यमन में चल रहे लंबे संघर्ष के बीच सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों को करीब 1 अरब डॉलर (लगभग 8,000 करोड़ रुपये) का आर्थिक पैकेज देने की पेशकश की है. बदले में हूतियों से कहा गया है कि वे सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों, हवाई अड्डों और सैन्य ठिकानों पर होने वाले हमले बंद करें. यह दावा इजरायली अखबार इजरायल हयोम ने खाड़ी देशों के राजनयिक सूत्रों के हवाले से किया है.
रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रस्ताव ईरान के जरिए हूती नेतृत्व तक पहुंचाया गया है. सऊदी अरब और ईरान हाल के सालों में रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं और उसी कड़ी में यमन संघर्ष को कम करने के प्रयास भी तेज हुए हैं. बताया जा रहा है कि इस पैकेज का मकसद सीजफायर को मजबूत करना, सरकारी कर्मचारियों के लंबित वेतन का भुगतान कराना और हूती नियंत्रण वाले इलाकों में नागरिक ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है.
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सऊदी रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान हाल ही में तेहरान पहुंचे थे, जहां उन्होंने ईरानी अधिकारियों के साथ बातचीत की. अखबार ने एक सूत्र के हवाले से यह भी दावा किया कि मंत्री अपने साथ सऊदी वायुसेना के C-130 सैन्य परिवहन विमान से पैसे लेकर आए थे.
प्रस्ताव में क्या है?
बताया जा रहा है कि यह पैकेज उन पुराने समझौतों से जुड़ा है जिनके तहत सऊदी अरब हूती नियंत्रण वाले क्षेत्रों में सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पुनर्निर्माण कार्यों में आर्थिक मदद देने पर सहमत हुआ था. बदले में हूती विद्रोहियों को संघर्षविराम का पालन करना था और सऊदी क्षेत्र पर हमले रोकने थे.
हाल के महीनों में सऊदी हवाई अड्डों, तेल सुविधाओं और अन्य अहम ठिकानों पर खतरे बढ़ने के बाद रियाद इस व्यवस्था को दोबारा सक्रिय करना चाहता है. रिपोर्ट के मुताबिक, हूती पक्ष का आरोप है कि सऊदी अरब ने पहले किए गए कुछ वादों को पूरी तरह लागू नहीं किया, जिस कारण तनाव बना रहा.
ईरान की भूमिका क्यों अहम है?
ईरान लंबे समय से यमन संकट में एक अहम खिलाड़ी माना जाता है. तेहरान खुद को इस विवाद में मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है. हालांकि, पश्चिमी देशों और सऊदी अरब की ओर से ईरान पर हूतियों को समर्थन देने के आरोप भी लगते रहे हैं.
20 अक्टूबर को ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा था कि सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों ने बातचीत में मध्यस्थता की ईरानी पेशकश पर कोई जवाब नहीं दिया है.
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