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गोल्ड मेडल विजेता शूटर, 6 बार के ओलिंपियन, शानदार खेल प्रशासक, एक क्लास शख्सियत, सबके दिलों के ‘राजा’ रणधीर, चले गए..

रणधीर को उनके दोस्त ‘राजा’ कहकर बुलाते थे. पटियाला के रजवाड़ा खानदान से थे. बुधवार को भारत के पहले गोल्ड मेडलिस्ट का निधन हो गया है.

गोल्ड मेडल विजेता शूटर, 6 बार के ओलिंपियन, शानदार खेल प्रशासक, एक क्लास शख्सियत, सबके दिलों के ‘राजा’ रणधीर, चले गए..
Raja Randhir Singh Passed Away

बात 2004, एथेंस ओलिंपिक्स की है. राज्यवर्धन राठौड़ पहली बार डबल ट्रैप शूटिंग का फ़ाइनल खेलने जा रहे थे. भारत से एथेंस ओलिंपिक्स कवर करने गए चंद जर्नलिस्ट, कुछ पूर्व शूटर्स, अधिकारी और कुछ दूसरे एथलीटों के साथ रणधीर सिंह शूटिंग एरेना के ठीक बाहर एक कैंटीन में स्नैक्स खरीद रहे थे. सब एक लंबी पंक्ति में अपनी बारी के आने का इंतज़ार कर रहे थे. 

दो-तीन मिनटों में डबल ट्रैप का फ़ाइनल शुरू होनेवाला था. राठौड़ फ़ाइनल में पहुंचे थे. रणधीर सिंह कैंटीन की पंक्ति में सबसे आगे खड़े थे. तभी उन्होंने पीछे मुड़कर देखा. वहीं से सभी भारतीयों की (तकरीबन 15-20 लोगों की) लाइन में गिनती कर ली. उन्होंने काउंटर पर ढेर सारे डॉलर छोड़ दिये और काउंटर पर खड़े शख़्स से कहा, “ये सब लोग जितना भी जो लेना चाहें, लेने दें. बाक़ी बचे पैसे मुझे बाद में दे देना.” ताकि भारतीय अपना वक्त बचाकर स्नैक्स दूसरे काउंटर से लें और शूटिंग क ऐतिहासिक फ़ाइनल देख सकें. उन्होंने कहा, “आपसब लोग उस काउंटर से बर्गर या जो भी लेना हो ले लें. जल्दी फ़ाइनल में आएं. मेडल आनेवाला है.” 

बाद में फ़ाइनल के वक्त हम जैसे कई पत्रकार उन्हें पैसा लौटाने गए तो उन्होंने सबको झिड़क दिया. मुझसे कहा, “क्या यार विमल, तुम भी!” राज्यवर्धन राठौड़ ने भारत के लिए ओलिंपिक्स में शूटिंग का पहला मेडल  (सिल्वर मेडल) जीता. वो दिन भारतीय खेलों के लिए कई मायनों में ऐतिहासिक साबित हुआ.   

खिलाड़ियों का हौसला बनकर डटे रहे

रणधीर को उनके दोस्त ‘राजा' कहकर बुलाते थे. पटियाला के रजवाड़ा खानदान से थे. मगर राजा कहलाना पसंद नहीं था. हर उम्र के पत्रकार से दस्तों की तरह मिलते. अगर आप एशियाड, कॉमनवेल्थ गेम्स, ओलिंपिक्स या कोई भी मल्टी स्पोर्टिंग गेम्स देखने गए हों या कवर कर रहे हों तो रणधीर सिंह का मिलना लाज़िमी था. 

किसी भी खेल के लिए आख़िर तक उनमें जुनून देखना कमाल की बात थी. जब भारत ओलिंपिक्स में एक भी मेडल नहीं जीत पाता था, या जब इक्का-दुक्का मेडल ही जीत पाता. हर हार-जीत में रणधीर खिलाड़ी के पीछे खड़े दिखते. वो हार रहे खिलाड़ियों का हौसला थे तो जीत रहे खिलाड़ियों का गर्व.  

