- एक्सपर्ट ने बताया कि यूरोप के लोग कभी इतनी भीषण गर्मी का सामना करने के लिए तैयार ही नहीं थे.
- यूरोप के अधिकांश घरों में कूलर नहीं हैं. वहां के घर गर्मी के लिए बने ही नहीं हैं.
- जो संकेत मिल रहे हैं वो स्थिति को बेहद गंभीर बता रहे हैं, जिस पर फौरन काम किए जाने की जरूरत है.
यूरोप में जून के अंत में आई भीषण गर्मी ने 10 हजार से अधिक लोगों की जान ले ली, ये गर्मी जलवायु परिवर्तन की एक भयावह हकीकत बन चुकी है. यूरोप पर आज सबसे तेजी से गर्म होने वाले महाद्वीप का तमगा लग चुका है और इस समय यह मौसम की वो मार झेल रहा है जिसे हीटडोम का नाम दिया गया है.
दरअसल, समु्द्र की सतह पर सामान्य से अधिक गरमी और उस पर हवा के लगातार बने उच्च दबाव ने पूरे यूरोप के ऊपर गर्म हवा को रोक रखा है. NDTV ने इस पूरे मसले पर ब्रिटेन, जर्मनी और स्लोवाकिया के क्लाइमेट एक्सपर्ट्स और पर्यावरण विदों से बात की. इन एक्सपर्ट्स ने जो बताया वह बेहद भयावह है. इनका कहना है कि यूरोपीय महाद्वीप की रूपरेखा और यहां रहने वाले लोग कभी इतनी भीषण गर्मी का सामना करने के लिए तैयार ही नहीं थे.
ये संकेत दे रहे हैं कि स्थिति बेहद गंभीर है, जिस पर फौरन काम किए जाने की जरूरत है. तो क्या दुनिया अब एक तरह के जलवायु इमरजेंसी की तरफ बढ़ रही है?

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ब्रिटेनः 2700 मौतें, बुनियादी ढांचे पिघल रहे
आवर किड्स क्लाइमेट की को-डायरेक्टर माया मेलर इन दिनों लंदन की भीषण गर्मी का सामना कर रही हैं. कुछ वर्षों पहले लंदन में हीटवेव की कल्पना भी मुश्किल थी लेकिन अब ये एक हकीकत बन चुकी है. ब्रिटेन में इस गर्मी से लोग केवल असहज नहीं हैं, बल्कि अब जानलेवा संकट बन गई है.
माया मेलर बताती हैं, "इम्पीरियल कॉलेज लंदन, लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन (LSHTM) और यूके मेट ऑफिस की एक स्टडी के मुताबिक मई और जून में लगातार आई हीटवेव के कारण केवल ब्रिटेन में ही करीब 2700 लोगों की समय से पहले मौत हुई."
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यूरोप में आम लोगों के घरों में जरूरी नहीं है कि कूलर हों
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घरों में कूलर नहीं, गर्मी के लिए नहीं बने हैं घर
NDTV से बातचीत में उन्होंने बताया कि यूरोप में ये भीषण गर्मी आम लोगों के स्वास्थ्य और जरूरी सेवाओं पर बहुत भारी दबाव बना रही है. इससे परिवारों की सामान्य जिंदगी पर भी असर पड़ा जब हजारों की संख्या में स्कूलों को हीटवेव के दौरान बंद करना पड़ा.
उन्होंने कहा, "स्कूल दोबारा खुल चुके हैं, लेकिन घरों में गर्मी अब भी बनी हुई है. लोगों के घरों में जरूरी नहीं है कि कूलर हों. खासकर ऊंची इमारतों और ऊपर की मंजिलों पर रहने वाले लोगों के लिए हालात बेहद मुश्किल हैं."
मेलर के मुताबिक असली समस्या ये है कि ब्रिटेन की इमारतें और पूरा सार्वजनिक ढांचा इस गर्मी के लिए बनाए ही नहीं गए हैं.
उन्होंने कहा, "ब्रिटेन की ज्यादातर इमारतें ठंडे मौसम को ध्यान में रखकर बनाई गई थीं. ये इमारतें गर्मी को बाहर निकालने के बजाय भीतर रोक लेती हैं. यही स्थिति अंडरग्राउंड मेट्रो सिस्टम की भी है, जहां गर्मी फंसी रह जाती है."

