- अमेरिका ने ईरान के खिलाफ चल रहे युद्ध में अब तक 850 से अधिक टॉमहॉक मिसाइलें दागी हैं
- एक टॉमहॉक मिसाइल को बनाने में करीब दो साल लगते हैं और इसकी लागत लगभग तीस करोड़ रुपये होती है
- ईरान के पास भूमिगत बंकरों और सुरंगों में छिपा हुआ एक बड़ा मिसाइल नेटवर्क मौजूद है
अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच चल रही जंग को एक महीना हो गया है. दोनों तरफ से लगातार मिसाइलों के भयानक हमले के दौरान एक खबर अमेरिका की परेशानी का सबब हो सकती है, लेकिन ईरान के लिये अच्छी साबित हो सकती है. मीडिया रिपोर्ट की मानें तो टॉमहॉक मिसाइलों का करीब एक चौथाई हिस्सा खत्म हो चुका है. वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक अमेरिका ने अब तक 850 से ज्यादा टॉमहॉक मिसाइलें दागी हैं . अनुमान है कि अमेरिकी नौसेना के पास लगभग 4,000 टॉमहॉक मिसाइलें थीं . इससे साफ है कि इस मिसाइल का कोटा तेज़ी से कम होता जा रहा है . इस कमी को पूरा करने में अमेरिका को खासी दिक्कत हो सकती है क्योंकि एक टॉमहॉक बनाने में करीब 2 साल लग सकते हैं . जानकारों के मुताबिक इस कमी पूरी करने में अमेरिका को कई साल लग जाएंगे .
महीने भर पहले जब जंग की शुरुआत हुई तब से अमेरिकी नौसेना के जहाजों और पनडुब्बियों से सैकड़ों टॉमहॉक मिसाइलें दागी जा चुकी हैं.इनका उपयोग मुख्य रूप से ईरानी वायु रक्षा प्रणाली और सैन्य बुनियादी ढांचे को नष्ट करने के लिए किया गया .दावा तो यह भी किया गया है कि ईरान के मिनाब में स्कूल में भी टॉमहॉक मिसाइल से हमला हुआ था जिसमें 160 के करीब स्कूली बच्चियों की मौत हुई थी . अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के भीतर इसको लेकर चिंता बढ़ गई है .वैसे भी एक टॉमहॉक मिसाइल को बनाने में लगभग 3.6 मिलियन डॉलर यानी करीब 30 करोड़ रुपये की लागत आती है .
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टॉमहॉक का बड़े पैमाने पर पहला इस्तेमाल 1991 के खाड़ी युद्ध में हुआ.इसे समुद्र में मौजूद युद्धपोतों और पनडुब्बियों से भी दागा जा सकता है .यूरोप, पश्चिम एशिया समेत अमेरिका के दूसरे सहयोगी देशों को भी इनकी ज़रूरत रहती है.लेकिन अगर युद्ध लंबा चला, तो अमेरिका के पास अपने उपयोग के लिए भी टॉमहॉक खत्म हो सकती हैं . जब उसके खुद के पास ही यह मिसाइल नही बचेगी तो फिर वो अपने सहयोगियों को कहां से मिसाइल देगा .वैसे भी एक चौथाई मिसाइलें अब तक जंग में खत्म हो चुकी हैं .अगर यह जंग लंबी खिंची तो स्टॉक खत्म होने की आशंका है .वैसे भी 1 साल में अमेरिका 600 टॉमहॉक मिसाइल बनाता है .

ये भी सामने आया है कि जंग के इतने दिन बाद अमेरिका अब तक ईरान के मिसाइल स्टॉक का केवल एक तिहाई हिस्सा ही नष्ट कर पाया है . करीब 30 फ़ीसदी मिसाइलें ही नष्ट हुई हैं . ईरान की बाकी बची मिसाइलों को लेकर अभी पुख्ता जानकारी नहीं मिल पाई है . ये माना जा रहा है कि दूसरा एक तिहाई हिस्सा क्षतिग्रस्त हो चुका है या भूमिगत बंकरों और टनल नेटवर्क में फंसा हुआ है.लेकिन इसके बावजूद, ईरान के पास अभी भी एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो पूरी तरह सक्रिय है .खबरों की मानें तो ईरान के पास अभी भूमिगत मिसाइल सुविधाओं का एक बहुत बड़ा और फैला हुआ नेटवर्क है . ये पहाड़ियों और गहरी सुरंगों के नीचे मौजूद है.

युद्ध से पहले के अनुमानों के मुताबिक, ईरान के पास 2,500 से लेकर 6,000 तक मिसाइलें थीं . इनमें से ज्यादातर मिसाइलें मजबूत भूमिगत परिसरों में रखी गई थीं . इतने हमलों के बाद भी जानकारों का कहना है कि ईरान के पास एक दर्जन से ज्यादा ऐसी सुविधाएं सुरक्षित हो सकती हैं जहां से ईरान इजरायल और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर कहर बरपा रहा है. ईरान का दावा है कि वो ऐसी जगहों को चुन कर मार रहा है जहां अमेरिकी ठिकाने हैं या जहां अमेरिका-इज़राइल का पैसा लगा है . इससे साबित होता है कि उसका कमांड, कंट्रोल और लॉन्च सिस्टम अभी भी काम कर रहा है . अब तक ईरान 80 से ज्यादा बार मिसाइलों की बौछार कर चुका है . अपने ऊपर भारी बमबारी के बावजूद ईरान लगातार युद्ध के मैदान में पूरी ताकत से डटा है और एक साथ कई टारगेट्स पर निशाना लगा रहा है .
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