Meenakshi Natarajan Nomination Case: मध्य प्रदेश से कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा नामांकन के खारिज होने का मामला अब सिर्फ राजनीतिक विवाद नहीं रह गया है. यह मामला अब इस बात की कसौटी बन गया है कि नामांकन पत्रों की जांच करते समय रिटर्निंग ऑफिसर की सीमा क्या है, कौन सी कमी गंभीर मानी जाएगी और क्या इस मामले में संदेह का लाभ उम्मीदवार को दिया जाना चाहिए था. सुप्रीम कोर्ट ने नटराजन की याचिका खारिज करते हुए कहा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद अदालतें सामान्यत: हस्तक्षेप नहीं करतीं. ऐसे मामलों में उपाय संबंधित हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल करना है.
चुनाव याचिका क्या होती है?
चुनाव याचिका वह कानूनी प्रक्रिया है, जिसके जरिए संसद, विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनाव के परिणाम की वैधता की जांच होती है. सरल शब्दों में, यह निर्वाचित उम्मीदवार के चुनाव को कानून के तहत चुनौती देने का वैधानिक तरीका है.
इस पूरे विवाद में सबसे अहम प्रावधान जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 100 है. धारा 100(1)(c) कहती है कि अगर किसी उम्मीदवार का नामांकन अनुचित या गलत तरीके से खारिज किया गया है, तो अदालत निर्वाचित उम्मीदवार का चुनाव शून्य घोषित कर सकती है. यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट से झटका लगने के बावजूद कांग्रेस के पास अब भी एक कानूनी दरवाजा खुला है. वह मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल कर सकती है.

Meenakshi Natarajan Nomination Case: विधानसभा के दस्तावेज हैंडबुक रूल्स
फिलहाल तीनों सीट पर BJP का कब्जा
मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज होने के बाद मध्य प्रदेश की तीनों राज्यसभा सीटों पर BJP उम्मीदवार तरुण चुघ, रजनीश अग्रवाल और महेश केवट निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए जा चुके हैं.
ऐसे शुरू हुआ मीनाक्षी नटराजन का नामांकन विवाद?
विवाद की शुरुआत BJP प्रदेश महामंत्री राहुल कोठारी की रिटर्निंग ऑफिसर के समक्ष दी गई शिकायत से हुई. शिकायत में आरोप लगाया गया कि मीनाक्षी नटराजन का नाम हैदराबाद की एक अदालत में लंबित निजी शिकायत में आरोपी नंबर चार के रूप में दर्ज है और उन्होंने नामांकन के साथ दाखिल फॉर्म 26 में इसकी जानकारी नहीं दी.
लेकिन अब चुनाव आयोग की हैंडबुक और नामांकन जांच से जुड़े दिशा-निर्देश इस विवाद के केंद्र में आ गए हैं.
नामांकन पत्र खारिज करना सामान्य प्रक्रिया नहीं : MP विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव
मध्य प्रदेश विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव भगवंदेव इसरानी, जो छत्तीसगढ़ विधानसभा के सचिव भी रह चुके हैं, चार दशकों से अधिक समय तक विधानसभा की कार्यप्रणाली को करीब से देख चुके हैं. कई चुनाव कराने और कई बार रिटर्निंग ऑफिसर रहने का अनुभव रखने वाले इसरानी कहते हैं कि नामांकन पत्र खारिज करना कोई यांत्रिक या सामान्य प्रक्रिया नहीं होती.
NDTV से इसरानी ने कहा, “एक हैंडबुक दी जाती है जिसमें हर पहलू की विस्तृत जानकारी होती है. जिस निर्णय की बात हो रही है, वह चैप्टर 6 के सेक्शन 10(13) के आधार पर दिया गया, लेकिन मेरे विचार में केवल उसी प्रावधान के आधार पर मामले को देखना गलत था. हलफनामों से संबंधित सेक्शन 12 और 13 आपस में जुड़े हुए हैं और इन्हें साथ पढ़ा जाना चाहिए. नियमों में कहा गया है कि अगर कोई विसंगति दिखती है, तो रिमाइंडर जारी किया जाना चाहिए.”

Meenakshi Natarajan Nomination Case: नियमों पर NDTV से चर्चा करते हुए इसरानी
संबंधित अंश कहता है, “Incomplete affidavits are liable to be rejected leading to rejection of nomination paper on the ground of not filling up all columns in the affidavit even after reminders since the Hon'ble Supreme Court of India has held that the voter has the elementary right to know full particulars of the candidate who is to represent him in the Parliament/Assembly and such right to get information is universally recognized flowing from the concept of democracy and is an integral part of Article 19(1)(a) of the Constitution of India.”
वह हलफनामे की कमियों से जुड़े एक और प्रावधान की ओर इशारा करते हैं. पैरा 10(12) कहता है कि अगर निर्धारित हलफनामा बिल्कुल नहीं भरा गया है, या हलफनामा दाखिल किया गया है लेकिन वह दोषपूर्ण या गलत जानकारी वाला माना गया है, तो सिर्फ इसी आधार पर नामांकन खारिज नहीं किया जाना चाहिए.

Meenakshi Natarajan Nomination Case: जानिए क्या कहते हैं नियम
पूर्व अधिकारी हैंडबुक के पैरा 9(1) का भी हवाला देते हैं, जो रिटर्निंग ऑफिसर को छोटी या तकनीकी कमियों के आधार पर नामांकन खारिज करने से सावधान करता है.
कौन सी गलतियां सबसे अहम थीं?
इसरानी ने कहा, “यहां महत्वपूर्ण गलतियां हैं. अपने 40 साल के करियर में, कई चुनाव कराने और कई बार रिटर्निंग ऑफिसर रहने के दौरान, मैंने अपने पूरे कार्यकाल में एक भी नामांकन पत्र खारिज नहीं किया. पैरा 9(1) कहता है कि किसी भी ऐसे दोष के आधार पर नामांकन पत्र खारिज न करें जो गंभीर प्रकृति का न हो. तकनीकी या लिपिकीय प्रकृति की किसी भी गलती या त्रुटि को नजरअंदाज किया जाना चाहिए.”
वह आगे पैरा 6(6) का हवाला देते हैं, जो नामांकन जांच का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत बताता है. इसके अनुसार हर नामांकन पत्र को तब तक वैध माना जाता है, जब तक इसके विपरीत बात प्रथम दृष्टया स्पष्ट न हो.
इसे आसान भाषा में समझाने के लिए वह रिटर्निंग ऑफिसर की भूमिका की तुलना क्रिकेट के अंपायर से करते हैं.
इसरानी ने कहा, “यह फैसला त्रुटिपूर्ण है. रिटर्निंग ऑफिसर की भूमिका को लेकर बार-बार यह सिद्धांत बताया जाता है कि संदेह का लाभ उम्मीदवार को मिलना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे LBW में संदेह का लाभ बल्लेबाज को मिलता है. हमें हमेशा यह निर्देश मिलता है कि पूरी कोशिश हो कि कोई उम्मीदवार चुनाव प्रक्रिया से बाहर न हो.”
कानूनी पहलू क्या कहता है?
इस मामले का कानूनी पहलू जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 33A से भी जुड़ा है. धारा 33A उम्मीदवार द्वारा आपराधिक पृष्ठभूमि के खुलासे से संबंधित है. व्यापक रूप से, उम्मीदवार को उन मामलों की जानकारी देनी होती है जिनमें वह दो साल या उससे अधिक सजा वाले अपराध में आरोपी हो और सक्षम अदालत द्वारा आरोप तय किए जा चुके हों, या जहां उम्मीदवार को किसी आपराधिक मामले में दोषसिद्ध कर एक साल या उससे अधिक की सजा सुनाई गई हो.
इसरानी द्वारा उठाया गया एक और कानूनी बिंदु भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 223 से जुड़ा है. उनके अनुसार, हैदराबाद मामले में प्राप्त नोटिस धारा 223 के आधार पर था, जिसमें स्वयं यह कहा गया है कि मजिस्ट्रेट आरोपी को सुनवाई का अवसर दिए बिना अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता.
