विज्ञापन

वेनेजुएला में घुस गए अंकल सैम: ट्रंप के दोनों कार्यकाल में दिख रहा जमीन-आसमान का फर्क

डोनाल्ड ट्रंप पहले कार्यकाल में दूसरे देशों से अपनी सेना को वापस बुला रहे थे, नॉर्थ कोरिया तक से हाथ मिला रहे थे. लेकिन आज 9 साल बाद कहानी अलग है. अब वो न ईरान पर बमबारी करने से हिचक रहे हैं, न वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उठाने पर झिझक रहे हैं. 

वेनेजुएला में घुस गए अंकल सैम: ट्रंप के दोनों कार्यकाल में दिख रहा जमीन-आसमान का फर्क
डोनाल्ड ट्रंप के दोनों कार्यकाल में दिख रहा जमीन-आसमान का फर्क
  • डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में अमेरिका फर्स्ट नीति अपनाई और विदेशी सैन्य उपस्थिति कम की थी
  • दूसरे कार्यकाल में ट्रंप ने सैन्य हमले बढ़ाए और वेनेजुएला के राष्ट्रपति को गिरफ्तार कर अमेरिका लाया
  • दूसरे देशों से अमेरिकी सैनिकों को हटाने वाले ट्रंप इस बार अपने ही देश में सैनिकों को तैनात कर रहे हैं
क्या हमारी AI समरी आपके लिए उपयोगी रही?
हमें बताएं।

डोनाल्ड ट्रंप दो दिन बाद क्या करेंगे, आज यह बात दावे के साथ शायद वो खुद लिखकर न दे सकें. उनके काम करने का अंदाज ही यही है. ठीक यही बात उनके कट्टर समर्थकों को रास आती है. ट्रंप को दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति की कुर्सी संभाले अभी एक साल का भी वक्त नहीं गुजरा है. अगर सटीक कहें तो कुल 352 दिन (6 जनवरी को) ही बीते हैं और उन्होंने वर्ल्ड पॉलिटिक्स को पूरा 180 डिग्री घुमा दिया है. कभी ट्रेड वॉर से तो कभी अपनी सैन्य ताकत के बल पर, ट्रंप के जेहन में जो आया है, उन्होंने ठीक वही किया है. 

अगर डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल को देखें तो उन्होंने जब 20 जनवरी 2017 को पहली बार राष्ट्रपति के पद की शपथ ली थी, तो उनका केवल एक ही नारा था- अमेरिका फर्स्ट. उनके पहले कार्यकाल में यही देखने को मिला. जहां तक हो सके अमेरिका दूसरे देशों से अपनी सेना को वापस बुला रहा था, नॉर्थ कोरिया तक से हाथ मिला रहा था. लेकिन आज 9 साल बाद कहानी अलग है. दूसरे कार्यकाल में राष्ट्रपति ट्रंप का अंदाज अलग है. वो न ईरान पर बमबारी करने से हिचक रहे हैं, न वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उनके महले से उठाने पर झिझक रहे हैं. 

ट्रंप का पहला कार्यकाल- अमेरिका अपना देखेगा

2017 में अपने चुनावी प्रचार के दौरान और राष्ट्रपति के रूप में अपने पहले भाषण में, डोनाल्ड ट्रंप ने विदेश नीति के लिए "अमेरिका फर्स्ट" दृष्टिकोण पर जोर दिया था. ट्रंप की विदेश नीति में अमेरिका के लिए एक अलगाववादी धारा दिखी थी, जबकि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका लगातार वर्ल्ड पॉलिटिक्स के  सेंटर में रहता आया था. 

दिसंबर 2018 में, अपने सैन्य सलाहकारों की बात न मानते हुए, उन्होंने सीरिया में (2015 से) तैनात 2,000 अमेरिकी सैनिकों की वापसी की घोषणा की. उस आश्चर्यजनक निर्णय के कारण तो तब के अमेरिकी रक्षा सचिव जिम मैटिस ने इस्तीफा भी दे दिया. ट्रंप ने अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की उपस्थिति को भी काफी हद तक कम कर दिया, जिसे अमेरिकी सेना ने 2001 में देश पर आक्रमण करने के बाद से बनाए रखा था. बाद में फरवरी 2020 में, ट्रंप ने तालिबान के साथ एक समझौते किया, जिससे सभी अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से हट गए. सितंबर 2021 में तालिबान ने अफगानिस्तान पर फिर से नियंत्रण कर लिया.

मई 2018 में, ट्रंप प्रशासन ने घोषणा की कि अमेरिका जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन, या ईरान परमाणु समझौते से हट जाएगा. अमेरिका, ईरान, पांच अन्य देशों और यूरोपीय संघ के बीच 2015 में यह समझौते हुआ था. इस समझौते ने ईरान को आर्थिक प्रतिबंधों में ढील के बदले सख्त निगरानी में गैर-सैन्य उद्देश्यों के लिए परमाणु प्रौद्योगिकी को आगे बढ़ाने की अनुमति दी थी.

तब ट्रंप का इजरायल के लिए सपोर्ट सैन्य हस्तक्षेप की जगह सांकेतिक अधिक था. ट्रंप ने घोषणा की थी कि अमेरिका यरूशलेम को इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता देगा. मई 2018 में, अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर यरूशलेम में एक नया दूतावास खोला. ट्रंप ने दशकों पुराने संघर्ष को सुलझाने के इरादे से एक शांति योजना भी अपनाई. अगस्त और सितंबर 2020 में, ट्रंप अब्राहम समझौता लेकर आए, जिसके तहत UAE, बहरीन, मोरक्को और सूडान की सरकारों ने इजरायल के साथ अपने राजनयिक संबंधों को सामान्य किया. ट्रंप ने नॉर्थ कोरिया और रूस की ओर भी दोस्ती का हाथ बढ़ाया. 

यह भी पढ़ें: वेनेजुएला में नैतिकता गई तेल लेने! पश्चिम का दोहरा रवैया, संयुक्त राष्ट्र पर सवाल, शीतयुद्ध की आशंका

ट्रंप का दूसरा कार्यकाल- अमेरिका आपके घर में घुसेगा

और फिर 2025 में आया ट्रंप का दूसरा कार्यकाल और जैसे वर्ल्ड पॉलिटिक्स में उन्होंने आग लगा दी. व्यापार से जंग तक, ट्रंप ने किसी मोर्चे पर शांत बैठने का विकल्प नहीं चुना. अपने दूसरे कार्यकाल के पहले एक साल में ही उन्होंने अमेरिकी की नीति, राजनीति और समाजिक ताने-बाने में या तो बुनियादी बदलाव ला दिया है या उसकी शुरुआत कर दी है.

उन्होंने सीमा पर अवैध घुसपैठ को रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा दिया है और यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका ने उन अधिकांश शरणार्थियों के लिए दरवाजे बंद कर दिए हैं, जो गोरे नहीं हैं. उन्होंने भारत जैसे अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों के साथ संबंधों में खटास डाला है, अपनी विदेश नीति को साधने के लिए टैरिफ का उपयोग किया है.

ट्रंप ने कसम खाई थी कि वो कुर्सी पर बैठने के 24 घंटों के भीतर यूक्रेन पर रूस के आक्रमण को समाप्त कर देंगे लेकिन लगभग एक साल बीतने के बाद भी वो विफल हैं. वो कभी पुतिन से हाथ मिलाते तो कभी यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की को दुनिया के सामने बेइज्जत करते. हर तरीका आजमा लिया लेकिन जंग नहीं रुकी है. 

अमेरिका ने एक साल के अंदर कुल सात देशों पर सैन्य हमले किये हैं. ट्रंप का सबसे बड़ा अटैक वेनेजुएला पर हुआ, जिसपर वो अमेरिका में ड्रग्स तस्करी करने का आरोप पिछले 6 महीनों से लगा रहे थे. अमेरिका ने पहले एक के बाद एक, कैरेबियन सागर में वेनेजुएला के कथित ड्रग्स तस्करों की नावों को हवाई हमलों में उड़ाया. दिसंबर की शुरुआत में अमेरिकी नौसेना ने वेनेजुएला तट से दो तेल टैंकरों को जब्त कर लिया था. आखिर में वेनेजुएला में सेना भेजकर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को उठाकर अमेरिका मंगा लिया. अब दोनों पर केस चल रहा है, दोनों अमेरिकी जेल में कैद हैं.

पिछले कार्यकाल में ईरान से परमाणु समझौता तोड़ने वाले ट्रंप ने इसबार एक कदम आगे बढ़कर उसपर हमले का विकल्प चुना. ईरान और इजरायल के बीच शुरू हुए सैन्य संघर्ष के बीच, अमेरिका ने हस्तक्षेप किया और 22 जून को ईरान में तीन प्रमुख परमाणु स्थलों पर हमला किया. बाद में टीवी पर आकर ट्रंप ने ईरान के परमाणु स्थलों पर हमलों को उचित ठहराया और कहा कि ये हमले ईरान द्वारा उत्पन्न "परमाणु खतरे" को कम कर देंगे.

इसके अलावा ईराक, सोमालिया, यमन, सीरिया और नाइजीरिया में ट्रंप में सैन्य हमले किए. खास बात थी कि जो ट्रंप पहले कार्यकाल में दूसरे देशों से अपनी सेना को बुला रहे थे, उन्होंने अपने दूसरे कार्यकाल में अमेरिका के अंदर ही अपने सैनिकों को तैनात किया. जून में लॉस एंजिल्स में, जब उनकी आव्रजन कार्रवाई के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ, तो ट्रंप ने राज्य सरकार के विरोध के बावजूद कैलिफोर्निया नेशनल गार्ड को अपने कंट्रोल में ले लिया, और 700 सक्रिय-ड्यूटी मरीन के साथ 4,000 ऐसे सैनिकों को शहर की सड़कों पर भेज दिया. अमेरिका में नागरिक अधिकार आंदोलन के बाद यह पहली बार था जब केंद्रीय सरकार ने गवर्नर की सहमति के बिना राज्य के गार्ड को अपने कंट्रोल में ले लिया था.

यह भी पढ़ें: वेनेज़ुएला पर हमला: अमेरिकी ताकत की नई परिभाषा गढ़ता डोनाल्ड ट्रंप का 'डॉनरो सिद्धांत'

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com