पेरिस ओलिंपिक्स में मनु भाकर के मेडल, नीरज चोपड़ा के मेडल के साथ वो वेटलिफ़्टिंग हॉल में मीराबाई चानू की हौसलाअफ़ज़ाई के लिए भी गए. खिलाड़ी हारे या जीते उसके पीछे हमेशा डटे रहे. कभी खिलाड़ी की हार के बाद भी आलोचना में शामिल नहीं होते. वो खिलाड़ी को पूरे इको सिस्टम का हिस्सा समझते. हार या जीत को देखने का उनमें एक अलग पर्सपेक्टिव था, समझ थी. हर बार एक बारीक से ऑब्ज़र्वेशन के साथ अपनी प्यारी सी टिप्पणी देते और पत्रकारों को अपनी हेडलाइन या पंच का हिस्सा मिल जाता. 

क्रिकेट से शूटिंग में एशियाड के पहले गोल्ड तक 

शॉटगन शूटिंग यानी स्कीट और ट्रैप शूटिंग में रणधीर राष्ट्रीय स्तर पर छोटी उम्र से ही तहलका मचाने लगे. रणधीर को क्रिकेट की भी अच्छी समझ थी और वो क्रिकेट को करियर भी बनाना चाहते थे. लेकिन शूटिंग में उन्हें शुरुआत से ही बड़ी कामयाबियां मिलने लगीं और फिर उनका करियर का निशाना भी उसी ओर लगने लगा. 

1978 के बैंकाक एशियाड में उन्होंने शूटिंग में भारत के लिए पहला गोल्ड मेडल जीता और अर्जुन पुरस्कार से भी नवाज़े गए. 1982 के दिल्ली में हुए एशियाड में भी शूटिंग टीम के साथ उन्होंने गोल्ड मेडल अपने नाम किया. 

पांच ओलिंपिक्स, चार एशियाड

1968 से 1984 तक वो लगातार पांच ओलिंपिक खेलों में शूटिंग में हिस्सा लेते रहे. ये कारनामा उनसे पहले सिर्फ़ कर्णी सिंह ने किया था. उन्होंने चार एशियाड में भी हिस्सा लिया. 1994 के हिरोशिमा एशियन गेम्स उनके आख़िरी अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंट साबित हुए. उनसे ज़्यादा ओलिंपिक्स खेलने का रिकॉर्ड भारत में सिर्फ़ लिएंडर पेस (7) के नाम है. 

क्लास शख़्सियत!

अपने 79 साल की ज़िन्दगी में बतौर खिलाड़ी तक़रीबन 26-27 साल के लंबे करियर और शानदार कामयाबियों के बावजूद रणधीर सिंह को घमंड छू भी नहीं पाया. खिलाड़ी के करियर के बाद उन्होंने बतौर प्रशासक तमाम सीमाओं के बावजूद भारतीय खेल को अपने अनमोल योगदान दिया. कभी अपने करियर की कामयाबियों की बात नहीं की. कभी किसी भी शख्स पर नाराज़ होकर चीखते नहीं देखा. कभी खिलाड़ियों के पीछे खड़े होकर टीवी पर अपना चेहरा नहीं चमकाया. 

रणधीर जबतक रहे, राजा-सा स्वभाव लेकर अपनी ज़िन्दादिली से सबका दिल जीतते रहे. खेलों की दुनिया में तकरीबन हर देश में उनके दोस्त थे. वो भारतीय ओलिंपिक संघ IOA के जनरल सेक्रेटरी और OCA ओलिंपिक काउंसिल ऑफ़ एशियाड के अध्यक्ष भी रहे. रणधीर की मृत्यु का शोक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर IOC भी मना रहा है. IOC ने ट्वीट किया, “अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) को IOC के मानद सदस्य राजा रणधीर सिंह के निधन के बारे में जानकर गहरा दुख हुआ है।सम्मान के स्वरूप, ओलंपिक हाउस पर तीन दिनों तक ओलंपिक ध्वज आधा झुका रहेगा.”

रणधीर (18 अक्टूबर 1946- 27 मई, 2026) के IOC यानी अंतर्राष्ट्रीय ओलिंपिक परिषद में कई खेल प्रशासकों से ऐसे संबंध थे, जिसने कई बार भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलों की मुश्किल से निकलने में मदद की. यकीनन खेलों की दुनिया ने एक बेहद कुशल और उम्दा खिलाड़ी और प्रशासक खो दिया. रणधीर सर, आप बहुत याद आएंगे.

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