- उत्तर प्रदेश के एटा में 2025 में खुदाई के दौरान 9वीं-10वीं शताब्दी की प्राचीन जैन तीर्थंकर मूर्ति मिली थी.
- इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मूर्ति को एटा पुलिस से लेकर प्रयागराज केंद्रीय संग्रहालय में सुरक्षित रखने का आदेश दिया.
- दिगंबर और श्वेतांबर जैन संप्रदायों के बीच मूर्ति के मालिकाना हक को लेकर कोर्ट में विवाद चल रहा है.
उत्तर प्रदेश के एटा में 2025 में खुदाई के दौरान 9वीं-10वीं शताब्दी की जैन धर्म से जुड़ी एक प्राचीन मूर्ति मिली थी. इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुनवाई करते हुए अपने महत्वपूर्ण फैसले में मूर्ति को एटा पुलिस की कस्टडी से प्रयागराज स्थित केंद्रीय संग्रहालय में सुरक्षित कस्टडी में रखे जाने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने एटा के जिला मजिस्ट्रेट को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि मूर्ति को सुरक्षित कस्टडी में प्रयागराज स्थित केंद्रीय संग्रहालय में लाया जाए. कोर्ट अब इस मामले में 13 अप्रैल को सुनवाई करेगा.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि प्रतिमा को किसी भी स्थिति में 11 अप्रैल 2026 तक प्रयागराज स्थित केंद्रीय संग्रहालय के निदेशक/प्रभारी निदेशक को सौंप दिया जाए. हाई कोर्ट ने बेशकीमती जैन प्रतिमा को सुरक्षित अभिरक्षा के लिए प्रयागराज स्थित केंद्रीय संग्रहालय में स्थानांतरित करने का आदेश दिया है. यह आदेश जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की डिविजन बेंच ने एटा की दिगंबर जैन सभा और अन्य समेत दाखिल तीन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया है.
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खुदाई के दौरान मिली थी जैन तीर्थंकर की मूर्ति
दरअसल, जून 2025 में एटा जिले के रिजोर क्षेत्र में जल जीवन मिशन की खुदाई के दौरान हजारों वर्ष पुरानी एक प्राचीन जैन तीर्थंकर की मूर्ति मिली थी. जैन संप्रदाय से जुड़े दिगंबर और श्वेतांबर समुदायों ने इस मूर्ति को लेकर अपना-अपना दावा ठोका था, जिसके बाद इसे प्रशासन ने कब्जे में ले लिया था. बताया जा रहा है कि मूर्ति को एटा के एक थाने में पुलिस कस्टडी में रखा गया है. इस मूर्ति पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India) की जांच के बाद ही फैसला होगा. कोर्ट ने प्रतिमा के मालिकाना हक को लेकर दिगंबर और श्वेतांबर जैन संप्रदायों के बीच बढ़ते विवाद और संवेदनशीलता को मूर्ति को देखते हुए प्रयागराज स्थित केंद्रीय संग्रहालय में रखने का आदेश दिया है.
मूर्ति के मालिकाना हक को लेकर दिगंबर और श्वेतांबर संप्रदाय ने जुलाई 2025 में याचिका दाखिल की थी. इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की तरफ से रिजाइंडर एफिडेविट फाइल किया गया. कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल भूषण और वरिष्ठ अधिवक्ता निपुण सिंह ने मामले में पक्ष रखा. इस याचिका में ASI और राज्य सरकार की तरफ से भी दलीलें पेश की गई.
मूर्ति के लिए दिगंबर और श्वेतांबर समुदाय का दावा
इस प्रतिमा को जैन समुदाय के दिगंबर और श्वेतांबर अपने-अपने संप्रदाय से संबंधित बताकर दावा पेश कर रहे हैं. कोर्ट में बताया गया कि ASI द्वारा मूर्ति का निरीक्षण किया गया और दो सदस्यों वाली समिति ने एक रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें कहा गया था कि यह मूर्ति दिगंबर संप्रदाय की प्रतीत नहीं होती है, बल्कि श्वेतांबर संप्रदाय की होने का संकेत देती है. हालांकि बाद में एएसआई के विशेषज्ञों द्वारा एक नया सर्वेक्षण/जांच की गई और एएसआई आगरा मंडल के अधीक्षण पुरातत्वविद् ने 27 अगस्त 2025 को जिला मजिस्ट्रेट को एक रिपोर्ट प्रस्तुत की.