28 जून 2026 की इस तस्वीर में आयरनमैन हाफ-मैराथन के दौरान मेन नदी के किनारे एक एथलीट. हीट वेव के कारण 24वीं आयरनमैन यूरोपियन चैंपियनशिप का फॉर्मेट काफी छोटा कर दिया गया.
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जर्मनी: रिकॉर्ड तापमान और 'रेड कार्ड' शहर
पश्चिमी यूरोप में हालात भी कम गंभीर नहीं हैं. NDTV ने वॉर्म्स नगर पालिका के पूर्व क्लाइमेट अडैप्टेशन अधिकारी और कोबर्ग एप्लाइड साइंस यूनिवर्सिटी में रिसर्च असिस्टेंट मार्को एलिशर से बात की.
एलिशर कहते हैं, "पिछला महीना पश्चिमी यूरोप के इतिहास का सबसे गर्म जून रहा. जर्मनी में 41.7 डिग्री सेल्सियस का नया तापमान रिकॉर्ड बना. जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसी हीटवेव अब ज्यादा बार आएंगी और ज्यादा लंबे समय तक रहेंगी. यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप है."
उन्होंने सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन को इस हीटवेव की वजह बताया.
साउथ जर्मनी के मैनहाइम शहर के रहने वाले एलिशर कहते हैं कि राइन नदी घाटी पर बसा उनका इलाका देश के सबसे गर्म क्षेत्रों में आता है. शहर के प्रशासन जलवायु के मुताबिक योजनाओं पर काम तो कर रहा है लेकिन गर्मी का असर आम जिंदगी पर स्पष्ट रूप से दिख रहा है. गर्मी से होने वाली मौतें भी बढ़ रही हैं.
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दक्षिण पूर्व स्लोवाकिया के माले ट्रैकेनी में 28 जून, 2026 को भीषण गर्मी के बीच, लोग तिस्जा नदी के पानी का आनंद लेते हुए
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मध्य यूरोप में स्लोवाकिया की चेतावनी
हीट डोम अब मध्य यूरोप के उन देशों को भी प्रभावित कर रहा है जिन्हें पहले अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता था.
NDTV ने स्लोवाकिया की टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ कोसिसे की प्रोफेसर मार्टिना जेलेनाकोवा से बात की.
उन्होंने कहा, "मैं मध्य यूरोप के स्लोवाकिया से हूं. इस क्षेत्र के कई देशों की तरह स्लोवाकिया में भी अब अत्यधिक गर्मी, लंबे सूखे और अनियमित बारिश की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं."
जेलेनाकोवा का कहना है कि लोगों की गतिविधियों से बढ़ा ग्लोबल वार्मिंग इन घटनाओं की सबसे बड़ी वजह है.
उन्होंने कहा, "इन परिस्थितियों का असर आम लोगों के स्वास्थ्य, खेती, जल संसाधनों और बुनियादी ढांचे पर पड़ रहा है. जो इलाके पहले अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाते थे, वे भी अब जलवायु परिवर्तन से जुड़ी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं."
NDTV से बातचीत में यूरोप के तीन अलग-अलग देशों के तीनों एक्सपर्ट ने माना कि महज इमरजेंसी इंतजामों से अब बात नहीं बनेगी. जरूरत ये है कि हीटवेव को अब हर साल होने वाली वास्तविक और स्थायी घटना मान कर आगे की तैयारी की जाए.

नीदरलैंड के एम्सटर्डम में इंडस्ट्रियल चिमनियां से उठता धुआं
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जीवाश्म वाले ईंधनों पर निर्भरता घटानी होगी
एक्सपर्ट्स ने ये भी कहा कि यूरोप के लगातार गर्म होने की सबसे बड़ी वजह तेल, गैस और कोयले जैसे जीवाश्म ईंधन हैं.
माया मेलर कहती हैं, "हमें तेल, गैस और कोयले का इस्तेमाल कम करते हुए इसे बंद करना होगा. यही ईंधन गर्मी को वातावरण में रोकते हैं और प्रदूषण बढ़ाते हैं."
उनका कहना है कि इसकी जगह सोलर एनर्जी और पवन ऊर्जा जैसी स्वच्छ एवं सस्ती ऊर्जा को बेहद तेजी से अपनाना होगा.
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शहरों को गर्मी के मुताबिक ढालना होगा
इस भीषण गर्मी ने ये भी दिखाया कि यूरोप की इमारतें, सड़कें और अन्य मौजूदा सार्वजनिक ढांचा इसे झेलने के लिए तैयार नहीं हैं.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि घरों, स्कलों और दफ्तरों को इस तरह तैयार करना होगा वो उच्च तापमान का सामना कर सकें.
जेलेनाकोवा और मेलर के मुताबिक शहरों में बड़े पैमाने पर हरित क्षेत्र बढ़ाने होंगे, स्थानीय जंगलों को बहाल करना होगा और ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने होंगे. साथ ही इमारतों में जरूरत के मुताबिक एयर कंडीशनिंग जैसी सुविधाएं भी तैयार करनी होंगी.

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सबसे कमजोर लोगों को प्राथमिकता
एलिशर और जेलेनाकोवा ने जलवायु वित्त और योजनाओं को लेकर भी चिंता जताई.
उनका कहना है कि कई बार शहर जल्दबाजी में ऐसे उपाय अपना लेते हैं जो बाद में नई समस्याएं पैदा कर देते हैं. इसे मैलअडैप्टेशन कहा जाता है.
एक्सपर्ट्स के अनुसार, शहरों को रहने लायक बनाए रखने के लिए योजनाएं सबसे कमजोर लोगों को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए.
एलिशर के मुताबिक स्थानीय प्रशासन और आपातकालीन चेतावनी प्रणाली को गर्भवती महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों, पहले से बीमार लोगों, प्रवासियों और खराब इन्सुलेशन वाले ऊंचे फ्लैटों या कम आय वाले इलाकों में रहने वाले परिवारों को सबसे पहले सुरक्षा और सहायता देनी चाहिए.
यूरोपीय जलवायु के इन एक्सपर्ट्स से बातचीत में एक कड़वी सच्चाई सामने आई कि दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होता यह महाद्वीप अब ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां सवाल सिर्फ आज की हीटवेव का नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों का है. सबसे बड़ा डर यही है कि कहीं आज की यह भीषण गर्मी भविष्य की तुलना में सबसे ठंडी गर्मी साबित न हो जाए.
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