- अमेरिका ने वेनेजुएला पर नार्को टेररिज्म रोकने के बहाने से हमला किया लेकिन असली मकसद कुछ और ही है.
- वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है लेकिन आधारभूत ढांचे की कमी के कारण उत्पादन कम है.
- वेनेजुएला पर हमले का कारण तेल भंडार नहीं है. असल कारण डॉलर को वैश्विक अर्थव्यवस्था में केंद्रीय बनाए रखना है.
US-Venezuela Conflict: वेनेजुएला पर अमेरिकी हमला दरअसल दुनिया के लिए एक संदेश है- अमेरिका न कोई अंतरराष्ट्रीय कानून मानता है, न किसी देश की संप्रभुता का सम्मान करता है. वह बिल्कुल 'दादा' की तरह अपनी ताकत के इस्तेमाल से किसी भी देश में दाखिल हो सकता है, उसके राष्ट्रपति और उसकी पत्नी को बेडरूम से निकाल कर अपने यहां लाकर, हथकड़ी पहना जेल में डाल सकता है. उसके लिए उसके स्वार्थों से बड़ा तर्क कोई नहीं है. लेकिन वेनेजुएला पर ऐसे अवैध हमले में अमेरिका का कौन सा स्वार्थ सध रहा है? यह एक बड़ा सवाल है. जिसे अच्छे से समझना बेहद जरूरी है.
अमेरिका का दावा- नार्को टेररिज्म के कारण हमला
आधिकारिक तौर पर अमेरिका का दावा है कि उसने नार्को-टेररिज़्म- नशे के आतंकवाद- के निर्यात को रोकने के लिए यह हमला किया है. लेकिन इसके लिए तो वह बीते कई दिनों से वेनेज़ुएला की बोटों पर बम बरसा रहा था. इन बोटों पर हमले में भी क़रीब 100 वेनेज़ुएलाई नागरिकों के मारे जाने की बात कही जा रही थी.
फिर वह कैसा महाबली है जो अपने देश में ड्रग्स की घुसपैठ नहीं रोक पा रहा है? सच तो यह है कि ड्रग्स के कारोबार के लिए वेनेज़ुएला जितना बदनाम है, उससे कहीं ज़्यादा दूसरे देश रहे हैं.

दूसरा अहम दावा- वेनेजुएला के तेल भंडार पर अमेरिका की नजर
तो अमेरिकी हमले का मामला कुछ और है. क्या यह वेनेज़ुएला का तेल भंडार है जिस पर अमेरिका की नज़र है? एक हद तक यह बात भी सच है. वेनेज़ुएला के पास आधिकारिक तौर पर दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है. वहां 303 बिलियन बैरल तेल बताया जाता है. उसके मुक़ाबले दुनिया में सबसे ज़्यादा तेल बेचने वाले सऊदी अरब के पास 298 बिलियन बैरल तेल है.
वेनेज़ुएला के पास मगर अपने तेल भंडार के पर्याप्त इस्तेमाल के लिए आधारभूत ढांचा नहीं है- यही वजह है कि वह तेल उत्पादन और निर्यात में पिछड़ जाता है. डोनाल्ड ट्रंप ने साफ़ कहा भी है कि अभी वेनेज़ुएला में अमेरिकी हुकूमत चलेगी और अमेरिकी तेल कंपनियां वहां के तेल-कारोबार को संभालेंगी.

ड्रग्स और तेल से भी बड़ी है एक वजह, डॉलर की व्यवस्था
मगर यह भी पूरी और अकेली वजह नहीं है. फिलहाल अमेरिका के पास पर्याप्त तेल है और दुनिया भर के तेल-स्रोत उसके पास हैं- वेनेज़ुएला के भी. तो फिर बात क्या है? यहां संदेह की एक और वजह उभरती है जो बहुत ठोस है. वेनेज़ुएला पर अमेरिकी हमला दरअसल दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश भी है कि डॉलर में चल रहे अंतरराष्ट्रीय कारोबार की व्यवस्था के साथ कोई छेड़छाड़ न करे. वेनेज़ुएला यह छेड़छाड़ अकेले नहीं कर रहा था, लेकिन इस छेड़छाड़ में जो लोग शामिल हैं, उनकी सबसे कमज़ोर कड़ी वही था.
वैश्विक अर्थव्यव्था में डॉलर को कैसे मिली केंद्रीय भूमिका
इस बात को कुछ ठीक से समझने की ज़रूरत है. दूसरे विश्वयुद्ध के दौर में, यह ब्रेटनवुड समझौता था जिसने अमेरिकी डॉलर को वैश्विक अर्थव्यवस्था की केंद्रीय भूमिका सौंपी. तब यह तय किया गया कि दुनिया भर की मुद्राएं डॉलर के मुक़ाबले अपनी क़ीमत का समायोजन करेंगी और सारा वैश्विक कारोबार डॉलर में होगा.
- अगला मोड़ 1973 में आया, जब अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ कई समझौते किए. तब तय किया गया कि तेल की क़ीमतें भी डॉलर में तय होंगी. यह वैश्विक बाज़ार में अमेरिकी डॉलर की केंद्रीयता को कुछ और मज़बूती देने वाला क़दम था.
- दुनिया भर में विदेशी मुद्रा भंडार का मतलब अपने ख़ज़ाने में डॉलरों का भंडार हो गया. अमेरिका की आर्थिक, राजनीतिक और सामरिक हैसियत इस डॉलर के लिए गारंटी का काम करती रही.
- शीत युद्ध के दौर में और उसके बाद भी अमेरिका गैरकम्युनिस्ट देशों की आर्थिक, सामरिक सुरक्षा का आश्वासन बना रहा.
बीते दो दशकों से एक नई विश्व व्यवस्था ले रही आकार
लेकिन बीते दो दशकों में एक नई विश्व-व्यवस्था आकार ले रही है. चीन अपने करिश्माई आर्थिक और सैन्य उभार के साथ इस वैश्विक अर्थव्यवस्था का अगुवा बना हुआ है. सोवियत संघ के पतन के बाद लड़खड़ाया रूस फिर से अपनी हैसियत हासिल करने की कोशिश में है और दोनों देश ख़ुद को डॉलर-अर्थवय्वस्था की जकड़ से बाहर लाने की कोशिश कर रहे हैं. ब्रिक्स देश अपना बैंक बना रहे हैं और आपसी कारोबार की मुद्रा तय कर रहे हैं. वे अपनी वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली भी विकसित कर रहे हैं.

