इटली में अगले साल आम चुनाव होने हैं. इससे पहले प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी एक ऐसा प्रस्ताव लेकर आई हैं, जो अगर कानून बना तो वहां का पूरा चुनावी सिस्टम ही बदल जाएगा. मेलोनी अपने इस प्रस्ताव को इटली की राजनीतिक अस्थिरता के लिए जरूरी बता रही हैं तो वहीं विपक्ष इसे 'तानाशाही रवैया' बता रहा है. मेलोनी का दावा है कि अगर ये प्रस्ताव लागू होता है तो इटली में राजनीतिक स्थिरता आएगी. वह इसलिए, क्योंकि इटली यूरोप के सबसे राजनीतिक अस्थिर वाले देशों में से एक है. इटली में सरकारें जल्दी गिर जाती हैं और यही कारण है कि ज्यादातर प्रधानमंत्री 5 साल का कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाते. इटली में पिछले 25 साल में 10 प्रधानमंत्री हो चुके हैं और मेलोनी 11वीं प्रधानमंत्री हैं.
क्या है मेलोनी का प्रस्ताव?
चुनावी सिस्टम में सुधार और राजनीतिक स्थिरता के लिए मेलोनी जो प्रस्ताव लेकर आई हैं, उसमें सबसे अहम 'आनुपातिक प्रतिनिधित्व' यानी प्रपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन की व्यवस्था है.
इसमें 'मेजोरिटी प्राइज' या 'बोनस' के तौर पर कुछ सीटें उस गठबंधन को दी जाएंगी, जिसे सबसे ज्यादा वोट मिलेंगे. इससे वह गठबंधन सरकार चला सकेगा, भले ही उसे 'बहुमत' न मिला हो.
इटली में ज्यादातर पार्टियां गठबंधन से ही चुनाव लड़ती हैं, ताकि सरकार बना सकें. मेलोनी के प्रस्ताव में तीन बड़ी बाते हैंः-
- पहलीः चुनाव लड़ने वाले गठबंधन को पहले ही अपने प्रधानमंत्री उम्मीदवार का ऐलान करना होगा.
- दूसरीः संसद में 'बोनस' के तौर पर 17.5% सीटें लेने के लिए गठबंधन को कम से कम 42% वोट हासिल करने होंगे.
- तीसरीः अगर किसी गठबंधन या पार्टी को 42% वोट नहीं मिलते हैं तो फिर सीटों का बंटवारा वोट शेयर के हिसाब से ही होगा.
यह भी पढ़ेंः 'नहीं छोड़ सकती' से 'छोड़ दी' तक... इटली की PM मेलोनी और उनकी सिगरेट के किस्से

अभी क्या है इटली का सिस्टम?
इसे समझने के लिए सबसे पहले इटली का चुनावी सिस्टम समझना होगा. इटली का चुनावी सिस्टम भारत जितना आसान नहीं है. बल्कि काफी टेढ़ा-मेढ़ा है.
भारत की तरह ही इटली में भी दो सदनों वाली संसद है. निचले सदन को चैंबर ऑफ डिप्टीज कहा जाता है, जबकि ऊपरी सदन को सीनेट कहते हैं. चैंबर ऑफ ड्यूटीज में 400 और सीनेट में 200 सीटें होती हैं.
अब यहां का सिस्टम ऐसा है कि सभी सीटों पर सांसद सीधे नहीं चुने जाते हैं. इटली में 37% यानी 147 सीटों पर डायरेक्ट चुनाव होते हैं. जबकि, बाकी सीटों का अनुपात के आधार पर बंटवारा होता है, यानी जिस गठबंधन को डायरेक्ट चुनाव में जितने प्रतिशत वोट मिले, उस हिसाब से सीट मिल जाती है.
इसे ऐसे समझिए कि 2022 के चुनाव में मेलोनी के गठबंधन को डायरेक्ट वोटिंग में 43.79% वोट मिले और उसने 147 में से 121 सीटें जीतीं. इसी वोट प्रतिशत के आधार पर गठबंधन को अनुपात के आधार पर 114 सीटें मिलीं. मेलोनी के गठबंधन में 4 पार्टियां थीं. इस तरह से संसद में उनके गठबंधन के पास 237 सीटें हैं.
