अमेरिका की राजनीति इस वक्त एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां डोनाल्ड ट्रंप का 'मैजिक' फीका पड़ता दिख रहा है. 2024 के चुनाव में जिस बड़े जनादेश के साथ ट्रंप ने व्हाइट हाउस में दोबारा कदम रखा था, वह अब रेत की तरह हाथों से फिसलता नजर आ रहा है. आइओवा के ग्रामीण इलाकों से लेकर जॉर्जिया के कस्बों तक, हवा का रुख बदल रहा है. लुईसा काउंटी जैसे इलाके, जिन्होंने कभी ओबामा और फिर ट्रंप का साथ दिया था, अब डर और अनिश्चितता के साये में हैं.
ताजा आंकड़ों और जमीनी हकीकत को देखें तो ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग गिरकर 42% तक पहुंच गई है. यह ठीक वैसी ही स्थिति है जैसी अप्रैल 2024 में जो बाइडेन की थी. इसकी बड़ी वजह प्रशासन के वो कड़े फैसले हैं, जिन्होंने आम जनता, खासकर प्रवासियों और मध्यम वर्ग को हिलाकर रख दिया है.
जेब पर भारी पड़ रही राजनीति
ट्रंप सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था और महंगाई बनी हुई है. प्रशासन की ओर से ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान में इजरायल का साथ देने और उसके बाद उपजे वैश्विक तेल संकट ने अमेरिकी जनता की कमर तोड़ दी है. सिर्फ ईंधन ही नहीं, बल्कि रोजमर्रा के खर्चों ने भी लोगों का मूड खराब कर दिया है.
विशेषज्ञों का मानना है कि जिस 'वर्किंग क्लास' और अल्पसंख्यक वोट बैंक (अश्वेत और हिस्पैनिक) को जोड़कर रिपब्लिकन पार्टी ने 2024 में जीत हासिल की थी, वह गठबंधन अब बिखर रहा है. ऐसा लग रहा है कि रिपब्लिकन पार्टी ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है और अब उनके लिए वापसी की राह काफी कठिन दिख रही है.
क्या मुमकिन है डेमोक्रेट्स की जीत?
अब सवाल यह है कि क्या यह नाराजगी डेमोक्रेट्स को सीनेट में बहुमत दिला पाएगी? गणित इतना आसान नहीं है. 3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी को अपने गढ़ बचाने हैं, जबकि डेमोक्रेट्स को बहुमत के लिए कम से कम तीन ऐसे राज्यों में जीत दर्ज करनी होगी.
मार्केट लॉ स्कूल पोल के अनुसार, फिलहाल डेमोक्रेट्स को मतदाताओं के बीच 4 से 10 प्रतिशत की बढ़त हासिल है. लेकिन, समस्या यह है कि 'गेरीमेंडरिंग' (चुनावी क्षेत्रों का नए सिरे से निर्धारण) और बढ़ती गुटबाजी के कारण असली टक्कर वाले इलाके बहुत कम बचे हैं. अधिकतर सीटें ऐसी हैं जहां रिपब्लिकन 15-20 अंकों से आगे रहते हैं.
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