Tejaswin Shankar's historical effort: अगर यह कहा जाए कि बाकी खेल एक तरफ और डेकाथलन एक तरफ, तो बहुत हद तक यह गलत नहीं ही होगा. डेकाथलन में दो दिन के भीतर चलने वाली 10 स्पर्धाओं में किसी भी एथलीट को चुस्ती-फुर्ती, दमखम, शक्ति सहित तमाम पैमानों पर खरा उतरने के बाद पदक के काबिल बनना होता है. लेकिन अगर अंतिम पलों में आप चोटिल हो जाएं, तो आपकी शुरुआती मेहनत पर पानी फिर सकता है. लेकिन चोट के बावजूद कॉमनवेल्थ खेलों के नौवें दिन वीरवार को इतिहास रचने वाले भारतीय एथलीट तेजस्विन शंकर ने इतिहास के सुनहरे पन्नों पर बहुत ही मोटी लकरी कम से कम अगली भारतीय पीढ़ी के लिए तो खींच ही दी है. जब तेजस्विन वीरवार को अपनी आखिरी इवेंट 1500 मी. रेस में कांस्य के 'फिनिशिंग टच' के लिए तैयारी कर करे थे, तो उनके घुटने में असहनीय दर्द हो गया था. यहां तक कि डॉक्टर ने उन्हें रेस से हटने की सलाह भी दी थी. वैसे इस चोट का रिश्ता इवेंट से पहले ही जुड़ गया था.
डॉक्टरों ने दी हटने की सलाह
डेकाथलन जैसे महामुकाबले से कुछ समय पहले तेजस्विन के घुटने में गंभीर चोट लग गई थी. हालात ऐसे थे कि हर कदम उठाने, दौड़ने या कूदने के दौरान उन्हें असहनीय दर्द जो रहा था. यह दर्द उन्हें मैदान से हटने को मजबूर कर रहा था, तो वहीं मेडिकल टीम और डॉक्टरों ने उनकी शारीरिक स्थिति को देखते हुए उन्हें इस मेगा इवेंट से तुरंत नाम वापस लेने की सलाह दी थी. जरा सी लापरवाही उनके करियर को हमेशा के लिए खत्म कर सकती थी, लेकिन इसके बावजूद तेजिस्वन ने आगे बढ़ने का फैसला किया.
पेन-किलर' का सहारा और दर्द के साथ जंग
दो दिनों तक चलने वाले इस खेल में कदम-कदम पर दर्द से उबरने के लिए तेजस्विन को मजबूरन पेन-किलर्स और स्प्रे का सहारा लेना पड़ा. हर एक इवेंट (जैसे हाई जंप, पोल वॉल्ट या 1500 मीटर दौड़) के बाद उनके घुटने का दर्द और बढ़ जाता था, लेकिन हर बार पेन-किलर खाकर वे अगली स्पर्धा के लिए फिर से तैयार हो जाते थे. उन्होंने साबित कर दिया कि जब हौसला बुलंद हो, तो शरीर की शारीरिक सीमाएं और दवाइयां भी आपको रोक नहीं सकतीं
दर्द बन गए खुशी के आंसू
दर्शक दीर्घा में बैठे उनके अपनों की सांसे अटकी हुई थीं, क्योंकि वे देख सकते थे कि तेजस्विन किस भयानक शारीरिक कष्ट से गुजर रहे हैं. लेकिन जब तमाम बाधाओं, असहनीय दर्द और इंजरी को चीरते हुए तेजस्विन ने ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया, तो उनकी आंखें नम हो गईं. यह आंसू दर्द के कम और उस संतोष के ज्यादा थे कि उन्होंने हार नहीं मानी. और आंसुओं की वजह बना वह कारनामा, जो सा 1934 से लेकर खेलों के इतिहास में कोई भी भारतीय खिलाड़ी उनसे पहले नहीं ही कर सका था. किस ने भी डेकाथलन में राष्ट्रकुल खेलों में पदक नहीं ही जीता था. और इस अहसास ने तेजस्विन के तमाम दर्द को हवा-हवाई करते हुए इसे खुशी के आंसुओं में तब्दील कर दिया.
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