- अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमले के बाद ईरान ने खाड़ी देशों पर जवाबी हमला किया, जिससे क्षेत्र में तनाव बढ़ा
- UNDP की रिपोर्ट के अनुसार युद्ध से अरब देशों की जीडीपी में तीन से छह प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है
- युद्ध के कारण अरब देशों में 37 लाख नौकरियां खत्म होने और 40 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे जाने का खतरा है
जंग हमेशा राजनेता शुरू करते हैं और इसकी कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ती है. 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर हमला किया. बदला लेते हुए ईरान ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, कुवैत और बहरीन समेत खाड़ी देशों पर भी हमला कर दिया. अब यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (UNDP) की रिपोर्ट आई है, जिसमें बताया गया है कि इस युद्ध का अरब देशों पर बहुत बुरा असर पड़ा है और लाखों लोगों के गरीबी की चपेट में आने की आशंका है.
UNDP की रिपोर्ट में कहा गया है कि युद्ध के एक महीने बाद अरब की जीडीपी में लगभग 3.7 से 6 प्रतिशत तक की गिरावट का अनुमान है. इसका मतलब हुआ कि युद्ध के कारण अरब देशों की जीडीपी 120 से लेकर 194 अरब डॉलर तक की कमी आ सकती है.
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UNDP के रीजनल डायरेक्टर अब्दुल्ला अल दरदारी ने कहा कि इस युद्ध के कारण 37 लाख नौकरियां खत्म हो जाएंगी और इस क्षेत्र में लगभग 40 लाख लोग और गरीबी रेखा से नीचे जा सकते हैं.
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इस युद्ध का क्या होगा असर?
- अर्थव्यवस्था पर: अरब देशों की जीडीपी में 3.7 से 6% तक की गिरावट आ सकती है. यानी, अरब देशों को 194 अरब डॉलर तक का नुकसान होने का अनुमान है. भारतीय करंसी में यह रकम लगभग 18सौ करोड़ रुपये होती है. आयात में 9% और निर्यात में 10% तक की गिरावट आ सकती है.
- रोजगार पर: मध्य पूर्व में जबरदस्त तरीके से बेरोजगारी दर बढ़ने की आशंका है. UNDP की रिपोर्ट बताती है कि अरब देशों में बेरोजगारी दर 1.8 से 4% तक बढ़ सकती है. इस कारण 37 लाख लोगों की नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है.
- गरीबी पर: जीडीपी गिरेगी और बेरोजगारी बढ़ेगी तो इसका सीधा असर गरीबी पर पड़ेगा. अनुमान है कि युद्ध के कारण 40 लाख लोग और गरीबी की चपेट में आ जाएंगे. सबसे ज्यादा असर यमन और सूडान जैसे मुल्कों पर पड़ेगा. पूरे अरब में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी 1% तक बढ़ जाएगी.

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तबाही की कगार पर खड़े हैं अरब देश?
ईरान युद्ध ने अरब देशों को तबाही की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है. इस जंग के कारण अरब देशों पर खाने-पीने का संकट भी खड़ा हो रहा है. UNDP की रिपोर्ट बताती है कि इसकी वजह खाद के कारोबार और शिपिंग के रास्तों में रुकावटों का आना. होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के कारण खाद के बाजारों और खेती में इस्तेमाल होने वाली चीजों की वैश्विक कीमतों पर असर पड़ रहा है.
रिपोर्ट बताती है कि इन रुकावटों की वजह से खाद की कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हैं. मार्च की शुरुआत में तनाव बढ़ने के बाद यूरिया की कीमतें लगभग 60 से 90 डॉलर प्रति टन बढ़ गई हैं. खाद की बढ़ती लागत के कारण किसान खाद का इस्तेमाल भी कम कर सकते हैं जिससे खेती की पैदावार और भी कम हो सकती है. होर्मुज स्ट्रेट में पाबंदियों के कारण सल्फर और फॉस्फेट की शिपमेंट में गिरावट आ रही है.
जब से जंग शुरू हुई है तब से इस इलाके में टैंकरों की आवाजाही काफी धीमी हो गई है. कच्चे तेल की कीमत 20% से ज्यादा बढ़ गई है, जबकि यूरोप में प्राकृतिक गैस की कीमतें 50% से ज्यादा बढ़ घई है. तेल-गैस की कीमतें बढ़ने से वैश्विक स्तर पर खाने-पीने की चीजों की कीमतें भी बढ़ने की आशंका है.
अगर अरब देशों की बात की जाए तो ये खाने-पीने की चीजों के आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं. होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने और कई सारी रुकावटों के कारण अरब देशों में खाने-पीने की चीजों की कीमतें ज्यादा तेजी से बढ़ सकती हैं. जंग शुरू होने के बाद होर्मुज स्ट्रेट के जरिए सूखे माल की आवाजाही में 90% से ज्यादा की गिरावट आई है. साथ ही साथ लाल सागर और पूर्वी भूमध्य सागर के रास्तों पर भी असर पड़ा है. ये रास्ते कई अरब देशों में अनाज के आयात के लिए अहम रास्ते हैं.
रिपोर्ट बताती है कि अरब देशों में ज्यादातर परिवार अपने खर्च का लगभग 50 फीसदी खाने-पीने पर करते हैं. इसका मतलब है कि खाने-पीने की चीजों की कीमतों में थोड़ी बहुत बढ़ोतरी भी लोगों की खरीदने की क्षमता को काफी हद तक कम कर सकती है. इससे गरीबी बढ़ सकती है.
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