- ईरान के साथ युद्ध के मद्देनजर अमेरिका अब मल्टीपर्पज फ्लोटिंग बेस तैनाती के लिए भेज रहा है.
- ये फ्लोटिंग बेस बिना किसी बंदरगाह की जरूरत के समुद्र में सैनिक, टैंक और सैन्य उपकरण उतारने की क्षमता रखते हैं.
- अमेरिकी मरीन कोर ने 31वीं मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट को तीन जहाजों पर सवार कर मध्य पूर्व भेजा है.
मिडिल ईस्ट में ईरान के साथ युद्ध के मद्देनजर अमेरिका ने अपनी सैन्य मौजूदगी को एक नए स्तर पर पहुंचाने की कोशिश में जुटा है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर अमेरिका ने खाड़ी क्षेत्र में ऐसे मल्टी‑पर्पज वॉरशिप तैनात कर रहा हैं, जिन्हें आम भाषा में “फ्लोटिंग बेस” कहा जा रहा है. ये जहाज पारंपरिक युद्धपोतों से अलग हैं और यह बताते हैं कि कैसे समुद्री युद्ध की रणनीति बदल रही है. इन फ्लोटिंग नेवल बेस की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें किसी बंदरगाह या सुरक्षित पोर्ट की जरूरत नहीं होती. ये समुद्र के बीच रहते हुए ही दुश्मन के तटीय इलाकों में सैनिक, टैंक और सैन्य साजो‑सामान उतारने की क्षमता रखते हैं यानी जरूरत पड़ने पर अमेरिका सीधे समुद्र से जमीन पर सैन्य कार्रवाई कर सकता है, बिना किसी देश की जमीन या इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर हुए.
अमेरिकी नौसेना की भाषा में इन्हें एक्सपीडिशनरी सी बेस (ESB) कहा जाता है. ये दरअसल समुद्र में तैरते हुए फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस की तरह काम करते हैं. इनका ढांचा मोबाइल लैंडिंग प्लेटफॉर्म और अफ्लोट फॉरवर्ड स्टेजिंग बेस की अवधारणा से विकसित किया गया है. इन जहाजों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि ये समुद्र में ही एक सैन्य हब की भूमिका निभा सकें.
ये भी पढ़ें: रूस ने ईरान से नाता तोड़ने की रखी थी शर्त? जानें डील को लेकर मॉस्को ने क्या कहा
31वीं मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट की तैनाती
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के मद्देनजर अमेरिकी मरीन कोर एक मरीन यूनिट को वहां भेज रही है. एबीसी न्यूज के अनुसार, करीब 2,200 मरीन सैनिक अमेरिकी नौसेना के तीन जहाजों पर सवार होकर मध्य पूर्व की ओर जा रहे हैं. तैनात की जा रही यूनिट 31वीं मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट (31वीं एमईयू) है.
तट पर सीधी पहुंच इन जहाजों की सबसे अहम ताकत मानी जाती है. फ्लोटिंग बेस से छोटी नावों और हॉवरक्राफ्ट के जरिए सैनिकों को सीधे दुश्मन इलाके में उतारा जा सकता है. इसका मतलब यह है कि किसी सुरक्षित बंदरगाह पर कब्जा करने या वहां तक पहुंचने की जरूरत ही खत्म हो जाती है. आधुनिक युद्ध में जहां मिसाइल और ड्रोन से बंदरगाहों को आसानी से निशाना बनाया जा सकता है, यह क्षमता अमेरिका को रणनीतिक बढ़त देती है.
लंबे युद्ध संचालन के लिए किया जाता है तैयार
इन वॉरशिप्स को केवल सैनिक उतारने के लिए ही नहीं, बल्कि लंबे समय तक युद्ध संचालन के लिए तैयार किया गया है. इनके भीतर बड़ा अस्पताल से लेकर हजारों टन गोला‑बारूद, ईंधन और जरूरी सैन्य सामान रखने की व्यवस्था होती है. इससे ये जहाज लंबे समय तक बिना किनारे लगे युद्ध अभियान चला सकते हैं.
फ्लोटिंग बेस के साथ हजारों अमेरिकी मरीन कमांडोज को भी तैनात किया जा सकता है. ये मरीन किसी भी तटीय इलाके में तुरंत घुसपैठ करने और ऑपरेशन अंजाम देने में सक्षम माने जाते हैं. समुद्र से सीधे कार्रवाई की यह क्षमता अमेरिका को अचानक और तेज सैन्य प्रतिक्रिया देने का विकल्प देती है.
कमांड एंड कंट्रोल सेंटर की तरह करते हैं काम
इन जहाजों पर हेलीकॉप्टर और टिल्ट्रोटर एयरक्राफ्ट के लिए बड़े फ्लाइट डेक और हैंगर हो सकते हैं. इससे हवाई निगरानी, सैनिकों की आवाजाही और विशेष ऑपरेशन में आसानी होती है. साथ ही ये फ्लोटिंग बेस कमांड एंड कंट्रोल सेंटर की तरह भी काम करते हैं.
अमेरिका डिस्ट्रिब्यूटेड मैरिटाइम ऑपरेशंस की दिशा में आगे बढ़ रहा है. इसका मतलब है कि बड़ी‑बड़ी स्थायी सैन्य छावनियों की बजाय समुद्र में फैले छोटे‑छोटे लचीले, प्लेटफॉर्म के जरिए ताकत दिखाई जाए. फ्लोटिंग नेवल बेस इसी रणनीति का अहम हिस्सा हैं. ये बिखरी हुई सैन्य इकाइयों को रसद, मरम्मत और संचालन का सहारा देते हैं.
इनका एक और अहम पहलू यह है कि ये राजनीतिक और कूटनीतिक बाधाओं से काफी हद तक मुक्त होते हैं. किसी देश की जमीन पर बेस बनाने के लिए उसकी अनुमति जरूरी होती है, लेकिन समुद्र में तैनात फ्लोटिंग बेस के लिए ऐसी निर्भरता नहीं होती. यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन के लिए ये जहाज मध्य पूर्व जैसे संवेदनशील इलाके में बेहद उपयोगी माने जा रहे हैं.
कुल मिलाकर, ट्रंप का ‘फ्लोटिंग बेस' प्लान केवल कुछ जहाजों की तैनाती नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में समुद्री युद्ध की दिशा बदल सकता है.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं