- स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की 95वीं पुण्यतिथि पाकिस्तान के लाहौर में शादमान चौक पर मनाई गई
- भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन ने समारोह आयोजित किया जिसमें क्रांतिकारियों को श्रद्धांजलि दी गई
- पाकिस्तान सरकार से भगत सिंह को निशान-ए-पाकिस्तान पुरस्कार देने और भारत से भारत रत्न प्रदान करने की अपील की गई
Shaheed Diwas 2026: भारत के क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की 95वीं पुण्यतिथि सोमवार, 23 मार्च को पाकिस्तान के लाहौर में मनाई गई. लाहौर पाकिस्तान के पंजाब की राजधानी है. भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन ने लाहौर के शादमान चौक में एक कार्यक्रम आयोजित किया था. यही वह जगह है जहां भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च 1931 को ब्रिटिश सरकार ने फांसी दी थी. कार्यक्रम में शामिल लोगों ने इन क्रांतिकारियों को श्रद्धांजलि दी और उनके बलिदान को याद करने के लिए मोमबत्तियां जलाईं.
समारोह की अध्यक्षता करते हुए फाउंडेशन के प्रमुख इम्तियाज रशीद कुरैशी ने कहा कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव अत्याचार, तानाशाही और अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध के जीवित प्रतीक हैं. वहीं सीनियर लॉ एक्सपर्ट राजा जुल्करनैन ने कहा कि इन क्रांतिकारियों ने मानवता, शांति और स्वतंत्रता के लिए धर्म, नस्ल और सीमाओं की बाधाओं को पार किया. उन्होंने कहा, “भगत सिंह का संदेश आज भी गूंजता है कि मस्जिद, मंदिर, चर्च और गुरुद्वारे सभी शांति के केंद्र हैं, और सहिष्णुता, न्याय और सद्भाव के बिना कोई भी समाज वास्तव में आगे नहीं बढ़ सकता.”
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संगठन के उपाध्यक्ष मलिक इहतिशामुल हसन ने कहा कि भगत सिंह उपमहाद्वीप की साझा विरासत का प्रतीक हैं और उन्हें बांटा नहीं जा सकता. उन्होंने कहा, “वह पाकिस्तानियों और भारतीयों दोनों के दिलों में रहते हैं और दोनों देशों के सच्चे नायक हैं.”
एक अन्य प्रस्ताव में मांग की गई कि लाहौर के शादमान चौक का नाम भगत सिंह के नाम पर रखा जाए. फाउंडेशन ने यह भी सुझाव दिया कि उनके सम्मान में स्मारक डाक टिकट और सिक्के जारी किए जाएं, और उनकी संघर्ष गाथा को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए ताकि नई पीढ़ी को स्वतंत्रता और प्रतिरोध की भावना के बारे में शिक्षा दी जा सके.
समारोह का समापन अत्याचार के खिलाफ संघर्ष जारी रखने और शांति को बढ़ावा देने की शपथ के साथ हुआ. बता दें कि भगत सिंह ने अंग्रेजों से आजादी के लिए संघर्ष किया था. उन्हें और उनके दोनों साथियों को पहले आजीवन कारावास की सजा दी गई थी, लेकिन बाद में एक षड्यंत्र मामले में उन्हें मृत्युदंड दिया गया.
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