राजस्थान के झालावाड़ जिले से एक ऐसी प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है. देशी गाय के गोबर को अब बेकार नहीं, बल्कि रोजगार का आधार बनाया जा रहा है. यहां सहकार भारती के माध्यम से ग्रामीण महिलाएं गोबर से इको-फ्रेंडली राखियां और दीपक तैयार कर रही हैं. इस पहल ने न सिर्फ महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया है, बल्कि गौ संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक नई मिसाल पेश की है. चौमहला क्षेत्र में करीब 400 महिलाएं गोबर से आकर्षक राखियां और दीपक तैयार कर रही हैं. महिलाओं द्वारा बनाई गई राखियां अब दिल्ली, लखनऊ और नागपुर जैसे बड़े शहरों तक पहुंच रही हैं.
इको फ्रेंडली होने के कारण बढ़ी डिमांड
महिलाओं के समूह ने अब तक 10 हजार राखियां तैयार कर भेज दी हैं, वहीं 10 हजार राखियों का नया ऑर्डर भी मिल चुका है. खास बात यह है कि इन राखियों को आकर्षक बनाने के लिए इनमें सजावटी डायमंड और अन्य सामग्री का भी उपयोग किया जा रहा है. इको-फ्रेंडली होने के कारण इन राखियों की मांग लगातार बढ़ रही है.
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सिर्फ राखियां ही नहीं... अब दीपावली की तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं. महिला समूहों को एक करोड़ गोबर और मिट्टी के दीपक बनाने का बड़ा ऑर्डर मिला है. दीपक तैयार करने में देशी गाय का गोबर, चिकनी मिट्टी, ग्वार गम, मैदा और लकड़ी जैसे प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग किया जा रहा है.

इस पूरे अभियान में सहकार भारती से जुड़ी स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. रेखा वर्मा की महत्वपूर्ण भूमिका है. महिलाओं को पहले एक दिन का प्रशिक्षण दिया गया, जिसके बाद वे अपने घर पर ही यह काम कर अच्छी आय अर्जित कर रही हैं.
51 प्रकार के उत्पाद बनाने की ट्रेनिंग
सहकार भारती का लक्ष्य सिर्फ राखी और दीपक तक सीमित नहीं है. संगठन ग्रामीण महिलाओं को 51 प्रकार के गौमय उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दे रहा है. इनमें गौमय राखी, दीपक, बंदनवार, इंडियन झालर सहित कई पर्यावरण हितैषी उत्पाद शामिल हैं. राष्ट्रीय एसएचजी प्रकोष्ठ की मुख्य प्रशिक्षिका अनुराधा श्रीवास्तव और सह संयोजक तुषार श्रीवास्तव महिलाओं को स्वदेशी उत्पादों के निर्माण और विपणन का प्रशिक्षण दे रहे हैं, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें.

डॉ. रेखा वर्मा का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य सिर्फ महिलाओं को रोजगार देना नहीं, बल्कि देशी गौमाता के संरक्षण को बढ़ावा देना भी है. जब गोबर से बने उत्पादों की मांग बढ़ेगी तो पशुपालकों की आय भी बढ़ेगी और बेसहारा घूम रहे गोवंश के संरक्षण में भी मदद मिलेगी. आने वाले समय में सहकार भारती ग्रामीण महिलाओं को सोयाबीन, संतरा, गेहूं और मक्का जैसे स्थानीय कृषि उत्पादों की प्रोसेसिंग का प्रशिक्षण भी देगी, ताकि गांवों में ही नए रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकें.
गोबर से तैयार हो रही ये राखियां और दीपक सिर्फ एक उत्पाद नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत, महिला सशक्तिकरण, गौ संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दे रहे हैं. गांव की महिलाएं अब अपने घर पर रहकर रोजगार पा रही हैं और देशभर में अपनी पहचान बना रही हैं.
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