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Kedarnath Dham: शुभ मुहूर्त में खुले केदारनाथ धाम के कपाट, 51 क्विंटल फूलों से सजा मंदिर, मोबाइल बैन; यात्रा से पहले जान लें जरूरी बातें

Kedarnath Dham: आज सुबह आठ बजे केदारनाथ के कपाट खोल दिए गए. इस मौके पर केदारनाथ धाम मंदिर को करीब 51 क्विंटल फूलों से सजाया गया है. वहीं 23 अप्रैल को बदरीनाथ धाम के कपाट खोले जाएंगे.

Kedarnath Dham: शुभ मुहूर्त में खुले केदारनाथ धाम के कपाट, 51 क्विंटल फूलों से सजा मंदिर, मोबाइल बैन; यात्रा से पहले जान लें जरूरी बातें
Kedarnath Dham: 51 क्विंटल फूलों से सजा केदारनाथ धाम मंदिर.

Kedarnath Dham: केदारनाथ धाम के कपाट 22 अप्रैल को सुबह 8 बजे विधि-विधान और पूजा-अर्चना के बाद श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए. इस दौरान सीएम पुष्कर सिंह धामी भी मौजूद रहे. इस मौके पर मंदिर को 51 क्विंटल फूलों से सजाया गया है. 21 अप्रैल को देर शाम साढ़े चार बजे बाबा केदार की पंचमुखी डोली धाम पहुंच चुकी है और रात से ही श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगना शुरू हो गया था.

22 अप्रैल को सुबह 8 बजे खुलेंगे कपाट

शुभ मुहूर्त में आज यानी बुधवार सुबह 8 बजे मंदिर के कपाट खोले जाएंगे. कपाट खुलने से पूर्व वैदिक मंत्रोच्चार, रावल की पूजा और विशेष अनुष्ठान सम्पन्न किए जाएंगे, जिसके बाद श्रद्धालुओं के लिए दर्शन शुरू होंगे. इसके साथ ही छह माह तक चलने वाली केदारनाथ यात्रा विधिवत शुरू हो जाएगी और देश-विदेश से लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है.

बता दें कि इस साल केदारनाथ यात्रा पिछले साल की तुलना में पहले शुरू हो रही है. 2025 में धाम के कपाट 2 मई को खुले थे, जबकि इस बार 22 अप्रैल को खुलेंगे. यानी श्रद्धालु इस बार 10 दिन पहले बाबा केदार के दर्शन कर सकेंगे.

6 महीने बंद रहते हैं केदारनाथ मंदिर के कपाट

करीब 6 महीने तक बंद रहने के बाद आज यानी 22 अप्रैल को वृष लग्न में सुबह 8 बजे मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे. कपाट खोलने का मुहूर्त शिवरात्री के अवसर पर निकाला गया था. उसी वक्त बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने का भी मुहूर्त निकला था. बदरीनाथ धाम के कपाट 23 अप्रैल को खोले जाएंगे, जबकि गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट 19 अप्रैल को खुल चुके हैं.

केदारनाथ मंदिर में मोबाइल फोन पर पूरी तरह बैन

वहीं केदारनाथ मंदिर परिसर में फोटो, वीडिया और रील बनाने पर सख्ती रहेगी. अब कोई भी श्रद्धालु केदारनाथ मंदिर परिसर के अंदर मोबाइल फोन लेकर (Kedarnath Yatra Rules) नहीं जा सकेगा. ऐसा करने वालों को दंडित किया जाएगा.

पांचवें ज्योतिर्लिंग बाबा केदार की पंचमुखी चल विग्रह उत्सव डोली सोमवार को केदारनाथ धाम पहुंच गई. इस दौरान सेना के बैंड की मधुर लहरियों और हजारों भक्तों के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो उठा. ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ से पंचमुखी चल विग्रह उत्सव डोली गुप्तकाशी के विश्वनाथ मंदिर में रात्रि विश्राम के बाद फाटा पहुंची, जहां भगवान की उत्सव डोली का रात्रि विश्राम हुआ. इसके बाद भगवान की उत्सव डोली गौरीकुंड पहुंची, जहां पर माता गौरीकुंड में रात्रि विश्राम के बाद डोली 17 किमी पैदल यात्रा तय करते हुए जंगलचट्टी, रामबाड़ा, छोटे-बड़े लिनचोली और बेस कैंप होते हुए केदारपुरी पहुंची. 

केदारनाथ पहुंची बाबा केदार की डोली

जयकारों के बीच बाबा केदारनाथ की उत्सव डोली केदारनाथ धाम पहुंची, जहां मंदिर परिसर में पहुंचते ही हजारों श्रद्धालुओं ने हर हर महादेव और जय बाबा केदार के जयघोषों के साथ पुष्प वर्षा कर डोली का भव्य स्वागत किया. डोली, मंदिर की परिक्रमा कर भंडार गृह में प्रवेश किया, जहां विधिवत पूजा-अर्चना की गई. इस दौरान 8वीं सिखलाई रेजीमेंट के बैंड की मधुर धुनों और डमरू-वाद्य यंत्रों की गूंज से पूरा धाम शिवमय हो गया. इस मौके पर पुलिस और आईटीबीपी की कड़ी सुरक्षा है. कपाट खुलने के साथ ही केदारनाथ यात्रा का विधिवत शुभारंभ होगा.

सदियों से चली आ रही बाबा केदार की डोली की परंपरा

बता दें कि केदारनाथ उत्सव डोली का इतिहास सदियों पुरानी हिमालयी परंपरा से जुड़ा है, जो ओंकारेश्वर मंदिर, ऊखीमठ (शीतकालीन गद्दी) से केदारनाथ धाम तक भगवान शिव की पंचमुखी चल विग्रह मूर्ति की पवित्र पदयात्रा है. यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसमें बाबा केदार शीतकाल में ऊखीमठ में और कपाट खुलने पर धाम में विराजमान होते हैं. यह यात्रा आध्यात्मिक आस्था का प्रतीक है.

चल विग्रह उत्सव डोली केदारनाथ धाम के कपाट बंद होने के बाद, भगवान केदारनाथ की पंचमुखी डोली (चल विग्रह) को ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में लाया जाता है, जहां वे 6 महीने शीतकाल में रहते हैं. यह सदियों पुरानी परंपरा है कि केदारनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले डोली को धूमधाम से पैदल मार्ग से केदारनाथ धाम तक ले जाया जाता है. डोली ऊखीमठ से निकलकर फाटा, गौरीकुंड (गौरी माई मंदिर) और अन्य स्थानों पर विश्राम करती हुई केदारनाथ पहुंचती है. डोली यात्रा का गवाह बनना भक्तों के लिए अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है. इस दौरान आर्मी बैंड और स्थानीय वाद्ययंत्रों (जैसे ढोल-दमाऊ) के साथ भव्य स्वागत किया जाता है.

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