चीन ने और ज़्यादा चतुराई दिखाई है. उसके पास तीन ट्रिलियन से ज़्यादा के डॉलर जमा हैं. साल 2025 ने उसने 4 अरब डॉलर के दो बॉन्ड जारी किए जो कई गुना ओवरसब्सक्राइब हुए और चीन ने इससे और कमाई की. इसका इस्तेमाल जाहिर है, उसके BRE यानी बेल्ट रोड इनिशिएटिव से भी होगा जिसको लेकर उसका दावा है कि इससे 150 देश जुड़ गए हैं. इसके अलावा वह अपना बहुत सारा कारोबार अपनी मुद्रा RMB यानी रेन्मिन्बी में कर रहा है.
यही नहीं, चाइना डेवलपमेंट बैंक और स्टेट एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक ऑफ चाइना ब्रेटनवुड संस्थाओं- अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक- की तरह दुनिया के विकासशील देशों को क़र्ज़ दे रहे हैं. हाल ही में अफ़्रीका के 50 देशों के प्रमुखों ने इस सिलसिले में चीन की यात्रा भी की.
रूस, चीन का ज्यादातर कारोबार अपनी मुद्राओं में
रूस और चीन के बीच बहुत सारा कारोबार उनकी अपनी मुद्राओं में हो रहा है. भारत भी रूस के साथ रुपये-रूबल में कारोबार को बढ़ावा दे रहा है. निश्चय ही इन क़दमों से डॉलर का वर्चस्व ख़त्म नहीं होगा, लेकिन बदलती भू राजनीतिक स्थितियों में स्वायत्त मुद्रा प्रसार के वे पॉकेट बनेंगे जो कई बार अमेरिकी पाबंदियों और मनमानी को बेमानी बना डालेंगे. यह धीरे-धीरे वैश्विक अर्थव्यवस्था को बदलने का काम भी करेगा.

बड़े देशों के इस खेल में वेनुजुएला कहां से आया?
सवाल है, बड़े देशों के बीच चल रहे इस खेल में वेनेज़ुएला कहां आता है? वेनेज़ुएला चीन के लिए एशिया के बाहर खुलने वाला वह दरवाज़ा है जिससे वह लातीन अमेरिकी देशों में अपनी पैठ बनाने की कोशिश करता रहा है. ह्यूगो शावेज़ के समय से ही चीन और वेनेज़ुएला के संपर्क घनिष्ठ होने शुरू हुए. चीन ने वेनेज़ुएला को ठीक-ठाक क़र्ज़ दे रखा है- मोटे अनुमान के हिसाब से 100 अरब डॉलर से कुछ ऊपर का.
वेनेजुएला ने यूरो और यूआन में कारोबार की कोशिश की
कुछ समय पहले तक वेनेज़ुएला चीन को सबसे ज़्यादा तेल बेचता रहा है. एक समझौते के मुताबिक उसे दस लाख बैरल तेल रोज़ चीन को बेचना था. बीते दिनों जब वेनेज़ुएला पर अमेरिका ने पाबंदी लगाई तो वेनेज़ुएला ने डॉलर से अलग यूरो और यूआन में कारोबार की कोशिश की. कई लोग मानते हैं कि यही वेनेज़ुएला की वह हिमाकत है जिसने अमेरिका को शायद आगबबूला कर दिया.
यह भी पढ़ें - इतिहास के दुर्लभ मामलों में से एक है निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी, क्या है सरकारें 'गिराने' का अमेरिकी रिकॉर्ड
सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफी की भी ऐसी ही है कहानी
चाहें तो याद कर सकते हैं कि अमेरिका पहले भी दूसरे देशों की ऐसी हरकतों के लिए दंडित करता रहा है. इराक के सद्दाम हुसैन ने भी 1990 में अमेरिकी डॉलर से अलग कारोबार करने के संकेत दिए थे- उनका क्या हश्र हुआ, हम जानते हैं. कर्नल गद्दाफी भी ऐसी ही सोच की वजह से मारे गए. ठीक है कि दोनों तानाशाह थे, लेकिन अमेरिका तो तानाशाहों की पीठ थपथपाने के लिए भी जाना जाता है.

सच तो यह है कि अगर ईरान या उत्तर कोरिया की तरह इराक और लीबिया ने भी अपने ऐटमी कार्यक्रम जारी रखते हुए ऐटम बन बना लिए होते तो शायद उनका वह हाल नहीं होता जो हो गया है. लेकिन अमेरिका का अपने हितों के नाम पर दूसरे देशों पर हमला करने का इतिहास पुराना है.
चिले में चुनी हुई सरकार के साथ अमेरिका ने की थी साजिश
चिले में चुनी हुई सल्वाडोर अयेंदे सरकार के ख़िलाफ़ जो साज़िश अमेरिका ने की, उसे भूलना असंभव है. अयेंदे की उस आख़िरी लड़ाई की कहानी विख्यात उपन्यासकार गैब्रियल गार्सिया मारक़ेज़ ने लिखी है- वे बताते हैं कि किस तरह फीदेल कास्त्रो की दी हुई राइफ़ल के साथ अयेंदे अंत तक पूरी गरिमा से खड़े रहे.
वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को भी तानाशाह बताया जा रहा है. इसमें शक नहीं कि वेनेज़ुएला में लोकतांत्रिक तौर-तरीक़ों पर काफ़ी रोक लगी है, लेकिन अगर मादुरो तानाशाह हैं को एक अर्थ में ट्रंप भी हैं, इसी अर्थ में और भी कई दूसरे नेता हैं.

अब ट्रंप क्यूबा और कोलंबिया को दे रहे धमकी
बहरहाल, दुनिया भर में जो अंतरराष्ट्रीय तौर-तरीक़े चलते हैं, उनमें यह वैध आम सहमति है कि एक देश दूसरे देश के आंतरिक मामलों में तब तक दख़ल नहीं देगा जब तक वह उससे सीधा प्रभावित न हो रहा हो. लेकिन ट्रंप को ऐसी किसी सहमति की परवाह नहीं है. वे अब भी क्यूबा और कोलंबिया को धमकी दे रहे हैं.
ईरान, गाजा, भारत-पाक युद्ध पर भी अमेरिका का दावा
इसके पहले ईरान को उन्होंने धमकी दी कि अगर तेहरान और अन्य शहरों में चल रहे प्रदर्शनों पर बल प्रयोग हुआ तो अमेरिकी सैनिक हमले के लिए तैयार हैं. ग़ाज़ा को बिल्कुल बरबाद होने तक उन्होंने इज़रायल को नहीं रोका और रूस-यूक्रेन युद्ध रुकवाने के लिए तरह-तरह के प्रस्ताव देते-देते वेनेज़ुएला पर क़ब्ज़ा कर बैठे. भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध रुकवाने का दावा भी वे एक-दो बार नहीं, कम से कम बीस बार कर चुके हैं- इस बात के बावजूद कि भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान ने अक्सर इससे इनकार किया है.
अमेरिकी दादागीरी के खिलाफ खड़ा होना जरूरी क्यों?
बहरहाल, अमेरिका की इस दादागीरी के ख़िलाफ़ दुनिया खड़ी नहीं होगी तो उसे और भी अलग-अलग रूपों में झेलने को मजबूर होगी. दूसरे देशों के साथ कारोबार में मनमाने टैरिफ़, अमेरिका के वीज़ा नियमों में मनचाहे बदलाव आदि इसी दादागीरी के अन्य रूप हैं. फिलहाल लातीन अमेरिकी देशों के अलावा रूस-चीन आदि इस अमेरिकी कार्रवाई के विरोध में हैं.

वेनेजुएला पर हुए हमले पर भारत ने भी जताई चिंता
भारत ने भी इस पर चिंता जताई है, लेकिन उसका सुर कुछ मद्धिम है. यह मद्धिम सुर हमारे पक्ष में होगा- ऐसा लगता नहीं. क़ायदे से अगर हम ख़ुद को ग्लोबल साउथ का नेता मानते हैं या चाहते हैं कि हमें दुनिया ऐसा माने तो हमें वेनेज़ुएला में अमेरिकी हमले की, उसके तौर-तरीक़े की कुछ और सख़्त आलोचना करनी होगी.
ट्रंप ताक़त की भाषा समझते हैं और भारत को दिखाना होगा कि भले वह सामरिक या आर्थिक तौर पर चीन-अमेरिका जैसी ताक़त न हो, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में और राजनैतिक और नैतिक तौर पर उसकी एक ताकत है और उसका विरोध मायने रखता है.
यह भी पढ़ें - ड्रग्स, हथियार और आतंकवाद... जानें वेनेजुएला के राष्ट्रपति पर किन आरोपों में मुकदमा चलाएगा अमेरिका
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं