महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद के मद्देनजर बुधवार को विधान भवन में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता में उच्चाधिकार समिति की एक अहम बैठक संपन्न हुई. इस बैठक में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के अध्यक्ष और सांसद शरद पवार, सांसद नारायण राणे, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार, सीमावर्ती क्षेत्रों के जनप्रतिनिधि और सर्वदलीय नेता मौजूद थे.
इस बैठक की सबसे खास बात यह रही कि शरद पवार लगभग 30 साल बाद किसी सत्र अधिवेशन के दौरान विधान भवन पहुंचे. शरद पवार के बैठक में शामिल होने की वजह से एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के सभी विधायक उनके स्वागत के लिए विधान भवन में उपस्थित थे.
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संसदीय कार्य मंत्री चंद्रकांत पाटिल ने भी उनका स्वागत किया. विधान भवन परिसर में उनके आगमन की राजनीतिक हलकों में खूब चर्चा रही.
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद की कानूनी लड़ाई को और अधिक प्रभावी ढंग से लड़ने पर चर्चा हुई.
राज्य सरकार ने इस मामले को पूरी ताकत से पेश करने का संकल्प व्यक्त किया. बैठक में इस रुख को कायम रखा गया कि बेलगाम, कारवार, निप्पानी समेत मराठी बहुल इलाकों को संयुक्त महाराष्ट्र में शामिल किया जाना चाहिए.
फडणवीस बोले- हम लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं
बैठक में सीएम देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि हम एक बहुत ही लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं. हम सभी और संपूर्ण महाराष्ट्र पूरी मजबूती के साथ आपके पीछे खड़ा है. सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर अर्जी दाखिल कर इस मामले पर जल्द से जल्द सुनवाई करने का आग्रह किया जाएगा. केंद्रीय गृह मंत्री को फिर से एक पत्र भेजा जाएगा. इसमें महाराष्ट्र के 3 मंत्री और कर्नाटक के 3 मंत्रियों के बीच द्विपक्षीय चर्चा कराने का अनुरोध किया जाएगा, ताकि अदालत के बाहर भी कोई समाधान निकालने का प्रयास किया जा सके.
सूत्रों के मुताबिक, चूंकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, इसलिए राज्य का कानूनी पक्ष और मजबूत करने के लिए जरूरी दस्तावेजों, ऐतिहासिक सबूतों और आगे की रणनीति पर भी विस्तार से चर्चा की गई.
शरद पवार ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत से ही महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद पर लगातार स्टैंड लिया है. उन्होंने मराठी भाषी इलाकों को महाराष्ट्र में शामिल करने की मांग को लेकर कई बार आवाज उठाई है. ऐसे में इस अहम बैठक में उनकी मौजूदगी को बेहद खास माना जा रहा है.
जानकारी के अनुसार, 1996 के बाद यह पहली बार है जब वे सत्र के दौरान विधान भवन आए हैं. बैठक में विभिन्न मुद्दों पर करीब आधा घंटा चर्चा हुई और सीमा विवाद की कानूनी लड़ाई को तेज करने पर सर्वदलीय नेताओं के बीच आम सहमति बनी.
शरद पवार ने एकनाथ शिंदे से की शिष्टाचार भेंट
उच्चाधिकार समिति की बैठक खत्म होने के बाद शरद पवार ने विधान भवन स्थित कक्ष में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से शिष्टाचार मुलाकात की. कैबिनेट बैठक के लिए रवाना होने से पहले एकनाथ शिंदे ने खुद कार्यालय आकर शरद पवार का स्वागत किया.
उन्हें शॉल और बुके देकर सम्मानित किया गया और उनके स्वास्थ्य की भी जानकारी ली गई. इसके बाद शरद पवार ने विधान भवन में एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के विधायकों की एक अलग बैठक भी की. विधान भवन पहुंचने पर उनके पार्टी विधायकों और नेताओं ने गर्मजोशी से उनका स्वागत किया था. इसमें प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल, जितेंद्र आव्हाड, रोहित पाटिल, संदीप क्षीरसागर, उत्तमराव जानकर, अभिजीत पाटिल, राजू खरे, नारायण पाटिल और बापू पठारे समेत कई विधायक व पदाधिकारी मौजूद थे.
आखिर क्या है महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद?
1 नवंबर 1956 को भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया गया था. लेकिन, इस दौरान बेलगाम, कारवार, निप्पानी, बीदर और भालकी जैसे करीब 865 मराठी भाषी बहुल गांवों को तत्कालीन मैसूर (अब कर्नाटक) राज्य में शामिल कर दिया गया. महाराष्ट्र ने इसका कड़ा विरोध किया और तब से यह सीमा विवाद जारी है.
इस विवाद को सुलझाने के लिए केंद्र सरकार ने 1966 में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश मेहरचंद महाजन की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया. इस आयोग ने कारवार, बेलगाम और निप्पानी को कर्नाटक में ही रखने की सिफारिश की. महाराष्ट्र सरकार ने इस रिपोर्ट को अन्यायपूर्ण बताते हुए खारिज कर दिया.
दशकों तक सड़क पर संघर्ष करने और केंद्र सरकार की ओर से कोई राजनीतिक समाधान नहीं निकलने के बाद, महाराष्ट्र सरकार ने 2004 में संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया यह मामला आज भी लंबित है.
बेलगाम और सीमावर्ती क्षेत्रों में 'महाराष्ट्र एकीकरण समिति' पिछले छह दशकों से अधिक समय से लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष कर रही है. वहीं, कर्नाटक सरकार ने बेलगाम को 'उप-राजधानी' का दर्जा देकर वहां 'सुवर्ण विधान सौध' का निर्माण किया है. इसके अलावा, मराठी भाषियों पर कन्नड़ थोपना, गांवों के नाम बदलना और प्रदर्शनकारियों पर केस दर्ज करना जैसे कदम कर्नाटक सरकार द्वारा लगातार उठाए जाते रहे हैं.
शरद पवार का इस सीमा विवाद और इससे जुड़े आंदोलनों से पिछले 5 दशकों का सीधा संबंध रहा है. उन्होंने अपनी युवावस्था में सीमा आंदोलन में हिस्सा लिया था और उन पर लाठीचार्ज भी हुआ था. माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले उनके इस अनुभव से राज्य की कानूनी रणनीति को बड़ा फायदा मिल सकता है.
इस बीच, सुप्रीम कोर्ट में जल्द ही इस मामले पर सुनवाई होने की उम्मीद है. कर्नाटक ने हमेशा यह रुख अपनाया है कि 'महाजन आयोग की रिपोर्ट ही अंतिम है', जबकि महाराष्ट्र भाषाई बहुमत और भौगोलिक निरंतरता के मुद्दे पर अड़ा हुआ है. इस उच्चाधिकार समिति की बैठक से वरिष्ठ वकीलों और विशेषज्ञों के साथ राज्य का पक्ष और मजबूती से रखने की रणनीति पर मुहर लगने की संभावना है.
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