- पायलट के दौरे को पूर्वी राजस्थान के सियासी फीडबैक से जोड़कर देखा जा रहा है.
- पायलट की सक्रियता कांग्रेस के 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारी का संकेत मानी जा रही है.
- 2023 के चुनाव में पायलट की कम सक्रियता के कारण कांग्रेस को भारी नुकसान हुआ था.
राजस्थान कांग्रेस में सचिन पायलट की लगातार बढ़ती सक्रियता अब नए राजनीतिक संकेत दे रही है. पहले मेवाड़-वागड़ का दौरा और अब अपने विधानसभा क्षेत्र टोंक के दो दिवसीय दौरे पर पायलट. इन दो दिनों में पायलट टोंक के लक्ष्मीपुरा, हमीरपुर और कुहाड़ा गांव में निजी कार्यक्रमों में शामिल होंगे. इसके अलावा आदिवासी कार्यकर्ता सम्मेलन को भी संबोधित करेंगे और रात्रि विश्राम भी टोंक में करेंगे. पायलट गांव-गांव जाकर लोगों और कार्यकर्ताओं से संवाद करेंगे. ऐसे में पायलट की सक्रियता को लेकर सवाल यह है कि क्या कांग्रेस आलाकमान ने पायलट को 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारी का संकेत दे दिया है या फिर यह सिर्फ संगठन को मजबूत करने की कवायद है? इन्हीं बातों को समझने की कोशिश करेंगे.
सिसायी फीडबैक से जोड़ रहे दौरा
सचिन पायलट के दौरे को लेकर राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि उनका यह दौरा सिर्फ अपने विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं माना जा रहा. राजनीतिक जानकार इसे पूर्वी राजस्थान के सियासी फीडबैक से जोड़कर देख रहे हैं. प्रदेश की सियासत को समझने वाले बांसवाड़ा दीपक श्रीमाल कहते हैं कि इससे पहले पायलट ने मेवाड़-वागड़ के आदिवासी इलाकों में संगठन को सक्रिय करने की कोशिश की थी. अब टोंक के जरिए पूर्वी राजस्थान में संगठन की नब्ज टटोलने की चर्चा है.
सतीश पूनिया के हाल के दौरे के समय विरोध की जिक्र करते हुए दीपक माल बताते हैं कि हाल ही में राज्यसभा सांसद सतीश पुनिया दौरे पर आए थे तो उनके किसी पुराने बयान को लेकर विरोध हुआ था, लेकिन सचिन पायलट ने अपनी यात्रा के दौरान और अपनी यात्रा के पीछे भी कोई सवाल नहीं छोड़ा कि कांग्रेस को नुकसान हो.
'कांग्रेस के मजबूत स्तंभ हैं पायलट'
टोंक के वरिष्ठ पत्रकार समीर उर्रहमान सचिन पायलट को लेकर कहते हैं कि वह एक युवा नेता हैं, उनमें काम करने की क्षमता है और युवाओं को जोड़ने के साथ-साथ 36 कौम उनके साथ है. जिस हिसाब से सचिन पायलट सक्रिय दिख रहे हैं और बुजुर्गों व महिलाओं के मुद्दे पर जवाब देते हैं. इस बात के संकेत दिख रहे हैं कि राजस्थान कांग्रेस में बड़ा बदलाव हो सकता है. जबकि राजकुमार करनानी का कहना है कि 2028 के चुनाव में अभी समय है. पर सचिन पायलट कांग्रेस के मजबूत स्तंभ हैं. वह स्थानीय स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने का काम कर रहे हैं. सचिन पायलट के दौरे का सीधा मतलब यह है कि इन 3 सालों के बीच में जो कांग्रेस कार्यकर्ता नर्वस हो गए. उनमें फिर से जान फूंकने और ताकत देने की कोशिश है. जिसका आने वाले समय में असर भी देखने को मिल सकता है.

मेवाड़-वागड़ का सियासी गणित
बता दें कि मेवाड़-वागड़ की 28 विधानसभा सीटें राजस्थान की सत्ता का अहम केंद्र मानी जाती हैं. 2023 में यहां भाजपा ने 17, कांग्रेस ने 7 और भारत आदिवासी पार्टी यानी BAP ने 3 सीटें जीती थीं. कांग्रेस के सामने यहां अपना पारंपरिक आदिवासी जनाधार वापस हासिल करने की चुनौती है. वहीं पूर्वी राजस्थान की राजनीति भी कांग्रेस के लिए बेहद अहम मानी जाती है. इसे सचिन पायलट का गढ़ माना जाता है.
दौसा पूर्वी राजस्थान के पांच अहम जिलों दौसा, सवाई माधोपुर, करौली, धौलपुर और टोंक की 21 विधानसभा सीटों पर 2018 और 2023 के बीच बड़ा राजनीतिक बदलाव देखने को मिला. 2018 में जब पायलट पीसीसी चीफ थे और सीएम पद के दावेदार थे, तब इन 21 सीटों में कांग्रेस का दबदबा था और उसने 16 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा केवल एक सीट पर सिमट गई थी, लेकिन 2023 के चुनाव में पायलट के नेपथ्य में होने की वजह से भाजपा ने जोरदार वापसी करते हुए 10 सीटें जीत लीं.
वहीं कांग्रेस 16 से घटकर 10 सीटों पर आ गई. यानी जिन पांच जिलों में 2018 में कांग्रेस का एकतरफा प्रभाव था वहां 2023 में भाजपा और कांग्रेस 10-10 सीटों के साथ लगभग बराबरी पर पहुंच गईं. खास बात यह रही कि कांग्रेस ने चुनाव में पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना यानी ERCP को बड़ा मुद्दा बनाया था लेकिन उसका चुनावी लाभ नहीं मिला.
मेवाड़-वागड़ के बाद अब पूर्वी राजस्थान में सचिन पायलट की सक्रियता ने राजस्थान कांग्रेस की सियासत में नई चर्चा छेड़ दी है. आदिवासी बेल्ट से लेकर पूर्वी राजस्थान तक लगातार दौरे इस बात के संकेत जरूर दे रहे हैं कि कांग्रेस आलाकमान पायलट के ज़रिए 2028 की तैयारी अभी से शुरू करना चाहता है. वजह चाहे जो भी हो लेकिन पायलट की बढ़ती सक्रियता पर राजनीतिक हलकों की नजरें टिकी हुई हैं.
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