- ग्रेटर नोएडा के सेक्टर 150 में मॉल के बेसमेंट में डूबने से सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज की मौत हुई थी
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट में युवराज की मौत फेफड़ों में पानी भरने और दम घुटने के कारण बताई गई है
- हादसे के बाद पुलिस और दमकल विभाग के मौजूद होने के बावजूद युवराज को बचाया नहीं जा सका था
ग्रेटर नोएडा के सेक्टर 150 में सड़क हादसे के बाद मॉल के बेसमेंट में डूबने से सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज की मौत की मौत हो गई. युवराज की पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आ गई है. इसमें खुलासा हुआ है कि डूबने और दम घुटने से युवराज की मौत हुई थी. युवराज मेहता को बचाया जा सकता था? नाले के किनारे मॉल के बेसमेंट में भरे पानी में युवराज लगभग 12 बजे कार के साथ गिरा था. 1 बजकर 45 मिनट तक वह मदद के लिए चिल्लाता रहा, मोबाइल टॉर्च को जलाकर मदद की गुहार लगाता रहा. लेकिन पुलिस, दमकल विभाग के मौजूद होने के बावजूद युवराज को बचाया नहीं जा सकता.
फेफड़ों में भर गया था पानी
युवराज की मौत की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया कि उसके फेफड़ों में पानी भर गया था. फेफड़ों में 200 एमएल पानी पाया गया. इससे साफ होता है कि डूबने और दम घुटने से इसकी मौत हुई थी. युवराज काफी देर तक पानी में डूबा रहा जिससे उसके फेफड़ों में पानी भर गया था।पानी भरने की वजह से उसका दम घुट गया और इस दौरान हार्ट फेलियर भी हो गया. अभी तक युवराज की गाड़ी को उस गड्ढे से नहीं निकाला गया है. प्राधिकरण के द्वारा पंप लगाकर पहले उसे बेसमेंट से पानी को निकाला जाएगा और उसके बाद पुलिस फिर उस गाड़ी को वहां से बाहर निकालेगी.
बिल्डरों पर FIR दर्ज
नोएडा के सेक्टर-150 में बिल्डर साइट पर एक इंजीनियर की मौत के मामले ने नोएडा प्राधिकरण और नामजद बिल्डर कंपनियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. इस मामले में दो बिल्डर कंपनियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है. जानकारी के अनुसार उन पर नोएडा प्राधिकरण का करीब 3000 करोड़ रुपए का बकाया है. हैरानी की बात यह है कि इतना बड़ा बकाया होने के बावजूद प्राधिकरण न तो अपनी राशि वसूल कर पाया और न ही निर्माण स्थल पर न्यूनतम सुरक्षा इंतजाम सुनिश्चित करा सका.
सेक्टर-150 में जिस साइट पर हादसा हुआ, वहां सुरक्षा मानकों की खुलेआम अनदेखी की जा रही थी. मौके पर न तो सेफ्टी बेरिकेट्स लगाए गए थे और न ही चेतावनी संकेतक मौजूद थे. इसी लापरवाही के चलते एक इंजीनियर की जान चली गई. घटना के बाद प्राधिकरण और बिल्डर की मिलीभगत को लेकर सवाल उठने लगे हैं. 7 जुलाई 2014 को लोटस ग्रीन बिल्डर को स्पोर्ट्स सिटी परियोजना के नाम पर इस जमीन का अलॉटमेंट किया गया था. नियमों के तहत इस जमीन का उपयोग खेल और उससे जुड़े बुनियादी ढांचे के विकास के लिए किया जाना था, लेकिन आरोप है कि बिल्डर कंपनी ने नियमों को ताक पर रखकर इस जमीन को अलग-अलग लोगों और संस्थाओं को बेच दिया. इससे न सिर्फ सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचा, बल्कि परियोजना का मूल उद्देश्य भी समाप्त हो गया.
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