जबलपुर: देश भर में आधुनिक खेती की होड़ के बीच मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में हजारों वर्ष पुरानी कृषि परंपरा को पुनर्जीवित करने का प्रयास शुरू हुआ है. मध्य भारत में पहली बार जबलपुर के हर्रई एग्रो एंड नेचर फार्म में हेरिटेज बीज का दर्जा प्राप्त कालीबंगा सिंध बासमती धान की बुआई की गई है. सिंधु घाटी सभ्यता के दौर के इस धान के बीच को बिना किसी उर्वरक, कीटनाशक और रासायनिक खाद के हजारों वर्ष पुरानी परंपरा से तैयार किया जाता है. कालीबंगा सिंध बासमती धान पोषण गुणों से भरपूर है और इसे डायबिटीज के मरीजों के लिए भी लाभकारी माना जाता है.
पोषण गुणों से भरपूर है कालीबंगा सिंध बासमती धान
जबलपुर में पहली बार कालीबंगा सिंध बासमती धान की बुआई कृषि वैज्ञानिकों और ऑर्गेनिक फार्मिंग के विशेषज्ञ की मौजूदगी में हुई. इस उद्देश्य प्राचीन भारतीय कृषि पद्धति और पारंपरिक बीजों को संरक्षित कर नई पीढ़ी तक पहुंचाना है. विशेषज्ञों के अनुसार कालीबंगा सिंध बासमती का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ा माना जाता है, उस दौर में इसी धान की बुआई की जाती थी. विशेष गुणवत्ता और पोषण गुणों के कारण इसकी अपनी अलग पहचान है. विशेषज्ञों का दावा है कि डायबिटीज के मरीज भी यह चावल खा सकते हैं, उनके लिए यह काफी फायदे मंद है.

sindhu ghati sabhyata ka chawal: बिना खाद-कीटनाशक के बीज तैयार होता है. (फोटो- संजीव चौधरी)
अमृत जल का हो रहा उपयोग
ऑर्गेनिक फार्मिंग विशेषज्ञ डॉ स्वाती छाजेड़ ने NDTV से बात करते हुए बताया कि कालीबंगा सिंध बासमती धान की खेती के लिए रासायनिक उर्वरकों की जगह ‘अमृत जल' का उपयोग किया जाता है. जिसे गोबर, गोमूत्र और गुड़ के मिश्रण से तैयार किया जाता है. ट्रिपल-जी फार्मूले पर आधारित इस जैविक घोल से भूमि की उर्वरता बढ़ाने और पौधों की बेहतर वृद्धि में मदद मिलती है.

kalibanga Sindh basmati: पूजा-पाठ के बाद पारंपरिक तरीके से की गई धान की बुआई.
प्राचीन कृषि पद्धति के अनुसार की जा रही रोपाई
कृषि वैज्ञानिक समय श्रीवास्तव NDTV को बताया कि प्राचीन कृषि पद्धति के अनुसार धान के पौधों के बीच पर्याप्त दूरी रखकर रोपाई की जा रही है. इससे पौधों को हवा, पानी और सूर्य का प्रकाश भरपूर मात्रा में मिलता है, जिससे बेहतर अंकुरण, स्वस्थ विकास और अधिक उत्पादन की संभावना बढ़ जाती है.

sindhu ghati sabhyata ka chawal: अमृत जल का उपयोग किया जा रहा उपयोग है.
प्रयोग सफल रहा तो बनेगा मॉडल
हर्राई एग्रो की संचालिका रश्मि गुप्ता ने NDTV से बात करते हुए कहा कि इस अनूठे प्रयोग के माध्यम से जबलपुर में न केवल भारतीय कृषि विरासत को सहेजने का प्रयास किया जा रहा है, बल्कि प्राकृतिक और टिकाऊ खेती को भी बढ़ावा दिया जा रहा है. अगर, यह प्रयोग सफल रहा तो मध्य भारत के किसानों के लिए यह पारंपरिक खेती का एक नया और प्रेरणादायक मॉडल बन सकता है.
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