ईरान के साथ युद्ध ने अमेरिकी सैन्य और प्रतिरक्षा तंत्र की बहुत सारी खामियों को सामने ला खड़ा किया है. अब नई खबर यह आ रही है कि 40 दिन चले इस युद्ध में अमेरिका ने अपनी अत्याधुनिक मिसाइलों का बड़ा हिस्सा गवां दिया है. यह दावा अमेरिका के रेडियो और टेलीविजन नेटवर्क एनबीसी ने किया है. एनबीसी के मुताबिक उसके हथियार भंडार में काफी कमी आई है.
सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज की रिपोर्ट भी यही कहती है. और तो और, अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन की खुफिया रिपोर्ट्स की मानें तो इस जंग में जिस तेजी से मिसाइलें खर्च हुई हैं, उसके कारण अमेरिका की सैन्य तैयारी पर खासा असर पड़ा है. खासकर पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में उसकी स्थिति कमजोर हो सकती है, जहां पहले से ही तनाव बना हुआ है.
थाड और पैट्रियट एयर डिफेंस इंटरसेप्टर खूब हुए खर्च
अमेरिकी थाड और पैट्रियट एयर डिफेंस इंटरसेप्टर का लगभग 50 प्रतिशत इस्तेमाल हो चुका है. अमेरिका इनका इस्तेमाल अपने सैन्य ठिकानों और सहयोगी देशों की सुरक्षा में करता था. हालत ये हो गई कि खाड़ी देशों में सुरक्षा के लिये अमेरिका को यूरोप से अपना यह सिस्टम मंगाना पड़ा. वहीं टॉमहॉक क्रूज मिसाइल का करीब 30 प्रतिशत हिस्सा खत्म हो गया है.
जबकि प्रिसिजन स्ट्राइक मिसाइल का लगभग 45 प्रतिशत स्टॉक इस्तेमाल हो चुका है. एएसएसएम सीरीज की अमेरिकी क्रूज मिसाइल और कई मिशन में काम आने वाली एसएम सीरीज की मिसाइलों में भी करीब 20 प्रतिशत की कमी आई है. रक्षा जानकारों का कहना है कि अगर कोई नया संघर्ष होता है, तो गोला-बारूद की कमी भी सामने आ सकती है. यह अमेरिका के लिये बहुत अच्छे संकेत नही हैं .
मिसाइलों के भंडार को भरने में कितना वक्त लगेगा?
इन हालात पर अमेरिका के पूर्व मरीन अधिकारी मार्क कैंसियन ने चेतावनी दी है कि ये स्थिति अमेरिका के लिए बेहद संवेदनशील है. उनके मुताबिक इन मिसाइलों के भंडार को फिर से भरने में चार साल तक लग सकते हैं. ऐसे में अब खाड़ी देश ये सोचने को मजबूर होंगे कि वे अमेरिका के सुरक्षा तंत्र पर भरोसा बनाए रखें या कोई दूसरा और विकल्प देखें. वैसे व्हाइट हाउस और पेंटागन ने इसे कोई बड़ी चिंता मानने से इनकार किया है.
पेंटागन के प्रवक्ता सीन पार्नेल ने कहा कि अमेरिकी सेना के पास अभी भी पर्याप्त हथियार हैं और वह किसी भी समय कार्रवाई करने के लिए तैयार है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी भरोसा जताया है कि देश की सुरक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त फंड देना कोई बड़ी बात नहीं है. इसके बावजूद अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों को यह एहसास है कि ईरान और अमेरिका के बीच यह युद्ध सस्ती बनाम महंगी तकनीक का युद्ध भी बन गया है. ईरान के सस्ते ड्रोन्स और सस्ती मिसाइलों ने अमेरिका को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर किया है.
ईरान के पास अभी मिसाइल की कमी नहीं?
एक तरफ अमेरिकी जखीरे में मिसाइलों की कमी आ रही है तो दूसरी ओर ईरान का दावा है कि उसके तरकश में मिसाइलों की कोई कमी नही हैं . ईरान के पास अभी भी अपने ड्रोन के जखीरे का करीब 40 फीसदी हिस्सा मौजूद है . 60 प्रतिशत से ज्यादा मिसाइल लांचर अभी भी सक्रिय हालात में हैं .
ईरान जल्द ही अपने ड्रोन जखीरे का 70 फीसदी हिस्सा वापस हासिल कर सकता है. वह ड्रोन का उत्पादन 10 गुना तेजी से बढ़ा सकता हैं. कहा तो यह भी जा रहा है ईरान के 70 फीसदी बैलिस्टिक मिसाइले बची हैं.जाहिर अगर लडाई फिर से शुरु हुई तो ईरान एक बार फिर से अपने दुश्मन पर कहर बरपा सकता हैं. फिलहाल अमेरिका ने ईरान के साथ जारी सीजफायर को एक बार फिर बढ़ा दिया है लेकिन यह पूरी तरह स्थिर नहीं माना जा रहा.
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