इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आगरा की राजा बलवंत सिंह कॉलेज जैसे प्रमुख संस्थानों का संचालन करने वाली मशहूर बलवंत एजुकेशनल सोसाइटी के प्रबंधन बोर्ड से जुड़े विवाद में अपना महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. कोर्ट ने लंबे समय से चल रहे अवागढ़ के शाही परिवार में चल रहे पारिवारिक विवाद पर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि संविधान आने के बाद ‘राजा' जैसी उपाधि अब कानूनी रूप से अस्तित्व में नहीं हैं और ऐसे जटिल प्रबंधन विवादों का निपटारा याचिका के माध्यम से नहीं बल्कि सक्षम सिविल कोर्ट में ही किया जाएगा.
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संविधान लागू होने के बाद राजा का पद ही खत्म हो गया था जिसका असर इस तरह के विवाद पर पड़ सकता था. इन सभी कारणों से इस मामले को भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत कार्यवाही में हल नहीं किया जा सकता था और न ही किया जा सकता है. कोर्ट ने 6 नवंबर 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की सिंगल बेंच द्वारा दिए गए उस आदेश भी रद्द कर दिया जिसमें दो भाइयों के बीच उपाध्यक्ष पद का कार्यकाल आधा-आधा बांटने का निर्देश दिया गया था.
कोर्ट का मानना है कि अगर पार्टियाँ खुद इस कोर्ट द्वारा समझाने के बावजूद विवाद को सुलझाने के लिए किसी सौहार्दपूर्ण समझौते पर नहीं पहुँच पाई तो रिट कोर्ट के लिए खुद कोई स्कीम बनाना या ऐसी व्यवस्था करना सही नहीं था. इसके लिए न तो कोई मांग की गई थी और न ही ऐसी कोई स्कीम बनाई जा सकती थी और न ही किसी भी पार्टी की स्थिति को किसी भी अवधि के लिए रिट कार्यवाही के तहत घोषित किया जा सकता था. कोर्ट ने कहा कि पार्टियों को कानून के अनुसार उचित कार्यवाही में सोसाइटी/ट्रस्ट/ट्रस्ट द्वारा चलाए जा रहे एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस में ऑफिस बेयररशिप या मेंबरशिप के संबंध में अपने अधिकारों, टाइटल, हित और स्टेटस का फैसला करवाने की पूरी आज़ादी है. यह आदेश चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की डबल बेंच ने बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट व अन्य और बलवंत एजुकेशनल सोसायटी, आगरा और अन्य की स्पेशल अपील को स्वीकार करते हुए दिया है.
दरअसल, ये दोनों अपील 6 नवंबर 2025 के अंतिम आदेश के खिलाफ की गई थी जिसके तहत हाईकोर्ट के सिंगल जज ने चार रिट याचिकाओं का निपटारा किया था. नवंबर 2025 को सिंगल बेंच ने आदेश द्वारा न केवल बलवंत एजुकेशनल सोसाइटी के ऑफिस बेयररशिप के संबंध में बल्कि अन्य पहलुओं के बारे में भी कई निर्देश जारी किए थे. इस मामले में मुख्य विवाद दो चचेरे भाइयों के बीच है जिनका नाम अनिरुद्ध पाल सिंह है जो अपीलकर्ता पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे है और जितेंद्र पाल सिंह हैं जो प्रतिवादी पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. शाही परिवार से जुड़े मामले में अनिरुद्ध पाल सिंह और जितेंद्र पाल सिंह के बीच चल रहे वर्चस्व विवाद पर सुनवाई के दौरान कोर्ट में दायर की गई स्पेशल अपील पर कई दलीलें पेश की गई.
दोनों भाई राजा बलवंत सिंह की विरासत और उनके द्वारा स्थापित ट्रस्ट/सोसाइटी में ‘उपाध्यक्ष' पद पर अधिकार को लेकर आमने-सामने थे. इससे पहले सिंगल बेंच ने समझौते के तौर पर दोनों को ढाई-ढाई साल का कार्यकाल देने का फॉर्मूला तय किया था. सिंगल बेंच ने आदेश दिया था कि पहले ढाई साल जिसमें एक दिसंबर 2025 से बड़े भाई जितेंद्र पाल सिंह वाइस प्रेसिडेंट और सदस्य की जिम्मेदारी संभालेंगे. बाकी ढाई साल छोटे भाई अनिरुद्ध पाल सिंह इस पद का कार्यभार संभालेंगे.
वहीं चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की डबल बेंच ने इस विवाद पर दायर की गई स्पेशल अपील पर सभी पक्षों को सुनने के बाद अपने आदेश में कहा कि बताए गए विवाद के जटिल स्वरूप और पार्टियों द्वारा रिट कोर्ट के हस्तक्षेप से किए जाने वाले फैसले को देखते हुए कोर्ट ने पाया हैं कि सिंगल जज ने बोर्ड, परिवार, विरासत और सभी भाइयों की लंबी भागीदारी के हित में जन्मतिथि के आधार पर सबसे बड़े से सबसे छोटे के क्रम में सदस्य और वाइस प्रेसिडेंट बनने के लिए समान अवधि के लिए एक समाधान प्रस्तावित किया है और कई अन्य निर्देश जारी किए है जो कोर्ट की राय में ज़रूरी नहीं थे. कोर्ट ने कहा कि तथ्यों से जुड़े कई विवादित सवाल होने के कारण जो न केवल राज बलवंत सिंह द्वारा बनाई गई वसीयत और कोडीसिल पर आधारित हैं बल्कि उसमें बताई गई शर्तों की व्याख्या, बताई गई जन्मतिथि के बारे में विवाद ताकि यह तय किया जा सके कि APS या JPS उम्र में कौन बड़ा था.
सोसाइटी के नियमों के नियम नौ में राजा बलवंत सिंह द्वारा बनाई गई वसीयत और कोडीसिल को अपनाना और यह तथ्य कि संविधान आने के बाद राजा का पद ही खत्म हो गया था जिसका असर इस तरह के विवाद पर पड़ सकता था. इन सभी कारणों से इस मामले को भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत कार्यवाही में हल नहीं किया जा सकता था और न ही किया जा सकता है. कोर्ट ने दोनों अपीलों को स्वीकार करते हुए छह नवंबर 2025 को सिंगल जज द्वारा दिए फैसले को रद्द कर दिया.
हालांकि कोर्ट ने दोनों पक्षों को स्वतंत्रता दी कि वो अपने अधिकारों और पद के निर्धारण के लिए विधि अनुसार सिविल कार्यवाही या अन्य उपयुक्त कानूनी मंच का सहारा लें. इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले को सोसाइटी प्रबंधन मामलों में रिट क्षेत्राधिकार की सीमाएं स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण फैसला माना जा रहा है.
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