- पाकिस्तान का सरकार के बाद, उसकी सेना ने भी सिंधु जल संधि रोकने पर हर कदम उठाने की गीदड़ भभकी दी है
- बिलावल भुट्टो जरदारी ने भी चेतावनी दी कि पाकिस्तान सिंधु के पानी को लेकर सभी मोर्चों पर लड़ने के लिए तैयार है
- भारत ने कहा कि पाकिस्तान के सीमा-पार आतंकवाद को समर्थन देने की वजह से सिंधु जल संधि अभी भी रुकी हुई है
आतंकवाद को नेशनल पॉलिसी का हिस्सा बनाने वाले पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की गीदड़ भभकी खत्म नहीं हो रही. पाकिस्तान का सरकार के बाद, उसकी सेना ने भी सिंधु जल संधि के तहत अपने 'हक के पानी' को सुनिश्चित करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाने का वादा किया है. पहलगाम के कायराना आतंकी हमले के बाद से ही भारत ने साफ कर दिया है कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकता. 1960 की इस जल-बंटवारा संधि को भारत ने स्थगित कर दिया था और इसका दर्द पाकिस्तान को महसूस हो रहा है.
पिछले 6 दशक से यह संधि परमाणु हथियार से लैस इन दोनों पड़ोसियों के बीच सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के पानी के बंटवारे और इस्तेमाल को नियंत्रित करती रही है.
पाकिस्तानी सेना ने क्या कहा?
पाकिस्तानी सेना ने एक बयान में कहा कि चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज आसिम मुनीर की अध्यक्षता में सेना के टॉप अधिकारियों की बैठक हुई. इस बैठक में सरकार के निर्देशों और पाकिस्तान की जनता की इच्छाओं के अनुसार पाकिस्तान के हक का पानी मिलना सुनिश्चित करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाने का पक्का संकल्प लिया गया. पाक सेना ने कहा कि 276वीं कोर कमांडर्स कॉन्फ्रेंस ने 24 अप्रैल, 2025 के नेशनल सिक्योरिटी कमेटी (NSC) के निर्देश में दी गई गाइडेंस को फिर से दोहराया है.
पाकिस्तान की NSC गाइडलाइंस क्या हैं?
पिछले साल पाकिस्तान की NSC (नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल) की बैठक में पानी रोकने या उसका रास्ता बदलने की किसी भी हरकत को 'युद्ध की कार्रवाई' मानने का फैसला किया गया था. इस फोरम ने मौजूदा सुरक्षा हालात का जायजा लिया और पाकिस्तानी सेना की ऑपरेशनल तैयारी, प्रोफेशनलिज्म और लड़ाई के लिए तैयार रहने की क्षमता पर संतोष जाहिर किया था. इसने चरमपंथी गुटों द्वारा पाकिस्तान के अंदर हमले करने के लिए "अफगान तालिबान शासन के कंट्रोल वाले इलाके के लगातार इस्तेमाल" पर गहरी चिंता जताई.
बिलावल भुट्टो की धमकी
पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (PPP) के चेयरमैन बिलावल भुट्टो जरदारी ने भी चेतावनी दी कि पाकिस्तान सिंधु के पानी को लेकर सभी मोर्चों पर लड़ने के लिए तैयार है. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक जनसभा के वीडियो में, बिलावल भुट्टो को भारत पर सिंधु नदी के पानी को हथियार बनाने की कोशिश का आरोप लगाते हुए सुना जा सकता है. उन्होंने कहा कि इस्लामाबाद अपने अधिकारों से कोई समझौता नहीं करेगा.
उन्होंने कहा, "सिंधु जल संधि पर कोई समझौता नहीं होगा. अगर हमें भारत के साथ युद्ध लड़ना पड़ा, तो हम लड़ेंगे." NDTV स्वतंत्र रूप से यह पुष्टि नहीं कर सका कि रैली कब हुई थी.
भारत का स्टैंड
ये धमकियां पिछले हफ्ते आईं, जब नई दिल्ली ने कहा कि पाकिस्तान के सीमा-पार आतंकवाद को समर्थन देने की वजह से सिंधु जल संधि अभी भी रुकी हुई है. भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, "पाकिस्तान को सीमा-पार आतंकवाद को अपना समर्थन भरोसेमंद और पक्के तौरपर छोड़ना होगा."
पहलगाम अटैक के बाद से ही भारत का स्टैड क्लियर रहा है- कोई भी संधियां जमीनी हकीकत से अलग होकर काम नहीं कर सकतीं. जब तक पाकिस्तान असामान्य दुश्मनी को दूर नहीं करता तब तक दुनिया का सबसे चर्चित जल-बंटवारा समझौता कई तरह से रुका रहेगा.
सिंधु जल पर पाकिस्तान की निर्भरता
विश्व बैंक की मध्यस्थता में 1960 में हुई सिंधु जल संधि, सिंधु और उसकी सहायक नदियों से पानी के बंटवारे को नियंत्रित करती है. इसके तहत, भारत पूर्वी नदियों- रावी, सतलुज और ब्यास को नियंत्रित करता है, जबकि पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों- सिंधु, झेलम और चिनाब का पानी मिलता है. संधि के तहत, भारत, जो ऊपरी बेसिन पर है, मानसून के मौसम में सिंधु जल आयुक्तों के माध्यम से पाकिस्तान के साथ बाढ़ की चेतावनी भी शेयर करता था.
अब संधि के रुके होने के कारण नई दिल्ली अब जानकारी शेयर करने के लिए बाध्य नहीं है. इसके अलावा, नई दिल्ली सिंधु बेसिन में कई जलविद्युत परियोजनाओं (हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स) को भी आगे बढ़ा रही है, जैसे कि सावलकोट, रातले, बुरसर, पाकल दुल, क्वार, किरू, और किर्थाई I और II. ध्यान रहे कि पाकिस्तान की लगभग 80-90 प्रतिशत खेती सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है. इसकी जल भंडारण क्षमता मुश्किल से एक महीने के प्रवाह को ही संभाल पाती है. इसके प्रमुख जलाशय - तरबेला और मंगला - कथित तौर पर 'डेड स्टोरेज' (न्यूनतम जल स्तर) के करीब हैं.
जो कभी दोनों देशों के बीच एक तकनीकी संधि व्यवस्था थी, वह अब रणनीतिक दबाव का बिंदु बन गई है. इसलिए, भारत के कदम पर इस्लामाबाद झुंझला रहा है. पिछले एक साल में, पाकिस्तान ने राजदूतों को तलब किया है, दुनिया भर में प्रतिनिधिमंडल भेजे हैं, संयुक्त राष्ट्र यानी UN को लेटर लिखा है, कई कानूनी कार्रवाई शुरू की हैं और कई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किए हैं - ये सभी एक ही नैरेटिव पर केंद्रित हैं कि भारत ने उसकी सबसे संवेदनशील कमजोरी को निशाना बनाया है.
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