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जब-जब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी आई, तब-तब... BNP की जीत के बाद 'पाकिस्तान' जैसा बन जाता है बांग्लादेश?

बांग्लादेश में 20 साल बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) सत्ता में आ गई है. तारिक रहमान का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय है. ऐसे में जानते हैं कि BNP का सत्ता में आना भारत के लिए कैसा सौदा है?

जब-जब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी आई, तब-तब... BNP की जीत के बाद 'पाकिस्तान' जैसा बन जाता है बांग्लादेश?
  • बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने संसदीय चुनाव में भारी जीत हासिल की है
  • तारिक रहमान को उनकी जीत पर भारत समेत पाकिस्तान से भी बधाई मिली है
  • अवामी लीग की सरकार का तख्तापलट होने के बाद पाकिस्तान के साथ रिश्ते मजबूत हुए हैं
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नई दिल्ली:

बांग्लादेश में 36 साल बाद कोई पुरुष प्रधानमंत्री बनने जा रहा है. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने संसदीय चुनाव में 200 से ज्यादा सीटें जीत ली हैं. इसके साथ ही BNP के अध्यक्ष तारिक रहमान का प्रधानमंत्री बनना भी लगभग तय हो गया है. तारिक रहमान बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे हैं. तारिक रहमान की इतनी बंपर जीत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उन्हें फोन पर बधाई दी.

पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार का तख्तापलट होने के 18 महीने बाद संसदीय चुनाव हुए थे. 299 सीटों के लिए 12 फरवरी को वोटिंग हुई और अब तक नतीजे करीब-करीब साफ हो गए हैं और BNP लगभग दो दशक बाद सत्ता में वापसी करने जा रही है. आखिरी बार BNP सत्ता में 2001 से 2006 तक रही थी. तब तारिक रहमान की मां खालिदा जिया प्रधानमंत्री थीं.

तारिक रहमान की जीत पर पाकिस्तान से भी बधाई आई. पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ समेत तमाम नेताओं ने उन्हें बधाई दी. शहबाज शरीफ ने तारिक रहमान को चुनावों में BNP को शानदार जीत दिलाने के लिए बधाई दी. उन्होंने X पर लिखा, 'मैं बांग्लादेश की नई लीडरशिप के साथ मिलकर काम करने के लिए उत्सुक हूं ताकि हमारे ऐतिहासिक और भाईचारे वाले द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत किया जा सके और दक्षिण एशिया और उससे आगे की शांति, स्थिरता और विकास के हमारे साझा लक्ष्यों को आगे बढ़ाया जा सके.'

तारिक रहमान की जीत PAK के लिए अच्छी?

5 अगस्त 2024 को शेख हसीना की सरकार का तख्तापलट हो गया था. जनवरी 2024 में हुए आम चुनाव में शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग ने बंपर जीत हासिल की थी. उन पर इस चुनाव में धांधली करने का आरोप लगा था. उनके खिलाफ छात्र सड़कों पर उतरे और उनकी सत्ता को उखाड़ फेंका. इस चुनाव में अवामी लीग के चुनाव लड़ने पर पाबंदी थी.

बांग्लादेश में अवामी लीग और शेख हसीना की सरकार का होना भारत के लिए अच्छा माना जाता है. क्योंकि अवामी लीग की सरकार में बांग्लादेश, भारत के नजदीक रहता है. अवामी लीग की बजाय BNP का सत्ता में होना भारत के लिए उतना फायदेमंद नहीं रहा है, क्योंकि इस दौर में मुल्क पाकिस्तान के करीब चला जाता है.

शेख हसीना की सरकार का तख्तापलट जब से हुआ है, तब से ही बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच नजदीकियां बढ़ी हैं. हाल ही में ढाका से कराची के बीच सीधी उड़ान शुरू हुई है. ये दोनों मुल्कों के बीच 14 साल में पहली सीधी उड़ान है. इससे कुछ महीने पहले पाकिस्तान के विदेश मंत्री भी ढाका आए थे. ये 13 साल में पहली बार किसी पाकिस्तानी विदेश मंत्री का दौरा था. और तो और, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच कारोबार भी बढ़ा है. BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024-25 में दोनों देशों के बीच कारोबार 27 फीसदी बढ़ गया है.

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BNP का आना भारत के लिए खराब?

शेख हसीना की सरकार के तख्तापलट के बाद भारत और बांग्लादेश के रिश्ते जिस तरह से खराब हुए, वैसे कभी नहीं रहे. दोनों मुल्कों के जबरदस्त तनाव देखने को मिला. इसके बाद बांग्लादेश में हिंसा के दौरान हिंदुओं की हत्या ने रिश्ते और खराब कर दिए. एक ओर बांग्लादेश की भारत से दूरियां बढ़ीं तो पाकिस्तान के करीब गया.

