चीन के बढ़ते सैन्य खतरे के बीच ताइवान के आम नागरिक अब हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे हैं बल्कि खुद को एक संभावित जंग के लिए तैयार कर रहे हैं. यूक्रेन युद्ध ने दुनिया को दिखा दिया है कि आधुनिक लड़ाई में छोटे-छोटे ड्रोन कितने घातक और मददगार साबित हो सकते हैं. इसी सबक को अपनाते हुए ताइवान में अब हर उम्र के लोग चाहे वो युवा हों या बुजुर्ग ड्रोन उड़ाने की ट्रेनिंग ले रहे हैं. राजधानी ताइपे के तंग कमरों से लेकर ग्राउंड तक नागरिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए यह पहली बार है जब आम लोगों को ड्रोन पायलट बनाने का एक बड़ा अभियान शुरू किया गया है.
द गार्जियन के मुताबिक, ताइपे के एक छोटे और खचाखच भरे कमरे में 48 साल का शख्स ड्रोन को हवा में स्थिर रखने की कोशिश कर रहा है. उसके हाथ में रिमोट कंट्रोलर है और उसकी उंगलियां जॉयस्टिक पर जमी हैं. जैसे ही बिना किसी दुर्घटना के ट्रैफिक कोन से घिरे एक आयताकार रास्ते से ड्रोन को सुरक्षित निकाल लेते हैं, पूरा कमरा तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता है. वह शख्स कहता है, "यूक्रेन के युद्ध ने ड्रोन के इस्तेमाल को पूरी तरह बदल दिया है. मैं इसे एक अतिरिक्त हुनर की तरह सीख रहा हूं, ताकि कल को अगर जरूरत पड़े तो मैं देश के काम आ सकूं."
कुमा एकेडमी में अगस्त तक सारे स्लॉट बुक
यह पूरा नजारा ताइवान के पहले 'नागरिक सुरक्षा ड्रोन प्रशिक्षण कार्यक्रम' का है. इसे 'कुमा एकेडमी' नाम के एक एनजीओ की ओर से शुरू किया गया है. मई में लॉन्च हुए इस कोर्स को लेकर ताइवानी नागरिकों में इस कदर दीवानगी है कि अगस्त तक के सभी सेशन एडवांस में ही फुल हो चुके हैं. इस कोर्स के जरिए हर महीने करीब 75 लोगों को प्रशिक्षित किया जा रहा है.
कुमा एकेडमी के प्रवक्ता तांग त्सुंग-यी का कहना है कि इस कोर्स का मकसद आम लोगों को यह समझाना है कि युद्ध के मैदान में ड्रोन क्या भूमिका निभा सकते हैं. दिलचस्प बात यह है कि इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में समाज का हर वर्ग बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहा है.
बिना जीपीएस वाले 'प्योर ताइवानी' ड्रोन
इस ट्रेनिंग की एक और बड़ी खासियत यह है कि क्लास में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन का वजन 100 ग्राम से भी कम है और ये पूरी तरह से ताइवान में बने हैं. इन ड्रोन्स में न तो कोई जीपीएस सिस्टम है और न ही कोई ऑटो-पायलट या सेल्फ-ड्राइविंग तकनीक. इसके पीछे एक बहुत ही सोची-समझी सैन्य रणनीति है. आधुनिक युद्ध में दुश्मन सबसे पहले इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग तकनीक का इस्तेमाल करके कॉमर्शियल ड्रोन के सिग्नल ब्लॉक कर देता है. ऐसे में ऑपरेटरों को ड्रोन को पूरी तरह से अपनी आंखों और मैनुअल रिफ्लेक्सिस से उड़ाना आना चाहिए.
यह फैसला ताइवान के उस बड़े अभियान का भी हिस्सा है, जिसके तहत वह ड्रोन की ग्लोबल सप्लाई चेन को पूरी तरह 'चीन-मुक्त' बनाना चाहता है. हालांकि, ताइवान की घरेलू राजनीति में इसे लेकर खींचतान जारी है.
अमेरिका ने छोड़ा साथ?
ताइवान की नागरिक उड्डयन प्राधिकरण (CAA) के अनुसार, दिसंबर तक देश में रजिस्टर्ड ड्रोन्स की संख्या 39,000 को पार कर चुकी थी. सरकार ने 2024 में ड्रोन रजिस्ट्रेशन की न्यूनतम उम्र घटाकर 14 वर्ष कर दी थी. अब ताइपे के कई हाई स्कूलों में गर्मियों की छुट्टियों में कैंप लगाए जा रहे हैं. यहां छात्रों को स्क्रैच से ड्रोन बनाना और उसका इस्तेमाल खोज और बचाव अभियानों में करना सिखाया जा रहा है. अगर चीन कभी ताइवान पर हमला करता है, तो ताइवान के पहाड़ी इलाकों और अग्रिम मोर्चों की निगरानी के लिए ये मानवरहित ड्रोन सबसे बड़े हथियार साबित होंगे.
यह पूरी तैयारी ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिका और ताइवान के रिश्तों को लेकर अनिश्चितता का माहौल है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी नेता शी जिनपिंग के बीच पिछले महीने बीजिंग में हुई मुलाकात के बाद, ट्रंप ने अभी तक ताइवान के लिए 14 अरब डॉलर के हथियार पैकेज पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. इसके अलावा, ताइवान के आंतरिक राजनीतिक मतभेदों ने भी आम लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि उन्हें बाहरी मदद के भरोसे रहने के बजाय खुद को तैयार करना होगा.
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