यह भी पढ़ेंः यूक्रेन के सामने 20 मिनट ही टिक पा रहे पुतिन के सैनिक, 'नौसिखियों की फौज' बनी सिरदर्द... रिपोर्ट में दावा
तो नए प्रस्ताव से क्या बदलेगा?
मेलोनी पूरी कोशिश कर रही हैं कि उनका प्रस्ताव संसद से पास हो जाए. इसके लिए संविधान में बदलाव करना होगा. अगर ऐसा होता है तो इटली का चुनावी सिस्टम बहुत बदल जाएगा.
माना जा रहा है कि इससे मेलोनी और उनके गठबंधन को जबरदस्त फायदा हो सकता है और थोड़ी सी भी बढ़त उन्हें आसान जीत दिलाने के लिए काफी होगी.
फरवरी में पोलिंग फर्म 'YouTrend' ने एक स्टडी की थी और अनुमान लगाया था कि अगले साल होने वाले आम चुनाव में डायरेक्ट वोटिंग में किसी भी गठबंधन को बहुमत नहीं मिलेगा. हालांकि, मेलोनी का गठबंधन सबसे आगे रहेगा. YouTrend का कहना है, 'बोनस सीट पूरी तरह से मेलोनी वाले दक्षिणपंथी गठबंधन को मिलेगा, क्योंकि उसे सबसे ज्यादा वोट मिलने का अनुमान है. इससे कुछ प्रतिशत ज्यादा वोट की बढ़त भी मजबूत बहुमत मिल जाएगा.'
इटैलियन अखबार 'ला स्टैम्पा' के मुताबिक, फरवरी में मेलोनी का दक्षिणपंथी गठबंधन 4% वोटों से आगे चल रहा है. प्रस्तावित कानून के तहत, मेलोनी के गठबंधन को बोनस के साथ संसद की 400 में से 242 सीटें मिल सकती हैं, जबकि विपक्ष के खाते में 152 सीटें आने की उम्मीद है.
यह भी पढ़ेंः खिड़कियां खोलें-पंखे चलाएं... 40 डिग्री गर्मी में भी ब्रिटेन सरकार घरों से क्यों हटवा रही AC?

क्या पास होगा मेलोनी का प्रस्ताव?
अपने इस प्रस्ताव को लेकर पिछले हफ्ते मेलोनी ने एक रैली में कहा था, 'आज यूरोप में हमें स्थितरता के आधार के तौर पर देखा जाता है, जबकि पहले हम स्थिर यूरोप में एक अस्थिर इटली थे.' उन्होंने जोर देते हुए कहा था, 'मैं बिल्कुल नहीं चाहती कि इटली फिर से अस्थिर हो जाए.'
उन्होंने अपने प्रस्ताव के बचाव में तर्क देते हुए कहा था, 'यह आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाला कानून है. जिसे सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वही सरकार चलाता है. लेकिन इससे सबसे ज्यादा वोट पाने वाले को पांच साल तक सरकार चलाने के लिए बहुमत हासिल करने की ताकत भी मिलती है. इस बात पर हम सभी, खासकर वामपंथी, सहमत हो सकते हैं.'
हालांकि, विपक्ष इसका जमकर विरोध कर रहा है. विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी की नेता एली श्लेन का कहना है कि हम इसे पास नहीं होने देंगे. उन्होंने यह भी कहा कि कानून के कुछ हिस्से 'असंवैधानिक' हैं.
उनकी पार्टी के सहयोगी मार्को मेलोनी ने कहा कि यह प्रस्ताव 'एक तानाशाही योजना है जिससे सारी शक्ति एक ही व्यक्ति के हाथों में आ जाएगी.'
वहीं, इटली के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव से पहले इस तरह का प्रस्ताव लाना मेलोनी की चिंता को दिखाता है. जानकारों का मानना है कि मेलोनी अगले साल होने वाले चुनावों को पहले भी करवा सकती हैं.
यह भी पढ़ेंः पुतिन का 'परमाणु चक्रव्यूह'; NATO के समुद्री रास्ते पर तैनात किया अपना सबसे ताकतवर युद्धपोत
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं