पहली नजर में किसी बर्फीली जगह सा लगने वाला यह नजारा पर्यटकों को काफी लुभाता है. इसे राजस्थान का 'मिनी स्विट्जरलैंड' भी कहा जाता है. अजमेर जिले के किशनगढ़ शहर से महज 3-4 किलोमीटर दूर स्थित यह जगह असल में मार्बल डंपिंग यार्ड है, जो यहां आने वाले पर्यटकों की पहली पसंद है. लेकिन यही टूरिस्ट प्लेस अब प्रदूषण का हॉटस्पॉट भी बन चुका है. राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय की रिसर्च में सामने आया है कि इस पर्यटन स्थल का प्रदूषण स्तर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की निर्धारित सीमा से 4 से 12 गुना है. जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की अनुशंसित सीमा से 20 से 50 गुना अधिक प्रदूषण पाया गया.
एशिया का सबसे बड़ा डंपिंग यार्ड है ये जगह
यह एशिया का सबसे बड़ा मार्बल डंपिंग यार्ड है. यहां सालों से मार्बल कटाई के दौरान निकलने वाला अवशेष और पाउडर जमा किया जाता रहा है. करीब 350 एकड़ में फैले इस स्थान पर 700 से अधिक टैंकर द्वारा लगभग 22 लाख लीटर मार्बल स्लरी डाली जाती है. इसके चलते धीरे-धीरे यह कचरा पहाड़ों का रूप ले चुका है. केंद्रीय विश्वविद्यालय की रिचस्च ने पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर लक्ष्मीकांत शर्मा ने बताया कि यह पहला अध्ययन है, जिसमें डंपिंग यार्ड के 15 किलोमीटर के दायरे में सिंचित और वर्षा आधारित कृषि भूमि, भूजल और वायु गुणवत्ता का आंकलन किया गया.
इसके साथ ही 'परमाणु अवशोषण स्पेक्ट्रोस्कोपी' तकनीक से प्रदूषकों की सांद्रता (Concentration) और एक्स-रे विवर्तन (XRD) विश्लेषण के माध्यम से प्रदूषण के खनिजीय स्वरूप को स्टडी किया गया. एएएस तकनीक के जरिए मिट्टी और पानी में मौजूद धातुओं और अन्य प्रदूषकों की मात्रा का पता लगाया जाता है.
प्री-वेडिंग फोटोशूट के चलते पॉपुलर स्पॉट

यह अनोखी लोकेशन विदेशी पर्यटकों को भी आकर्षित करती है.
यह जगह सिर्फ एक डंपिंग साइट नहीं, बल्कि फोटोग्राफी और सोशल मीडिया के लिए परफेक्ट डेस्टिनेशन बन चुकी है. यहां आने वाला हर व्यक्ति अपने कैमरे में इस अनोखे नजारे को कैद करना चाहता है. बर्फ जैसे सफेद और आकर्षक स्वरूप के कारण यह स्थान ‘प्री-वेडिंग फोटोशूट', व्यावसायिक शूटिंग और पर्यटन के लिए बेहद लोकप्रिय हो गया है. यहां प्रतिदिन करीब 5 हजार पर्यटक आते हैं. जबकि वीकेंड और छुट्टियों में यह संख्या 20 हजार तक पहुंच जाती है.
53 फीसदी क्षेत्रवासियों को सांस लेने में दिक्कत
सबसे अधिक प्रदूषण उस समय दर्ज किया गया, जब औद्योगिक गतिविधियां चरम पर थीं और तेज सतही हवाएं चल रही थीं. रिसर्च में सामने आया कि मार्बल की धूल से लगातार पर्यावरण को नुकसान और स्वास्थ्य समस्याएं हो रही हैं.
पीएचडी शोधार्थी बसंत बिजारणिया ने बताया कि अध्ययन के दौरान आसपास की मिट्टी और भूजल में भारी धातुएं पाई गईं. रिसर्च में रेगलुर मॉनिटरिंग, प्रभावी नियामक नियंत्रण और जनस्वास्थ्य संबंधी हस्तक्षेप के दखल की सलाह दी गई.
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