- ठाणे निकाय चुनाव में एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने जोरदार प्रदर्शन कर निगम पर किया कब्जा
- गद्दार के टैग से उत्तराधिकारी तक का सफर, ठाणे में शिंदे की महा-विजय
- नतीजों ने साफ कर दिया है कि ठाणे की जनता के मन में असली शिवसेना को लेकर कोई संशय नहीं है
एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने ठाणे की कुल 131 सीटों में से 75 सीटों पर कब्जा कर पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया है. यह जीत इसलिए बड़ी है क्योंकि शिंदे ने 2017 के 67 सीटों के आंकड़े को पार करते हुए रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन किया है. जिस ठाणे ने शिवसेना को उसकी पहली सत्ता दिलाई थी, वहां उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) महज 1 सीट पर सिमट गई है.
कांग्रेस खाता तक नहीं खोल पाई
सबसे बड़ा उलटफेर कांग्रेस के साथ हुआ है. 65 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद कांग्रेस अपना खाता तक नहीं खोल पाई. शहर अध्यक्ष विक्रांत चव्हाण, जो दशकों से वार्ड 7 का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, वे भी अपनी सीट नहीं बचा सके.
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100 के पार निकला महायुति का आंकड़ा
अपनी जीत के बाद मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने ठाणे के मतदाताओं और विशेष रूप से 'लाडकी बहनों' का आभार व्यक्त किया. उन्होंने कहा कि महिलाओं के समर्थन ने ही शिवसेना को अपने पुराने सारे रिकॉर्ड तोड़ने और 71 सीटों के आंकड़े को पार करने में मदद की है. ठाणे में केवल शिंदे ही नहीं, बल्कि उनकी सहयोगी बीजेपी ने भी 28 सीटें जीतकर अपनी ताकत दिखाई है. शिंदे की सेना और बीजेपी को मिलाकर महायुति का आंकड़ा 100 के पार निकल गया है, जिससे अब ठाणे में महायुति का ही मेयर बैठना तय है.

शिंदे ही असली सेना!
इधर ओवैसी की पार्टी MIM ने चौंकाते हुए 5 सीटें जीती हैं, जो पिछली बार के मुकाबले 3 ज्यादा हैं. अजित पवार गुट को 9 और शरद पवार गुट को 12 सीटें मिली हैं, जो कि 2017 की संयुक्त NCP (34 सीटें) के मुकाबले बड़ी गिरावट है. ये जीत एकनाथ शिंदे के लिए “गद्दार” के टैग को धोने और खुद को बालासाहेब ठाकरे की विचारधारा का असली उत्तराधिकारी साबित करने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है. शिंदे के लिए यह जीत इसलिए भी अहम है क्योंकि उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी को उनके ही पुराने गढ़ में पूरी तरह अप्रासंगिक बना दिया है. ठाणे को शिवसेना का अभेद्य किला माना जाता है, जिसने पार्टी को उसकी स्थापना के बाद पहली बार सत्ता का स्वाद चखाया था. इस किले को दोबारा फतेह करके एकनाथ शिंदे ने खुद को बाल ठाकरे की वैचारिक विरासत का सच्चा उत्तराधिकारी साबित करने की ओर बड़ा कदम रखा है.

BMC में भी अच्छा प्रदर्शन
वहीं मुंबई में BMC के चुनावों में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का प्रदर्शन काफी संतुलित और रणनीतिक रहा है. मुंबई के सियासी रण में शिंदे की सेना ने 90 सीटों पर चुनाव लड़कर 29 सीटों पर जीत दर्ज की है. हालांकि बीजेपी के मुकाबले उनका स्ट्राइक रेट (32%) कम रहा, लेकिन उन्होंने वर्ली जैसे शिवसेना के पारंपरिक किलों में सेंध लगाकर अपनी ताकत दिखाई, जहाx दत्ता नरवणकर की पत्नी वनिता नरवणकर ने जीत हासिल की.

शिंदे पर आरोप भी लगे
शिंदे ने रणनीतिक रूप से करीब 40 पूर्व पार्षदों को अपने पाले में किया था, जिसका उन्हें कुछ इलाकों में सीधा फायदा मिला. हालांकि, मुंबई में शिंदे के लिए परिवारवाद का मुद्दा एक बड़ी चुनौती बना रहा, क्योंकि उनके द्वारा चुनावी मैदान में उतारे गए कई मौजूदा विधायकों और सांसदों के रिश्तेदार (जैसे राहुल शेवाले की साली और सदा सरवणकर के बेटे-बेटी) चुनाव हार गए.

BMC में शिंदे बने अहम
मुंबई में इन 29 सीटों की अहमियत आंकड़ों से कहीं ज्यादा राजनीतिक है. बीजेपी 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी तो है, लेकिन बहुमत (114) से काफी दूर है. ऐसे में बिना शिंदे के समर्थन के बीजेपी अपना मेयर नहीं बना सकती, जो शिंदे को एक बहुत बड़ी बार्गेनिंग पावर देता है. यह नतीजे साबित करते हैं कि शिंदे ने मुंबई में अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है और वह अब बीजेपी के लिए महज एक सहयोगी नहीं, बल्कि एक अनिवार्य शक्ति बन चुके हैं. आने वाले दिनों में मेयर पद और महत्वपूर्ण समितियों पर नियंत्रण को लेकर शिंदे का पॉवर प्ले मुंबई की राजनीति की दिशा तय करेगा.
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