अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक परमाणु समझौते को लेकर एक बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है. इस नए समझौते पर ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई के साइन नहीं हैं. इस बात के सामने आते ही अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में यह सवाल आने लगा है कि क्या सर्वोच्च नेता के दस्तखत के बिना यह डील कानूनी रूप से मान्य होगी?
इस सस्पेंस के बीच अमेरिकी प्रशासन के एक सीनियर ऑफिशियल ने स्थिति साफ करते हुए कहा है कि इस डील पर सुप्रीम लीडर के दस्तखत न होना कोई हैरान करने वाली बात नहीं है, बल्कि इसकी पहले से उम्मीद थी.
अमेरिकी अधिकारियों ने सीएनएन को बताया, ईरान की व्यवस्था में सुप्रीम लीडर सीधे तौर पर ऐसे समझौतों पर साइन नहीं करते हैं. अगर साल 2015 में बराक ओबामा के कार्यकाल के दौरान हुए परमाणु समझौते (JCPOA) को भी देखा जाए, तो उस वक्त भी सर्वोच्च नेता ने दस्तावेज पर साइन नहीं किए थे. उनके सिस्टम में सुप्रीम लीडर की भूमिका इस तरह के कागजी समझौतों पर दस्तखत करने की नहीं होती है. इसलिए मोजतबा खामेनेई के साइन न होने से इस डील की वैधता पर कोई कानूनी संकट या सवालिया निशान नहीं खड़ा होता है.
ट्रंप, वेंस और ईरान की संसद के स्पीकर ने MoU पर किए साइन
मोजतबा खामेनेई के साइन नहीं, तो किसने किए हस्ताक्षर?
अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि ईरान के सिस्टम में इस तरह के समझौतों को अंतिम रूप देने और उस पर हस्ताक्षर करने की जिम्मेदारी उनके मुख्य वार्ताकार और संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गलिबाफ की है. अमेरिका का मानना है कि मौजूदा समय में ईरानी व्यवस्था के भीतर मोहम्मद बाघेर गलिबाफ सबसे प्रभावशाली व्यक्ति हैं. गलिबाफ के पास ही इस पूरी डील को आगे बढ़ाने और अमलीजामा पहनाने की कमान थी.
इस ऐतिहासिक डील को पूरी तरह डिजिटल माध्यम से फाइनल किया गया है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरान की तरफ से गलिबाफ ने इस समझौते पर डिजिटली हस्ताक्षर किए हैं. ईरान की संसद और मुख्य वार्ताकार की मंजूरी होने के कारण इस डील को पूरी तरह से वैध और ईरान सरकार की आधिकारिक सहमति माना जा रहा है.
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