इस रिपोर्ट में कहा गया था कि इस मूर्ति को श्वेतांबर या दिगंबर संप्रदाय से संबंधित मानने की पहचान केवल मूर्ति में मौजूद मौजूदा मूर्तिकला और शैलीगत साक्ष्यों के आधार पर निर्णायक रूप से स्थापित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इसके लक्षण या तो अनिर्णायक है या फिर दोनों संप्रदायों में समान रूप से पाए जाते हैं. रिपोर्ट में बताया गया कि जैन कला और मूर्तिकला के विषय विशेषज्ञों की एक समिति का गठन जिला कलेक्टर द्वारा किया जाए, जिसमें श्वेतांबर और दिगंबर दोनों के ही प्रतिनिधित्व शामिल हों. ऐसी समिति एएसआई के परामर्श से कार्य करते हुए इस मूर्ति का मूल्यांकन प्रस्तुत कर सकती है जिसे न्यायालय के सामने रखा जा सकता है.
अतिरिक्त सहायता और डॉक्यूमेंटेशन के लिए तैयार: ASI
ASI ने कहा है कि जिला प्रशासन अथवा न्यायालय द्वारा अपेक्षित किसी भी अतिरिक्त तकनीकी सहायता और डॉक्यूमेंटेशन के लिए ASI सदैव उपलब्ध रहेगा. कोर्ट में सीनियर एडवोकेट निपुण सिंह ने तर्क दिया कि यदि प्राप्त दूसरी रिपोर्ट उसी विभाग द्वारा पहले प्रस्तुत की गई पहली रिपोर्ट का स्थान ले लेती है तो ऐसी स्थिति में इस रिपोर्ट के लिए उन विद्वानों द्वारा गहन परीक्षण और सूक्ष्म जांच की आवश्यकता है जिनके पास इस विषय-वस्तु से संबंधित शोध का अनुभव और अध्ययन है.
वहीं सीनियर एडवोकेट अनिल भूषण ने कोर्ट में कहा कि इंडियन ट्रेजर ट्रोव एक्ट, 1878 के तहत कलेक्टर ही ऐसी संपत्ति का संरक्षक होता है, यदि वह जमीन की खुदाई के दौरान बरामद होती है और यदि पक्षों द्वारा कोई दावा प्रस्तुत किया जाता है तो उसका समाधान उस अधिनियम के तहत निर्धारित उचित उपाय के माध्यम से ही किया जाना चाहिए लेकिन किसी भी स्थिति में ऐसी संपत्ति की हिरासत पुलिस के पास नहीं हो सकती है. राज्य सरकार की तरफ से पेश अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता प्रदीप कुमार शाही ने भी न्यायालय के सामने यह बताया कि 27 अगस्त 2025 को प्रस्तुत रिपोर्ट पर विशेष रूप से भरोसा किया गया है.
कोर्ट ने विशेषज्ञ टीम गठित करने का दिया आदेश
कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद कहा कि अधीक्षण पुरातत्वविद् ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि यह मूर्ति 9वीं-10वीं शताब्दी की है. मूर्ति की पहचान को लेकर किसी विशेष संप्रदाय की धार्मिक व्याख्या की संवेदनशीलता को देखते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि मूर्ति को प्रयागराज के केंद्रीय संग्रहालय में सुरक्षित रखा जाए. कोर्ट ने एटा के जिला मजिस्ट्रेट को यह निर्देश दिया कि वे यह सुनिश्चित करें कि मूर्ति को सुरक्षित अभिरक्षा में प्रयागराज के केंद्रीय संग्रहालय तक लाया जाए और किसी भी हाल में 11 अप्रैल 2026 तक प्रयागराज स्थित केंद्रीय संग्रहालय के निदेशक/प्रभारी निदेशक को सौंप दिया जाए.
प्रतिमा की सही पहचान और उसके संप्रदाय का निर्धारण करने के लिए हाई कोर्ट ने एक विशेषज्ञ टीम गठित करने का भी आदेश दिया है. यह टीम एएसआई के साथ समन्वय स्थापित कर प्रतिमा के स्वरूप, उसकी प्रकृति, काल और विशेष रूप से जैन पंथों से इसके संबंध का गहन अध्ययन करेगी. कोर्ट ने निर्देश दिया है कि विशेषज्ञों की समिति तीन महीने के अंदर अपनी विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगी, जिसे एक सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा.
मामले की अगली सुनवाई में जिला मजिस्ट्रेट को प्रतिमा सौंपने की प्रक्रिया से संबंधित अनुपालन रिपोर्ट और 'पजेशन मेमो' पेश करना होगा. कोर्ट ने आदेश दिया है कि एक बार जब मूर्ति को प्रयागराज स्थित केंद्रीय संग्रहालय को सौंप दिया जाएगा तो प्रयागराज स्थित केंद्रीय संग्रहालय इसे संग्रहालय में किसी उपयुक्त स्थान पर सार्वजनिक दर्शन के लिए स्थापित करेगा.
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