- अमेरिका ने ईरानी युद्धपोत आईरिस डेना पर बिना चेतावनी हमला किया, ईरान का कहना है कि वह युद्ध में शामिल नहीं था
- अमेरिका का दावा है कि IRIS Dena एक सैन्य फ्रिगेट था और इसलिए उसे वैध सैन्य लक्ष्य माना जा सकता है
- अमेरिकी सेना ने बताया कि हमले के दौरान मानवीय पहलुओं का ध्यान रखा गया और नाविकों को बचाने के प्रयास किए गए
क्या अमेरिका ने ईरानी युद्धपोत आईरिस डेना (IRIS Dena) को डुबो देने वाला हमला कर अंतरराष्ट्रीय युद्ध-नियमों का उल्लंघन नहीं किया है? इसको लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस शुरू हो गई है. ईरान का कहना है कि ये युद्धपोत युद्ध में शामिल नहीं था. ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची के मुताबिक, यह जहाज़ भारत में आयोजित मिलन 2026 नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लेने के बाद वापस लौट रहा था. यह अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में था और उस पर बिना चेतावनी हमला किया गया.
अमेरिका ने ये दलील
लेकिन अमेरिका की दलील कुछ और है. उसका कहना है कि युद्ध के नियमों के तहत किसी वैध सैन्य लक्ष्य पर हमला किया जा सकता है. इन नियमों को सशस्त्र संघर्ष का कानून (Law of Armed Conflict) कहा जाता है. अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार IRIS Dena एक सैन्य जहाज था. इसलिए उसे वैध सैन्य लक्ष्य माना जा सकता था. अमेरिकी सेना की संयुक्त राज्य अमेरिका इंडो-पैसिफिक कमांड (United States Indo-Pacific Command) ने सोशल मीडिया पर एक फैक्टचेक जारी किया. इसमें कहा गया कि ईरान का यह दावा सही नहीं है कि जहाज निहत्था था. अमेरिका के अनुसार IRIS Dena एक सैन्य फ्रिगेट था. उस पर हथियार थे. इसलिए उसे पूरी तरह 'निहत्था' बताना गलत है.

युद्ध के लिए तैयार स्थिति में नहीं था जहाज
अमेरिका का यह भी कहना है कि ऑपरेशन की योजना बनाते समय मानवीय पहलुओं को भी ध्यान में रखा गया था. हमले के बाद नाविकों को बचाने के लिए कदम उठाए गए. क्षेत्र में मौजूद एजेंसियों ने तुरंत प्रतिक्रिया दी. बाद में श्रीलंका ने सर्च एंड रेस्क्यू अभियान चलाकर कई नाविकों को बचाया. हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अभ्यास से लौटते समय जहाज पूरी तरह युद्ध के लिए तैयार स्थिति में नहीं था. बेशक, यह तकनीकी रूप से एक युद्धपोत था और उस पर स्थायी हथियार लगे हो सकते थे.
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समुद्री सीमा को लेकर भी उठ रहे सवाल
अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, किसी सैन्य जहाज को लक्ष्य बनाया जा सकता है. लेकिन इसके साथ दो सिद्धांत बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. पहला है “मिलिट्री नेसेसिटी” यानी सैन्य आवश्यकता. दूसरा है “प्रोपोर्शनैलिटी” यानी कार्रवाई से होने वाला नुकसान जरूरत से ज्यादा नहीं होना चाहिए. कुछ कानूनी विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि घटना समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (United Nations Convention on the Law of the Sea) के तहत आने वाले समुद्री क्षेत्र के पास हुई. इसलिए यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या उस क्षेत्र में किसी तीसरे देश की सैन्य कार्रवाई नियमों के अनुरूप थी या नहीं. फिलहाल इस घटना को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस जारी है.
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