लिए बधाई दी है. सोशल मीडिया साइ़ट एक्स पर अपने संदेश में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह जीत बांग्लादेश की जनता के तारिक रहमान के नेतृत्व में विश्वास को दर्शाती है. उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि भारत एक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और समावेशी बांग्लादेश के समर्थन में आगे भी मजबूती से खड़ा रहेगा. प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी अंतरिम मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में भारत–बांग्लादेश संबंधों में उत्पन्न हुई कुछ तनातनी के बाद ढाका की ओर मित्रता और सहयोग का हाथ बढ़ाने के संकेत के रूप में देखी जा रही है.

बांग्लादेशी की असली अग्निपरीक्षा

हालांकि, शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के विरुद्ध घटनाओं में वृद्धि ने भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंताओं को भी बढ़ाया है. इस संदर्भ में ब्रिटिश समाचार पत्र 'The Guardian' की रिपोर्ट के अनुसार, तारिक रहमान ने स्वीकार किया कि भारत के साथ संबंधों में 'कुछ मुद्दे' रहे हैं, लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे भारत के साथ पारस्परिक सम्मान और पारस्परिक समझ पर आधारित संबंध चाहते हैं.

ऐसे में 2026 का बांग्लादेशी आम चुनाव लोकतंत्र की वास्तविक अग्निपरीक्षा सिद्ध हुआ है. यह चुनाव न केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम बना, बल्कि संवैधानिक सुधार, युवा राजनीति और संस्थागत पुनर्निर्माण की दिशा में एक नए अध्याय की शुरुआत भी करता है. यह आने वाला समय ही बताएगा कि बांग्लादेश इस जनादेश को कितनी सफलतापूर्वक स्थायी, सहभागी और उत्तरदायी लोकतंत्र में रूपांतरित कर पाता है. 

क्या 'जुलाई चार्टर' से होगा बांग्लादेश में सुधार

यह चुनाव इसलिए भी असाधारण था क्योंकि मतदाताओं से दो बैलेट पर वोट देने को कहा गया. पहला, अगली सरकार और प्रधानमंत्री के चयन के लिए और दूसरा 'जुलाई चार्टर' पर अपनी सहमति या असहमति व्यक्त करने के लिए. जुलाई चार्टर 28 पृष्ठों का एक राजनीतिक-संवैधानिक समझौता है. इस पर 25 राजनीतिक दलों और मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने हस्ताक्षर किए हैं. इसका उद्देश्य बांग्लादेश को एक द्वितीय गणराज्य (Second Republic) की ओर ले जाना है, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की सत्तावादी शासन-व्यवस्था की पुनरावृत्ति रोकी जा सके.

जुलाई चार्टर के तहत प्रधानमंत्री की शक्तियों को सीमित करने, किसी भी व्यक्ति को अपने जीवनकाल में 10 साल से अधिक प्रधानमंत्री न रहने देने, प्रधानमंत्री द्वारा अकेले आपातकाल घोषित करने पर रोक, द्विसदनीय संसद की स्थापना, निर्बाध इंटरनेट सेवा और व्यक्तिगत डेटा संरक्षण को मौलिक अधिकार बनाने जैसे प्रावधान शामिल हैं. इसके अतिरिक्त, न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने हेतु सुप्रीम ज्यूडिशियल काउंसिल और स्वतंत्र न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन का प्रस्ताव किया गया है.

चुनाव में मिली इस ऐतिहासिक जीत के बाद बीएनपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश में आर्थिक विकास को पटरी पर लाना है.

चुनाव में मिली इस ऐतिहासिक जीत के बाद बीएनपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश में आर्थिक विकास को पटरी पर लाना है.

रेफरेंडम में 'जुलाई चार्टर' को 68 फीसदी से अधिक वोट मिले हैं. इससे उसे वैधता मिली है. इसके परिणामस्वरूप नई संसद को संवैधानिक सुधार परिषद (Constitutional Reform Council) के रूप में काम करना होगा. उसे 180 कार्यदिवस के भीतर सभी प्रस्तावित सुधारों को लागू करना अनिवार्य होगा.

मुहम्मद यूनुस की भूमिका और अवामी लीग पर पाबंदी

मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार को एक नैतिक, गैर-दलीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित प्रशासन के रूप में देखा गया. जिसने संक्रमणकालीन शासन को वैधता प्रदान की. अंतरिम सरकार के प्रमुख उद्देश्य थे—लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पुनर्स्थापना, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराना, मानवाधिकारों की रक्षा और राजनीतिक संस्थाओं में जनता का विश्वास बहाल करना. हालांकि, गहरे संस्थागत सुधारों के लिए आवश्यक समय और राजनीतिक सहमति का अभाव रहा. अंतरिम सरकार की विफलताओं के कारण देश में कानून-व्यवस्था की स्थिति और अल्पसंख्यकों के हितों को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित किया.

बांग्लादेश की सबसे पुरानी पार्टी अवामी लीग को 2026 के चुनाव में भाग लेने से रोक दिया गया. यह निर्णय ऐतिहासिक होने के साथ-साथ अत्यंत विवादास्पद भी रहा. समर्थकों के अनुसार यह कदम निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक था, जबकि आलोचकों का कहना है कि करीब 30 फीसदी लोकप्रिय समर्थन रखने वाली पार्टी को बाहर करना लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को सीमित करता है. इस बहिष्कार ने राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ा शून्य उत्पन्न किया.

डिस्क्लेमर: लेखक अलीगढ़ के डीएस कॉलेज के रक्षा और स्त्रातजिक अध्ययन विभाग में अस्सिटेंट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है. 

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