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'कल रोटी के लाले थे, आज गोल्ड की तालाश, बॉक्सिंग के 5 धुरंधर रिंग में, जगी पदक की उम्मीद

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत की तरफ से आज कुल पांच बॉक्सर रिंग में हैं. जिनसे लोगों को पदक की उम्मीद है.

'कल रोटी के लाले थे, आज गोल्ड की तालाश, बॉक्सिंग के 5 धुरंधर रिंग में, जगी पदक की उम्मीद
जादुमणि सिंह और प्रीति पवार

कॉमनवेल्थ गेम्स के 23वें सीजन का रोमांच हर किसी के ऊपर छाया हुआ है. टूर्नामेंट के शुरुआती पांच दिन समाप्त हो चुके हैं. छठवें दिन का खेल जारी है. भारत की तरफ से आज महिला और पुरुषों की कैटिगरी में मिलाकर कुल पांच मुक्केबाज एक्शन में नजर आने वाले हैं. ये खिलाड़ी प्रीति पवार, परवीन हुड्डा, प्रिया घंघास, जादूमनी मांडेबगम के अलावा कपिल पोखरिया हैं. 54 किग्रा भार वर्ग में रात 10.30 बजे प्रीति पवार नॉर्दर्न आयरलैंड की मुक्केबाज निकोल क्लाइड का सामना करेंगी. वहीं 60 किग्रा भार वर्ग में प्रिया घंघास स्कॉटलैंड की मुक्केबाज नियाम मिशेल, 65 किग्रा भार वर्ग में परवीन हुड्डा इंग्लैंड की मुक्केबाज साचा हिकी, 55 किग्रा भार वर्ग में जादुमणि सिंह जाम्बिया के मु्क्केबाज म्वेंगो म्वाले और 90 किग्रा भार वर्ग में कपिल पोखरिया स्कॉटलैंड के मुक्केबाज रॉबर्ट मैकनल्टी के साथ मुकाबला करेंगे. 

प्रीति पवार

प्रीति पवार हरियाणा के भिवानी से ताल्लुक रखती हैं. जिसे भारत का बॉक्सिंग हब कहा जाता है. मगर उनके घर में खेल का माहौल नहीं था. उनके पिताजी किसानी करते थे. शुरूआत में लोगों से उन्हें काफी ताने सुनने को मिलते थे. लोग कहते थे, 'लड़की है, क्या ही बॉक्सिंग करेगी.' मगर प्रीति को लोगों की बातों का फर्क नहीं पड़ा. महज 12 से 13 साल की उम्र में ही उन्होंने लोकल अकादमी जॉइन कर ली थी. शुरुआत में उनके पास किट, ग्लव्स, डाइट के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे. मगर फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और आज वह किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं. 

प्रिया घंघास 

प्रिया घंघास हरियाणा के झज्जर इलाके से आती हैं. उनके परिवार में भी लोग किसानी करते हैं. प्रीति पवार की तरह ही उनके घर में भी खेल का माहौल नहीं था. मगर छोटी उम्र में ही एक बार मैरी कॉम और विजेंदर सिंह को देखकर उनके मन में भी बॉक्सर बनने का सपना जगने लगा था. शुरुआत में तो उनके घर वालों ने मना किया. मगर वह जिद पर अड़ गईं. जिसके बाद घर वालों को भी झुकना पड़ा. प्रिया ने 12 साल की उम्र में ही झज्जर स्थित एक लोकल अकादमी को जॉइन कर लिया था. वह प्रतिदिन 10 किलोमीटर साइकिल चलाकर प्रैक्टिस करने के लिए जाया करती थीं. आज ग्लासगो वह में वह देश की उम्मीद बनी हुई हैं. 

परवीन हुड्डा 

परवीन हुड्डा भी किसान परिवार से आती हैं. उनके घर में भी बॉक्सिंग का माहौल नहीं था. गांव की रिती रिवाज देखते हुए उनके पिता ने साफ शब्दों में बॉक्सिंग करने से मना कर दिया था. उनका कहना था, 'लोग क्या कहेंगे.' खेल के दौरान, 'गंभीर चोट लग गई तो क्या होगा?' मगर इन सब के बावजूद परवीन ने अपना सपना साकार किया. महज 11 साल की उम्र में ही उन्होंने ठान लिया था कि वह बॉक्सिंग में ही अपना करियर बनाएंगी. एक दिन उन्होंने भिवानी स्थित बॉक्सिंग क्लब जॉइन कर लिया. जिसके बाद वह डेली बस और ऑटो से प्रैक्टिस के लिए 15 किलोमीटर की यात्रा करती थीं. खर्चे के लिए वह ट्यूशन पढ़ाया करती थीं. 

जादुमणि सिंह

पुरुष मुक्केबाज जादुमणि सिंह मणिपुर के इरोइसेंबा से आते हैं. शुरुआत में फुटबॉल के अच्छे खिलाड़ी थे. उनका मन भी काफी फुटबॉल में लगता था. मगर एक दिन उनके चाचा ने बॉक्सिंग से रूबरू करवाया. उसके बाद से तो वह इस खेल के दीवाने हो गए. मौजूदा समय में वह दिन प्रतिदिन इसी खेल में आगे बढ़ रहे हैं. 

कपिल पोखरिया 

कपिल पोखरिया उत्तराखंड में स्थित अल्मोड़ा जिले से आते हैं. जिनका परिवार मिडल-क्लास है. अल्मोड़ा में बॉक्सिंग की सुविधा नहीं होने की वजह से वह ट्रेनिंग के लिए प्रतिदिन घंटों की सफर करके हल्द्वानी/देहरादून आते थे. शुरुआत में लोग कहते थे, 'पहाड़ी लड़का, बॉक्सिंग में क्या ही करेगा?' मगर आज कपिल अपने खेल और मेहनत से किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. 

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