छह महीने बाद भी NASA का छोटा हेलीकॉप्टर मंगल पर भर रहा ऊंची उड़ान

मंगल ग्रह पर हवा का घनत्व पृथ्वी के वायुमंडल के केवल एक प्रतिशत के बराबर है. तुलनात्मक नजरिए से  मंगल ग्रह पर एक हेलीकॉप्टर उड़ाना पृथ्वी से लगभग 20 मील (30 किलोमीटर) की पतली हवा में उड़ने जैसा होगा. इनजेनिटी को पृथ्वी से टेकऑफ़ के शुरुआती झटके का सामना करना पड़ा था

छह महीने बाद भी NASA का छोटा हेलीकॉप्टर मंगल पर भर रहा ऊंची उड़ान

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ने अब इनजेनिटी के मिशन को अनिश्चित काल के लिए बढ़ा दिया है.

वाशिंगटन:

मंगल (Mars) ग्रह पर अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) के हेलीकॉप्टर, इनजेनिटी (Ingenuity) को केवल पांच बार ही उड़ान भरनी थी लेकिन उसने 12 उड़ानें पूरी कर ली हैं और यह रिटायर होने को तैयार नहीं है. इस आश्चर्यजनक और अप्रत्याशित सफलता को देखते हुए, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ने अब इनजेनिटी के मिशन को अनिश्चित काल के लिए बढ़ा दिया है.

इनजेनिटी यानी छोटा हेलीकॉप्टर अब रोवर पर्सवेरेंस का नियमित यात्रा साथी बन गया है, जिसका मुख्य मिशन मंगल ग्रह पर प्राचीन जीवन के संकेतों की तलाश करना है.

इनजेनिटी की मैकेनिकल इंजीनियरिंग टीम के प्रमुख जोश रविच ने कहा, "सब कुछ बहुत अच्छी तरह से काम कर रहा है. हम सतह पर बेहतर कर रहे हैं जितना हमने उम्मीद की थी." इस प्रोजेक्ट में सैकड़ों लोगों ने अपना योगदान दिया था लेकिन वर्तमान में केवल एक दर्जन लोग ही दिन-प्रतिदिन की भूमिका में काम कर रहे हैं. रविच भी पांच साल पहले नासा की इस टीम में शामिल हुए थे.

रविच ने कहा, "जब मुझे हेलीकॉप्टर परियोजना पर काम करने का मौका मिला, तो मेरी प्रतिक्रिया भी किसी और की तरह ही थी. मुझे तब लगा था कि क्या यह भी संभव है?"

मंगल ग्रह पर हवा का घनत्व पृथ्वी के वायुमंडल के केवल एक प्रतिशत के बराबर है. तुलनात्मक नजरिए से  मंगल ग्रह पर एक हेलीकॉप्टर उड़ाना पृथ्वी से लगभग 20 मील (30 किलोमीटर) की पतली हवा में उड़ने जैसा होगा. इनजेनिटी को पृथ्वी से टेकऑफ़ के शुरुआती झटके का सामना करना पड़ा था क्योंकि पहली बार में मंगल पर पहुंचना आसान नहीं था. फिर 18 फरवरी को अंतरिक्ष के माध्यम से सात महीने की यात्रा के बाद मिनी हेलीकॉप्टर रोवर के पेट में बंध कर मंगल ग्रह पर उतरा था.


नए परिवेश में, छोटे (चार पाउंड, या 1.8 किलोग्राम) हेलीकॉप्टर को दिन के दौरान सौर पैनलों से गर्मी प्राप्त करते हुए अपनी बैटरी चार्ज करना पड़ता है और मंगल ग्रह पर रातों की हिमनदीय ठंड से बचाना भी पड़ता है. इसकी उड़ानों को सेंसर का उपयोग करके निर्देशित किया जाता है, क्योंकि पृथ्वी से संचार में 15 मिनट का अंतराल वास्तविक समय के मार्गदर्शन को असंभव बना देता है.

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