सऊदी-तुर्की-पाकिस्तान... कागजी शेर साबित होगा 'इस्लामी नाटो'! फिर भी भारत को कर लेनी चाहिए ये तैयारी

मक्का समझौते में पाकिस्तान सिर्फ पैसे के चक्कर में शामिल हुआ है. उसकी हालत फिल्म 'दिल धड़कने दो' के उस पंजाबी बिजनेसमैन जैसी है, जो कंगाली की कगार पर होकर भी एक महंगी क्रूज यात्रा पर जाता है. ताकि कोई अमीर आदमी उसकी डूबती कंपनी में पैसा लगा दे.

सऊदी-तुर्की-पाकिस्तान... कागजी शेर साबित होगा 'इस्लामी नाटो'! फिर भी भारत को कर लेनी चाहिए ये तैयारी
कागजी शेर साबित होगा सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की का 'इस्लामी नाटो'

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुआ यह तीन-तरफा मक्का सुरक्षा समझौता अचानक से नहीं हुआ है. कई महीनों से इन तीनों देशों और मिस्र के बीच बातचीत चल रही थी. इस पूरे इलाके में एक नई सुरक्षा व्यवस्था तैयार करने की फुसफुसाहट साफ सुनाई दे रही थी. यह नया इंतजाम सऊदी और पाकिस्तान के बीच पहले से मौजूद द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते से इतर है. इस नए रणनीतिक बदलाव पर भारत में दो तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं.

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह भारत की सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा है. वहीं दूसरी तरफ, कुछ लोगों को इस बात पर संदेह है कि यह समझौता कभी जमीन पर काम भी कर पाएगा या नहीं. दोनों पक्षों के पास अपनी बात साबित करने के लिए ठोस तर्क हैं. लेकिन नतीजा चाहे जो भी निकले, भारत अपने दो दुश्मनों (पाकिस्तान और तुर्की) का एक दोस्त (सऊदी अरब) के साथ हाथ मिलाने के इस खेल को अनदेखा या खारिज नहीं कर सकता. 

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हालांकि, भारत को इससे घबराने की भी कोई दरकार नहीं है. भारत को बस एक ऐसी रणनीति की जरूरत है जो मक्का गठबंधन के असर को बेअसर कर सके और अगर यह पैक्ट नाकाम होता है, तो भारत के लिए नए रास्ते खोल सके.

यह पैक्ट पिछले 100 सालों से चले आ रहे पुराने सुरक्षा ढांचे के ढहने का नतीजा है. लेकिन यह सोचना जल्दबाजी होगी कि यह गठबंधन किसी नई क्षेत्रीय सुरक्षा की बुनियाद रख रहा है. इसे 'इस्लामिक नाटो' कहना या बगदाद पैक्ट (सेंटो) से इसकी तुलना करना थोड़ी ज्यादती होगी. 

उन पुराने गठबंधनों का नेतृत्व अमेरिका जैसी महाशक्ति कर रही थी, जो उन्हें मजबूती देती थी. लेकिन मक्का पैक्ट के पास ऐसी कोई ताकतवर ढाल नहीं है. 

तुर्की और सऊदी अरब की पुरानी दुश्मनी अभी पूरी तरह मरहम लगा भी नहीं है. अभी कुछ साल पहले ही तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन, खशोगी हत्याकांड को लेकर सऊदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पर लगातार हमले बोल रहे थे. आज अगर उन्होंने अपने मतभेद दबा भी दिए हैं, तो इसका कोई बड़ा मतलब नहीं है; क्योंकि इस इलाके में कोई किसी का स्थायी दोस्त नहीं होता और रिश्ते तो रातों-रात बदल जाते हैं.

गठबंधन में तीसरा देश 'पाकिस्तान' है, जो सिर्फ पैसे के चक्कर में इसमें शामिल हुआ है. उसकी हालत फिल्म 'दिल धड़कने दो' के उस पंजाबी बिजनेसमैन जैसी है, जो कंगाली की कगार पर होकर भी एक महंगी क्रूज यात्रा पर जाता है. इस उम्मीद में कि कोई अमीर आदमी उसकी डूबती कंपनी में पैसा लगा दे. ऐसे में इसे नया 'नाटो' कहना बेमानी है, जबकि खुद नाटो इस वक्त बिखराव के दौर से गुजर रहा है.

