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This Article is From Apr 06, 2026

अनोखी परंपरा: पुजारी की लात लाती है सौभाग्य, अप्रैल महीने में हर साल Kick खाने मंदिर पहुंचते हैं हजारों लोग

Priest’s Kick Brings Blessing: पुजारी की लात खाने के लिए हर साल अप्रैल महीने में मशहूर श्री सिद्ध रामेश्वर मंदिर में लोग पहुंचते हैं और मंदिर के पुजारी से लात खाने के लिए लाइन में खड़े हो जाते हैं. ऐसी मान्यता है कि पुजारी के लात खाने से उन्हें आशीर्वाद मिलता है और सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. इतना ही नहीं, पुजारी के लात से उन्हें 'मोक्ष' भी मिल सकता है.

अनोखी परंपरा: पुजारी की लात लाती है सौभाग्य, अप्रैल महीने में हर साल Kick खाने मंदिर पहुंचते हैं हजारों लोग
PRIEST'S KICK, BRINGS GOOD FORTUNE, ANNUAL FESTIVAL OF KRRNOOL (ScreenGrab)

Unique Tradition: आंध प्रदेश के कुरनूल ज़िले में स्थित एक मंदिर की एक दुर्लभ परंपरा सुनकर कोई भी हैरान रह जाएगा, जहां सौभाग्य पाने के लिए हजारों की भीड़ हर साल इकट्ठा होती है. अप्रैल महीने में होने वाले इस खास उत्सव में मंदिर के पुजारी  किक मारकर आशीर्वाद देते है और पुजारी की लात खाने के लिए यहां हजारों की संख्या में लोग कतारबद्ध होकर खड़े होते हैं.

पुजारी की लात खाने के लिए हर साल अप्रैल महीने में मशहूर श्री सिद्ध रामेश्वर मंदिर में लोग पहुंचते हैं और मंदिर के पुजारी से लात खाने के लिए लाइन में खड़े हो जाते हैं. ऐसी मान्यता है कि पुजारी के लात खाने से उन्हें आशीर्वाद मिलता है और सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. इतना ही नहीं, पुजारी के लात से उन्हें 'मोक्ष' भी मिल सकता है.

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अप्रैल महीने में हर साल होती है सौभाग्य के प्रतीक यह प्रथा

गौरतलब है सौभाग्य की प्रतीक मानी जाने वाली यह प्रथा हर साल अप्रैल महीने में होती है, जिसमें आंध्र प्रदेश के साथ-साथ पड़ोसी राज्य् तेलंगाना, कर्नाटक और दूसरे राज्यों से हज़ारों लोग पहुंचते हैं और पुजारी के लात खाकर प्रसन्न होते हैं. उत्सव की शुरुआत 2 अप्रैल को हम्पी पूर्णिमा के दिन भगवान शिव की रथ यात्रा से होती है और तीसरे दिन 5 अप्रैल को देवी पार्वती और भगवान शिव के दिव्य विवाह का भव्य आयोजन किया जाता है.

5 अप्रैल को विवाह समारोह के बाद होती है अनोखी रस्म

रिपोर्ट के मुताबिक पुजारी की लात मारने वाले अनोखी रस्म हर साल सालाना उत्सव के दौरान निभाई जाती है. इसकी शुरुआत हम्पी पूर्णिमा के दिन भगवान शिव की रथ यात्रा से होती है और तीसरे दिन देवी पार्वती और भगवान शिव के विवाह का भव्य आयोजन किया जाता है. जैसे ही विवाह की रस्में पूरी होती हैं, लात मारने की मुख्य कार्यक्रम होती है, जिसके लिए सैकड़ों भक्त मंदिर के बाहर कतारों में खड़े हो जाते हैं.

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पुजारी के लात मारने का कार्यक्रम देवी पार्वती और भगवान शिव के दिव्य विवाह के बाद होता है, जिसके लिए हजारों श्रद्धालु लाइन में मंदिर के बाहर खड़े हो जातै हैं और अपने सिर पर देवी-देवताओं की मूर्तियां और एक हाथ में त्रिशूल लिए हुए पुजारी भीड़ के बीच नाचते हुए आगे बढ़ते हैं और कतार में खड़े किसी-किसी को लात से किक मारते हैं.

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पुजारी में होता है भगवान शिव के उग्र रूप वीरभद्र का वास

ऐसी मान्यता है कि लात मारने वाले पुजारी के शरीर में भगवान शिव के उग्र रूप वीरभद्र का वास होता है, जो नाचते हुए कुछ भक्तों को अपने पैर से लात मारते हैं, कतार में खड़े श्रद्धालु डरने के बजाय, बेसब्री से पुजारी की लात का इंतज़ार करते हैं. कई लोग तो पुजारी की लात खाने के लिए पुजारी के और करीब चले जाते हैं.

संतान, नौकरी, अच्छी सेहत और जीवन में मिलती है शांति

गांव वालों का पक्का विश्वास है कि पुजारी की लात सारी परेशानियां दूर कर देती है और सौभाग्य लाती है. कुछ लोगों का यहां तक मानना ​​है कि पुजारी के लात मारने से उन्हें संतान सुख, नौकरी सुख, अच्छी सेहत और जीवन में शांति मिलती है. वहीं, कुछ लोगों का मानना ​​है कि इससे उनके सारे पाप धुल जाते हैं और उन्हें मोक्ष या मुक्ति मिल जाती है. गांव के युवा आज भी इस अनोखी और शक्तिशाली परंपरा की पूरी शान से रक्षा करते हैं.

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500 साल से अधिक पुरानी है पुजारी के लात मारने की परंपरा

स्थानीय इतिहास के अनुसार मंदिर के पुजारी के लात मारने की परंपरा 500 साल से भी ज़्यादा पुरानी है. बड़े-बुज़ुर्ग बताते हैं कि बहुत समय पहले, भगवान शिव और देवी पार्वती के विवाह के दौरान भक्तों से रस्में निभाने में कुछ गलतियां हो गई थीं. इससे भगवान वीरभद्र क्रोधित हो गए और पुजारी के माध्यम से प्रकट हुए थे. तब से लेकर आज तक हर साल इसी परंपरा को निभाया जाता है.

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