डरबन:
यूरोपीय संघ (ईयू) ने शुक्रवार को कानूनी रूप से बाध्यकारी एक नए करार की राह में रोड़े अटकाने के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया। ईयू ने कहा कि नई दिल्ली थोड़ा कड़ा रुख अपना रही है जिससे डरबन में देश किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रहे हैं। भारत ने कहा है कि यदि समानता, विकास का अधिकार के उसके मुद्दों पर ध्यान दिया गया तो वह चर्चा के लिए तैयार है। ईयू की जलवायु आयुक्त कोनी हेडेगार्ड ने कहा कि करार के कानूनी रूप के भविष्य और समय सीमा से जुड़े दो मुद्दों पर भारत के साथ गतिरोध है। इसके तहत देशों को कार्बन उत्सर्जन में कटौती करनी है। ज्ञात हो कि ईयू ने 2015 तक कानूनी रूप से बाध्यकारी एक ढांचे से सहमत देशों के समक्ष एक रूपरेखा की पेशकश की है। उन्होंने कहा कि बेसिक के देशों ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन हालांकि ईयू के प्रस्ताव से सहमत हुए हैं। चीन ने अपने रुख में थोड़ा लचीलापन दिखाया है जबकि भारत के तेवर अपेक्षाकृत थोड़ा कड़े हैं। हेडेगार्ड ने कहा, "जहां तक आज की बात है क्योटो प्रोटोकाल के दूसरे चरण के लिए करार पर पहुंचा जा सकता है।" उन्होंने कहा कि ईयू के प्रस्ताव को ज्यादातर राष्ट्रों-छोटे द्वीप देशों, अल्प विकसित देशों और अफ्रीकी संघ ने स्वीकार किया है लेकिन डरबन सम्मेलन की सफलता और असफलता कुछ देशों पर निर्भर है जो रूपरेखा के प्रति प्रतिबद्ध नहीं हैं, इसके लिए हमें उन्हें तैयार करना है।" भारत के साथ गतिरोध के बारे में उन्होंने बताया, "भारत कार्बन उत्सर्जन के लिए दोनों उपायों कानून बनाम स्वैच्छिक को जारी रखना चाहता है जबकि अधिकतर देशों ने अनुभव किया है कि लम्बे समय तक हमें दो उपायों को जारी नहीं रखना चाहिए।" उन्होंने कहा कि भारत के साथ करार की समयसीमा को लेकर भी गतिरोध है। वहीं, भारत की केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने ईयू के आरोपों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि वह डरबन में खुले दिमाग के साथ आई हैं। नटराजन ने कहा कि उनके देश की ओर से उठाए गए मुद्दों का हल निकलना चाहिए। नटराजन ने कहा, "मैंने आज बेसिक देशों के साथ बैठक की और हमारा रुख एक है। मैं यहां खुले दिमाग के साथ आई हूं लेकिन हम कानूनी रूप से बाध्यकारी कानून की विषय सामग्री के बारे में जानना चाहते हैं। हम जानने चाहते हैं कि क्या इसके बदले में वे हमें एक दूसरा क्योटो देने जा रहे हैं।"
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