इस समझौते में 'सामूहिक रक्षा' (एक पर हमला यानी सब पर हमला) की बड़ी-बड़ी बातें कही जा रही हैं. लेकिन इसका असली मतलब क्या है, यह किसी को नहीं पता. 

नाटो के अनुच्छेद 5 में साफ लिखा है कि हमला होने पर सब कैसे एक साथ आएंगे, लेकिन मक्का पैक्ट को बिल्कुल गुप्त रखा गया है. क्या यह गोपनीयता इसलिए रखी गई है ताकि मौका आने पर देश पीछे हट सकें? या फिर इसलिए क्योंकि हर देश की जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं और इसे उजागर करने पर भारी विरोध हो सकता है? 

आसान लफ्जों में कहें तो, जो सऊदी अरब खुद पर हुए ईरानी या हूती हमलों से अपनी रक्षा नहीं कर सका, उससे यह उम्मीद करना बेमानी है कि वह पाकिस्तान को बचाने अपनी फौज भेजेगा. हूती विद्रोहियों ने तो इस समझौते के कुछ ही घंटों बाद सऊदी पर मिसाइलें दाग दीं, लेकिन उसके नए सहयोगियों के मुंह से एक शब्द तक नहीं निकला. शायद सऊदी की जिम्मेदारी सिर्फ पाकिस्तान को पैसा, कूटनीतिक और राजनीतिक समर्थन देने तक ही सीमित रहेगी.

लेकिन पाकिस्तान से क्या उम्मीद है? अब तक तो वह सऊदी से किए अपने वादों पर खरा नहीं उतरा है. इसके अलावा, तुर्की जो खुद नाटो का सदस्य है, उसे किसी हमले के वक्त पाकिस्तान या सऊदी की मदद की जरूरत क्यों पड़ेगी?

यह माना जा सकता है कि इन तीनों देशों की सेनाओं के पास अलग-अलग तरह की ताकत है, लेकिन किसी के पास भी अपने इलाके से बाहर जाकर युद्ध लड़ने की वो सलाहियत नहीं है जो अमेरिका के पास है. 

चीन जैसी बड़ी ताकत भी अपने पड़ोस से दूर जाकर लंबा युद्ध नहीं खींच सकती. ऐसे में इन देशों का अपनी सेनाएं दूसरे देश की हिफाजत के लिए भेजना जमीनी हकीकत से परे लगता है. आज के दौर में मिसाइलों और ड्रोन की वजह से कोई भी जगह सुरक्षित नहीं है.

ईरान ने यह साबित कर दिया है कि युद्ध का दायरा बढ़ाना और दुश्मन के सहयोगियों को दूर से ही निशाना बनाना एक कारगर तरीका है. यही वजह थी कि सुरक्षा समझौता होने के बावजूद पाकिस्तान, सऊदी की रक्षा के लिए मैदान में नहीं उतरा और केवल कूटनीति तक सीमित रहा. कल को अगर भारत और पाकिस्तान के बीच जंग होती है, तो इस बात की कितनी संभावना है कि सऊदी या तुर्की अपनी फौज या हथियार पाकिस्तान भेजेंगे? 

और अगर वे शामिल होते हैं, तो क्या वे भारत की कार्रवाई से बच पाएंगे? वैसे भी, भारत और सऊदी के मजबूत आर्थिक रिश्तों को देखते हुए, क्या सऊदी पाकिस्तान के लिए भारत से रिश्ते बिगाड़ेगा? या फिर यह एकतरफा समझौता है जहां पाकिस्तान को सिर्फ कुछ पैसों के बदले चौकीदारी का काम सौंपा गया है?

क्षेत्र में सुरक्षा का मसीहा बनने का दावा करना एक बात है, लेकिन इसके लिए जिस सैन्य और आर्थिक ताकत की जरूरत होती है, वह इन तीनों देशों के पास मिला-जुलाकर भी नहीं है.

कोई देश क्षेत्रीय सुरक्षा का जिम्मा तब उठाता है जब उसके पास अपनी सामरिक और आर्थिक जरूरतों की रक्षा के लिए अपार संसाधन हों, न कि सिक्योरिटी गार्ड की तरह पैसे कमाने के लिए. पाकिस्तान और तुर्की इस सिद्धांत का मजाक उड़ा रहे हैं. 

