ईरान अब अपने बच्चों को भी जंग के मैदान में उतारने की तैयारी कर रहा है. कुछ दिन पहले ही सेना में शामिल होने की उम्र को घटाकर 12 साल कर दिया गया है. जंग में इन मासूम बच्चों के हाथों में बंदूकें क्यों थमाई जा रही हैं? आखिर ईरान ऐसा क्यों कर रहा है? हाल ही में ईरान में 11 साल के बच्चे अलीरेजा जाफ़री की मौत की खबर सामने आई. जिसने बाल अधिकारों और सैन्य अभियानों में बच्चों के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए.अलीरेजा जाफ़री, जो 5वीं का छात्र था, तेहरान में एक सैन्य चेकप्वाइंट पर तैनात रहने के दौरान एक ड्रोन हमले में मारा गया.ये हमला अमेरिका और इजरायल ने ईरान के सैन्य केंद्रों को निशाना बनाकर किया था.
तेहरान के चेक पोस्ट पर 12-12 साल के मासूम बच्चों के हाथों में बंदूकें थमा दी गई हैं.दावा किया जा रहा है कि 10 लाख से ज्यादा जमीनी लड़ाकों को तैयार कर लिया गया है, जिन्हें आईआरजीसी बासेज और ईरानी सेना की सहायता से संगठित किया जा रहा है.लेकिन उनमें ये बच्चे भी शामिल हैं.मानवाधिकार संगठनों जैसे हैंगो ने पहले ही चेतावनी दी थी कि IRGC सुरक्षा और सैन्य कार्यों के लिए बच्चों की भर्ती कर रही है.हाल ही में डिफेंडर्स ऑफ द होमलैंड जैसे अभियानों के तहत 12 साल तक के बच्चों को सैन्य रसद और गश्ती के लिए रजिस्ट्रेशन करने की अनुमति दी गई.
इससे ये तो साफ है कि ईरान अब 12 और 13 साल के बच्चों को सड़कों पर गश्त करने, चेकपॉइंट्स संभालने और रसद जैसे काम दे रहा है.कुछ बच्चों को बंदूकें लिए हुए चौकियों पर देखा गया है.संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुसार, बच्चों को सैन्य कार्यों में लगाना एक गंभीर अपराध माना जाता है. इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) के रोम स्टैच्यू के तहत 15 साल से कम उम्र के बच्चों को सेना में भर्ती करना या युद्ध में इस्तेमाल करना एक 'युद्ध अपराध' है. कॉनवेंशन ऑन द राइट्स ऑफ द चाइल्ड के मुताबिक 15 साल से कम उम्र के बच्चों की भर्ती प्रतिबंधित है. हालांकि, इसके एक विशेष प्रोटोकॉल (Optional Protocol) के तहत सैन्य कार्यों के लिए न्यूनतम उम्र 18 साल तय की गई है.
ईरान ने इन अंतरराष्ट्रीय संधियों पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत वह बच्चों को युद्ध जैसी स्थितियों से बचाने के लिए बाध्य है. विशेषज्ञों का कहना है कि 12 साल के बच्चों को चेकपॉइंट्स पर तैनात करना इन वादों का खुला उल्लंघन है.ईरान के इस कदम की दुनिया भर में आलोचना हो रही है. संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि बच्चों को ऐसे कार्यों में लगाना उनके जीवन और अधिकारों के लिए बड़ा खतरा है. वहीं हयूम्न राइट्स वॉच और एमेनस्टी इंटरनेशनल ने इसे बच्चों का शोषण बताया है. उनका कहना है कि ईरान अपनी सैन्य कमी को पूरा करने के लिए मासूमों को ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहा है. ऐसी भी खबरें आ रही है कि कई देशों ने ईरान पर दबाव बनाया है कि वह अपनी भर्ती नीति को तुरंत बदले, क्योंकि 12-13 साल के बच्चों के हाथों में हथियार देना उन्हें सीधे तौर पर दुश्मन के हमलों का निशाना बनाता है.
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