अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आर्थिक नीतियों को अदालत ने गलत माना है. अमेरिकी फेडरल ट्रेड कोर्ट ने राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से लगाए गए 10% ग्लोबल टैरिफ को पूरी तरह 'गैरकानूनी' बताया है. सुप्रीम कोर्ट में मिली हार के कुछ ही महीनों बाद ट्रंप प्रशासन के लिए यह दूसरी बड़ी कानूनी हार है. इस फैसले ने ट्रंप सरकार की उन व्यापारिक योजनाओं पर पानी फेर दिया है, जिसके जरिए वे विदेशी वस्तुओं पर नकेल कसने की तैयारी में थे.
न्यूयॉर्क स्थित 'कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड' की तीन जजों की बेंच ने इस मामले पर बंटा हुआ फैसला सुनाया. बेंच ने साफ किया कि 1970 के दशक के एक व्यापार कानून के तहत राष्ट्रपति ट्रंप की तरफ से लगाए गए ये ग्लोबल टैरिफ अवैध हैं. हालांकि, अदालत ने फिलहाल इन शुल्कों पर रोक का दायरा सीमित रखा है. यह राहत अभी केवल दो निजी आयातकों और वाशिंगटन राज्य के लिए ही लागू होगी.
अदालत ने कहा- राष्ट्रपति ट्रंप ने हद पार की
मामले की सुनवाई करते हुए 2-1 के बहुमत से बेंच ने कहा कि ट्रंप ने टैरिफ लगाने के मामले में अपने अधिकारों का उल्लंघन किया है. कोर्ट के अनुसार, कांग्रेस ने राष्ट्रपति को कानून के तहत जो सीमित शक्तियां दी थीं, ट्रंप उनसे कहीं आगे निकल गए. अदालत ने अपने सख्त शब्दों में इन शुल्कों को 'अमान्य' और 'कानून द्वारा अनधिकृत' घोषित किया.
अब 'धारा 301' का सहारा लेगी ट्रंप सरकार?
भले ही कोर्ट ने धारा 122 के तहत लगाए गए शुल्कों को खारिज कर दिया हो, लेकिन ट्रंप प्रशासन हार मानने को तैयार नहीं है. प्रशासन की योजना अब अपने प्रमुख व्यापारिक साझेदारों पर एक तीसरे कानून के जरिए भारी टैरिफ जारी रखने की है. इसके लिए 'ट्रेड एक्ट 1974' की धारा 301 (Section 301) का इस्तेमाल किया जा रहा है.
धारा 301 मुख्य रूप से 'अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस'से संबंधित है. प्रशासन का मानना है कि यह कानून कई कानूनी बाधाओं को पार करने में सक्षम रहा है और इसके जरिए वे अपनी आर्थिक नीतियों को आगे बढ़ाना जारी रखेंगे. अब देखना यह होगा कि क्या कोर्ट के ताजा फैसले के बाद ट्रंप प्रशासन अपनी रणनीति में कोई बदलाव करता है या टकराव की यह स्थिति बरकरार रहती है.
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