अमेरिका ने तीन जनवरी को वेनेजुएला पर हमला कर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर लिया. इस अमेरिकी कार्रवाई को लैटिन अमेरिकी देशों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. इसके साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कोलंबिया, क्यूबा और मेक्सिको को चेतावनी भी दी है. उनका कहना है कि अगर ये देश अपना रवैया ठीक नहीं करते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. उनका दावा है कि वो ड्रग्स की तस्करी रोकने और अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए ऐसा कर रहे हैं. अमेरिका की इस कार्रवाई से लैटिन अमेरिका में अमेरिकी हस्तक्षेप के पुराने जख्म फिर ताजा हो गए हैं.
अमेरिका ने वेनेजुएला में सैन्य कार्रवाई की. लेकिन वेनेजुएला की सेना ने थोड़ा सा भी प्रतिरोध नहीं दिखाया. हालांकि अमेरिका के मुताबिक मादुरो की सुरक्षा में क्यूबा के सैनिक तैनात थे. अमेरिका ने इस हमले में क्यूबा के 32 सैनिकों के मारे जाने का दावा किया है. उसका कोई भी सैनिक इस हमले में नहीं मारा गया. अमेरिका की इस कार्रवाई से यह साफ हो गया है कि अमेरिका की सैनिक कार्रवाई का मुकाबला ये देश मिलकर भी नहीं कर सकते हैं. इनकी सेनाएं इतनी मजबूत नहीं हैं कि वे अमेरिका को दूर रख सकें.आइए देखते हैं कि वेनेजुएला समेत उन देशों की सैन्य ताकत कितनी है, जिनको अमेरिका ने धमकी दी है.
अमेरिका दुनिया की सबसे ताकतवर सेना वाला देश है. वह अपनी सेना पर इतना खर्च करता है, जितना दुनिया के अगले 10 बड़े सैन्य खर्च करने वाले देश मिलकर भी नहीं कर पाते हैं. साल 2025 में अमेरिका का रक्षा बजट करीब 895 अरब डॉलर का था.
लैटिन अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य पॉवर कौन है
ग्लोबल फायरपावर रैंकिंग 2025 के मुताबिक लैटिन अमेरिका में ब्राजील सबसे बड़ा सैन्य पॉवर है. ब्राजील सैन्य ताकत के मामले में दुनिया में 11वें स्थान पर है. इसके अलावा मेक्सिको 32वें, कोलंबिया 46वें, वेनेजुएला 50वें और क्यूबा 67वें स्थान पर है. लैटिन अमेरिका के ये देश सैनिकों की संख्या, लड़ाकू विमान, टैंक, नौसेना और बजट, हर मामले में अमेरिका से काफी पीछे हैं. ये देश केवल एक ही क्षेत्र में अमेरिका से आगे हैं, वह है पैरामिलिट्री या अर्धसैनिक बल. अर्धसैनिक बल आम सेना के साथ नहीं, बल्कि अलग तरीके से लड़ते हैं. लैटिन अमेरिका में ऐसे कई देश हैं, जिनके पास अर्धसैनिक बलों की संख्या अधिक है, लेकिन इनकी कमांड सेना के पास नहीं होती है.

अमेरिका के पास कुल 21 लाख 27 हजार सैनिक हैं. लेकिन उसके पास अर्धसैनिक बलों की संख्या शून्य है. वहीं लैटिन अमेरिका की सबसे बड़ी सैन्य ताकत ब्राजील के कुल सैनिकों की संख्या नौ लाख है. इसमें उसके अर्धसैनिक बल के जवानों की संख्या दो लाख है.
क्यूबा
क्यूबा के पास दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्धसैनिक ताकत है. उसके अर्धसैनिक बल में 11 लाख से अधिक लोग शामिल हैं. इनमें सरकारी मिलिशिया और मोहल्ला रक्षा समितियां शामिल हैं. इनका काम युद्ध या संकट के समय सेना की मदद करना होता है.
वेनेजुएला
ग्लोबल फायरपावर रैंकिंग 2025 के मुताबिक वेनेजुएला की सेना 50 नंबर पर है. वेनेजुएला के सैनिकों की संख्या तीन लाख 27 हजार है.इसमें दो लाख 20 हजार जवानों वाला अर्धसैनिक बल भी है. इस रैंकिंग के मुताबिक वेनेजुएला अर्धसैनिक बल के मामले में दुनिया में 10वें नंबर पर है. इसके अलावा वहां सरकार समर्थक हथियारबंद नागरिक समूह भी हैं, जिन्हें कोलेक्टिवोस कहा जाता है. इन पर विरोधियों को डराने और राजनीतिक नियंत्रण बनाए रखने के आरोप लगते रहे हैं.हालांकि ये औपचारिक तौर पर सेना या अर्धसैनिक बल का हिस्सा नहीं हैं.
कोलंबिया
ग्लोबल फायरपावर रैंकिंग 2025 के मुताबिक कोलंबिया सैन्य शक्ति के मामले में रैंकिंग में शामिल 145 देशों में 46वें नंबर पर है. उसके पास कुल सैनिकों की संख्या चार लाख 78 हजार 200 है. इसमें डेढ लाख जवानों वाला अर्धसैनिक बल भी शामिल है.
मेक्सिको
ग्लोबल फायरपावर रैंकिंग 2025 के मुताबिक मैक्सिको सैन्य शक्ति के मामले में रैंकिंग में शामिल 145 देशों में 32वें नंबर पर है.उसके कुल सैनिकों की संख्या छह लाख 30 हजार 655 है. उसके अर्धसैनिक बलों की संख्या एक लाख 20 हजार है. इसके अलावा मेक्सिको में ड्रग माफिया गिरोह भी अर्धसैनिक बलों की ही तरह काम करते हैं. उनके पास भारी हथियार हैं, ये बड़े इलाकों पर नियंत्रण रखते हैं. कई बार वो पुलिस से भी अधिक ताकतवर नजर आते हैं. इसी वजह से मेक्सिको में सेना कानून-व्यवस्था भी संभालती है.
लैटिन अमेरिका में अमेरिकी हस्तक्षेप का इतिहास
अगर देखा जाए तो पिछले 200 साल में अमेरिका कई बार लैटिन अमेरिकी देशों में दखल दे चुका है. 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में बनाना वॉर्स (साल 1898 में अमेरिका-स्पेनिश युद्ध खत्म होने और 1934 में राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट की ओर से 'गुड नेबर पॉलिसी' अख्तियार करने के बीच) के दौरान अमेरिका ने अपनी कंपनियों के हितों की रक्षा के लिए मध्य अमेरिका में सेनाएं भेजीं.वहीं शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने कई चुनी हुई सरकारों को गिराने की कोशिश की. इसमें उसकी खुफिया एजेंसी सीआईए की भूमिका अहम थी. लेकिन अमेरिका ने आधिकारिक रूप से सिर्फ पनामा पर हमला किया था. राष्ट्रपति जॉर्ज एचडब्ली बुश के समय 1989 में हुए इस हमले को 'ऑपरेशन जस्ट कॉज' कहा जाता है. इसका उद्देश्य राष्ट्रपति मैनुअल नोरिएगा को हटाना बताया गया. उन्हें बाद में नशीली दवाओं की तस्करी के आरोप में सजा सुनाई गई थी.
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