आदेश यह नहीं बताता कि संज्ञान किन आधारों पर लिया गया : इसरानी
इसरानी ने कहा, “भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 223 के आधार पर मिले नोटिस में कहा गया है कि मजिस्ट्रेट आरोपी को सुनवाई का अवसर दिए बिना अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता. फिर भी इस मामले में ऐसा अवसर दिए बिना संज्ञान लिया गया, जबकि आदेश में इसके विपरीत दावा किया गया है. आदेश यह नहीं बताता कि संज्ञान किन आधारों पर लिया गया.” उनका तर्क है कि जब संज्ञान का चरण ही कानूनी रूप से विवादित है, तो उस मामले को नामांकन खारिज करने का स्पष्ट आधार नहीं बनाया जा सकता था.
गुप्ता ने कहा, “केवल यह तथ्य ही दिखाता है कि इस मामले को आपराधिक केस के रूप में बताना तथ्यात्मक और कानूनी दोनों रूप से गलत है.” कांग्रेस का रुख है कि नटराजन को हैदराबाद मामले की जानकारी फॉर्म 26 में देना आवश्यक नहीं था, क्योंकि यह RP Act, 1951 की धारा 33A के तहत खुलासे की श्रेणी में नहीं आता था.
"विनोद गोटिया और विवेक तन्खा के चुनाव में कई कमियां थीं"
इसरानी अपने पुराने अनुभव का भी जिक्र करते हैं, जब राज्यसभा चुनाव में BJP उम्मीदवार विनोद गोटिया और कांग्रेस उम्मीदवार विवेक तन्खा आमने-सामने थे.
इसरानी का कहना है कि अब बचा हुआ एकमात्र कानूनी उपाय चुनाव याचिका है. उन्होंने कहा, “मेरा दृढ़ मत है कि इस स्थिति में उनके पास चुनाव याचिका दाखिल करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. हाईकोर्ट संभवत: जल्दी निर्णय लेगा क्योंकि मामला काफी सीधा है. मुझे लंबी सुनवाई की आवश्यकता नहीं लगती. एक बार जवाब दाखिल हो जाए और सभी पक्षों को जोड़ा जाए, तो मामला अदालत के जरिए ही सुलझेगा. कोई दूसरा विकल्प नहीं है.”
चुनावी प्रक्रिया का BJP कर रही बचाव, कांग्रेस हमलावर
राजनीतिक मोर्चे पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रक्रिया का बचाव किया है और हार के बाद कांग्रेस पर संवैधानिक संस्थाओं पर हमला करने का आरोप लगाया है. इस पूरे मामले पर डॉ. यादव ने दोहराया कि हार के बाद कांग्रेस चुनाव आयोग और न्यायपालिका पर आरोप लगा रही है. पार्टी को अपनी गलतियों पर आत्ममंथन करना चाहिए और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का सम्मान करना चाहिए. उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनावी प्रक्रिया की गंभीरता और पारदर्शिता सर्वोपरि है. उनके अनुसार, यदि कोई उम्मीदवार जानबूझकर महत्वपूर्ण तथ्य छिपाता है, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है.
इसी बीच, एक संबंधित घटनाक्रम में तेलंगाना की वही याचिका, जो मीनाक्षी नटराजन की उम्मीदवारी पर आपत्ति का आधार बनी थी, अब हैदराबाद की नामपल्ली कोर्ट ने अधिकार क्षेत्र के आधार पर वापस कर दी है.
मीनाक्षी नटराजन को तत्काल कोई लाभ नहीं : विवेक तन्खा
शुक्रवार को नामपल्ली की अतिरिक्त मुख्य महानगर दंडाधिकारी अदालत ने AICC प्रभारी मीनाक्षी नटराजन और छह अन्य के खिलाफ दायर याचिका वापस कर दी. अदालत ने कहा कि याचिका में जिन लोगों को प्रतिवादी बनाया गया है, उनमें से चार या तो पूर्व या वर्तमान जनप्रतिनिधि हैं, इसलिए इस अदालत को अधिकार क्षेत्र नहीं है. हालांकि वरिष्ठ सुप्रीम कोर्ट वकील विवेक तन्खा ने सावधान किया है कि इस घटनाक्रम से मीनाक्षी नटराजन को तत्काल कोई लाभ नहीं मिलेगा.
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