वैसे भी, जब अमेरिका जैसी महाशक्ति ईरान के सामने पस्त हो गई, तो इस बात की क्या उम्मीद है कि यह त्रिकोणीय गठबंधन ईरान का मुकाबला कर पाएगा?

देखा जाए तो यह पैक्ट इन तीनों देशों की अपनी-अपनी मजबूरी का नतीजा है. पाकिस्तान इस गठबंधन के जरिए पैसा कमाकर अपनी खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को संभालना चाहता है और कूटनीतिक मदद चाहता है. 

सऊदी अरब को ईरान के हमलों से बचने के लिए फौजी मदद की तलाश है. वहीं तुर्की, सऊदी के पेट्रो-डॉलर से अपना रक्षा कारोबार चमकाना चाहता है. इसके साथ ही, तुर्की इस्लामिक दुनिया में अपना दबदबा और अगुवाई दोबारा हासिल करना चाहता है, जो न तो सऊदी अरब को बर्दाश्त होगा और न ही ईरान को.

इसलिए इस समझौते पर शक होना जायज है. लेकिन इसे पूरी तरह नजरअंदाज कर देना भारत के लिए बहुत बड़ी भूल होगी. पश्चिम एशिया का सुरक्षा माहौल पूरी तरह बदल चुका है. यह पैक्ट चले या न चले, इस इलाके के देश अपने लिए नए और भरोसेमंद जोड़ीदार तलाश रहे हैं. 

भारत सिर्फ तमाशबीन बनकर नहीं बैठ सकता, क्योंकि इस इलाके में हमारे गहरे आर्थिक और रणनीतिक हित जुड़े हैं. अगर भारत की नीति सिर्फ चुपचाप बैठकर इसके टूटने का इंतजार करने की है, तो यह हमारी बहुत बड़ी नादानी होगी.

हाल के महीनों में भारत के आसपास का सामरिक माहौल काफी उलझ गया है. अमेरिका के साथ रणनीतिक रिश्ते अब पुरानी बात हो चुके हैं. भारत को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं पर दोबारा विचार करना होगा. अगर इस समीकरण में चीन का पहलू भी जुड़ जाए, तो स्थिति और गंभीर हो जाती है. 

अगर तुर्की के जरिए पाकिस्तान को सऊदी का पैसा और पश्चिमी तकनीक मिलने लगती है, तो यह भारत की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकता है. भले ही पाकिस्तान की अंदरूनी कमजोरियां भारत के लिए राहत की बात हों, लेकिन केवल उसके भरोसे हाथ पर हाथ रखकर बैठना बेवकूफी होगी.

भारत को अब उन क्षेत्रीय साझेदारों के साथ गहरे सुरक्षा समझौते करने में हिचकना बंद कर देना चाहिए जो भरोसेमंद हैं और जिनके साथ हमारे हित मिलते हैं.

अतीत में कई खाड़ी देशों ने भारत के साथ समझौते की पहल की थी, लेकिन भारत ने झिझक दिखाई. बदलते माहौल में भारत को मक्का पैक्ट का जवाब देने के लिए नए गठबंधन बनाने होंगे. भारत को न केवल बहुपक्षीय समझौतों पर काम करना होगा, बल्कि संयुक्त अरब अमीरात, इजरायल, ग्रीस, साइप्रस और आर्मेनिया जैसे अहम साझेदारों के साथ अपने संबंधों में नई जान फूंकनी होगी. 

इसके साथ ही, भारत को ईरान के साथ भी अपने संबंध मजबूत रखने होंगे, जो इस इलाके में एक बड़ी ताकत बनकर उभर रहा है. यह काम आसान नहीं है, लेकिन कुशल कूटनीति इसी को कहते हैं.

अब समय आ गया है कि भारतीय राजनयिक इस सोच से बाहर निकलें कि कूटनीति का मतलब सिर्फ पाकिस्तान जैसे दुश्मनों से बातचीत करते रहना है. कूटनीति का असली मकसद भारत के हितों की रक्षा करना है और यह तुर्की, पाकिस्तान जैसे देशों के आगे-पीछे घूमने से नहीं, बल्कि दुश्मनों के दुश्मनों के साथ मजबूत गठबंधन बनाने से हासिल होगा. यही रणनीति भारत को हर स्थिति में मजबूत बनाए रखेगी, फिर चाहे मक्का पैक्ट टिके या अपने ही अंतर्विरोधों के बोझ तले ढह जाए.

(इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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