हालांकि, BNP की जीत के बाद भारत और बांग्लादेश दोनों ने ही रिश्तों के पटरी पर आने की उम्मीद जताई है. BNP नेता नजरूल इस्लाम खान ने कहा कि तारिक रहमान के नेतृत्व में भारत और बांग्लादेश के रिश्ते मजबूत होंगे.

मगर, इतिहास बताता है कि जब-जब बांग्लादेश में BNP सत्ता में आई है, तब-तब भारत और बांग्लादेश के रिश्ते खराब ही रहे हैं. 1991 से 1996 और फिर 2001 से 2006 के बीच बांग्लादेश की सत्ता में BNP रही. उस दौर में बांग्लादेश और पाकिस्तान करीब आए. BNP की सरकार में भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में उतना तालमेल नहीं दिखता, जितना अवामी लीग की सरकार में दिखता है.

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PAK जैसा बन जाता है बांग्लादेश! 

बांग्लादेश में जब-जब BNP सत्ता में रही है, भारत को लेकर उसका रुख 'दुश्मनी' वाला रहा है. खालिदा जिया ने अपनी सरकार में अक्सर भारतीय ट्रकों को बांग्लादेश की सड़कों पर टोल-फ्री चलने देने को 'गुलामी' बताया था. खालिदा जिया इसे बांग्लादेश की संप्रभुता का उल्लंघन मानती थी. ये मुद्दा सालों तक चला और दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट बढ़ाता रहा.

इसी तरह 1972 में तत्कालीन भारतीय पीएम इंदिरा गांधी और बांग्लादेश के संस्थापक मुजीबुर रहमान के समय एक ट्रीटी हुई थी. खालिदा जिया ने इस ट्रीटी को रिन्यू करने का विरोध भी किया था. वह इस संधि को बांग्लादेश को 'जंजीरों में बांधने वाली' संधि बताती थीं.

जिस तरह से पाकिस्तान की करीबियां चीन से हैं. उसी तरह से BNP की सत्ता में बांग्लादेश की करीबियां भी चीन से बढ़ जाती हैं. 2002 में खालिदा जिया ने चीन के साथ रक्षा सौदे किए थे. इसे बांग्लादेश को चीन के हथियार और टैंक मिले थे.

इतना ही नहीं, जैसे पाकिस्तान कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद को बढ़ावा देता रहता है. उसी तरह भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में BNP के आने के बाद अलगाववाद और आतंकवाद बढ़ जाता है. खालिदा जिया ने कई बार पूर्वोत्तर के ULFA और NSCN जैसे अलगाववादी संगठनों को 'फ्रीडम फाइटर्स' बताया था और उनकी लड़ाई की तुलना बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई से की थी.

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2004 में हथियारों की बड़ी खेप कहां से आई?

1 अप्रैल 2004 को चटगांव पोर्ट पर 10 ट्रकों में लोड हो रहे हथियारों को पुलिस और कोस्ट गार्ड ने पकड़ा. पुलिस और कोस्ट गार्ड की टीम जैसे ही यहां पहुंची तो देखकर चौंक गई. यहां उन्हें हथियारों का जखीरा मिला जिसमे 4,,930 बंदूकें, 27,020 ग्रेनेड, 840 रॉकेट लॉन्चर, 300 रॉकेट, 2,000 ग्रेनेड लॉन्चिंग ट्यूब और 11 लाख से ज्यादा गोलियां थीं. 

हथियारों का यह जखीरा लोकल ग्रुप्स की जरूरतों से कहीं ज्यादा था. यह बांग्लादेश के इतिहास में हथियारों की सबसे बड़ी स्मगलिंग थी.

बाद में जांच में पता चला कि हथियारों की ये खेप असम के अलगाववादी संगठन ULFA के लिए थे. हालांकि, 10 साल बाद ULFA के नेता अनूप चेतिया ने दावा किया था कि ये हथियार उनके नहीं थे. इतने बड़े पैमाने पर हथियारों की जब्ती ने गैर-कानूनी हथियारों के लिए संभावित ट्रांजिट हब के तौर पर बांग्लादेश की भूमिका को उजागर किया. जांच में बड़े-बड़े लोगों के नाम सामने आने लगे.

इस केस में जिन नेताओं और सैन्य अफसरों का नाम सामने आया था, वो BNP की सरकार में ऊंचे-ऊंचे पदों पर थे. जांच में कई बड़े अधिकारी और राजनीतिक हस्तियों के नाम आए. इस मामले में BNP सरकार में गृह मंत्री रहे लुत्फोज्जमां बाबर भी आरोपी थे. आरोप लगा कि इतना बड़ा ऑपरेशन सरकार और सैन्य अफसरों की जानकारी या मिलीभगत के बिना नहीं हो सकता था.

2014 में शेख हसीना की सरकार के दौरान चटगांव की स्पेशल कोर्ट ने बाबर समेत कई लोगों को मौत की सजा सुनाई थी. हालांकि, पिछले साल हाई कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया और बाबर समेत 5 लोगों को बरी कर दिया. ये केस आज भी चल रहा है और अब भी पहेली बना हुआ है.

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