- छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में दस महीनों में 81,620 क्विंटल धान सूखत और नुकसान के नाम पर गायब हुए हैं.
- अधिकारियों का दावा है कि धान की कमी नमी सूखने, पक्षियों के नुकसान और दीमक लगने के कारण सामान्य है.
- खाद्य विभाग के नियमों के अनुसार दो प्रतिशत से अधिक धान की कमी पर जांच और निलंबन अनिवार्य है.
Chhattisgarh Paddy Scam: छत्तीसगढ़ जिसे गर्व से देश का धान का कटोरा कहा जाता है अब एक ऐसे कटोरे में बदलता दिख रहा है जिसमें धान नहीं टिकता, बस गायब होता है. हर घंटे एक ट्रक भर धान लापता हो रहा है. सरकारी तौर पर बताया जाता है कि उसे चूहे खा रहे हैं, पक्षी चोंच मार ले जा रहे हैं, दीमक चबा रही है और हवा सुखा रही है. लेकिन आंकड़े इशारा करते हैं कि यह सिर्फ प्रकृति की भूख नहीं, बल्कि व्यवस्था की भी भूख है और वह कहीं ज्यादा संगठित है.
अगर सचमुच ऐसा है, तो छत्तीसगढ़ अब देश का “धान का कटोरा” नहीं रहा यह देश का पहला प्राकृतिक संग्रहालय बन गया है, जहां चूहे करोड़ों खाते हैं, पक्षी ट्रक उड़ाते हैं और दीमक विभागीय फाइलें कुतरती है.
81,620 क्विंटल धान गायब
इस तस्वीर का सबसे साफ चेहरा महासमुंद जिले में दिखता है, जहां सरकारी खरीद के आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ दस महीनों में (साल 2024-25 का) 81,620 क्विंटल धान सूखत और नुकसान के नाम पर लिखकर खत्म कर दिया गया. यानी हर घंटे करीब 11 क्विंटल, हर दिन 272 क्विंटल लगभग एक पूरा ट्रक भर धान बिना रुके, दिन-रात गायब. यह नुकसान पांच केंद्रों में फैला है महासमुंद में 25,780 क्विंटल (3.63%), बागबहरा में 18,395 (3.69%), पिथौरा में 6,828 (2.67%), बसना में 13,428 (3.79%) और सरायपाली में 17,188 क्विंटल (3.65%).

अधिकारियों का कहना है कि यह सामान्य है नमी सूखती है, पक्षी खाते हैं, दीमक लगती है. महासमुंद के जिला विपणन अधिकारी अशुतोष कोसरिया कहते हैं, “हमने 2024-25 का धान सामान्य पांच महीने की बजाय लगभग 11 महीने रखा. औसतन पूरे छत्तीसगढ़ में करीब 3.5 प्रतिशत धान सूखत से खराब होता है और महासमुंद में यह 3.57 प्रतिशत है.”
'नमी स्वाभाविक रूप से सूख गई'
वहीं बागबहरा केंद्र के प्रभारी दीपेश पांडे का तर्क और भी तकनीकी है. वे कहते हैं, “धान लंबी अवधि तक रखा गया, इसलिए उसकी नमी स्वाभाविक रूप से सूख गई. पांच महीने बाद सरकारी टीम ने परीक्षण किया था. उस समय मोटा धान, जिसमें एक बोरे का मानक वजन 40 किलो होता है, 37.48 किलो मिला और सरना किस्म 37.45 किलो. रेंडम चेकिंग में खुद माना गया कि पांच महीने में ढाई किलो वजन सूख गया.
जिला स्तरीय समिति खुद इसे तय कर रही है. बरसात में धान आता है, काला तिरपाल और गर्मी नमी खींचते हैं, खुले में भंडारण होता है. 11 महीने धान रुका रहा. उपार्जन केंद्र से हमें 17 प्रतिशत नमी वाला धान मिलता है, जावक के समय 9–10 प्रतिशत रहता है. इस दौरान कुछ खराब होना स्वाभाविक है, फिर दीमक, कीड़े और पक्षी भी हैं. बरसात में बहुत धान नीचे गिरा जो हम उठा नहीं पाए और वह कीचड़ में मिल गया.”
लेकिन जब इसे सरकार के अपने नियमों से मिलाया जाए तो यह तर्क कमजोर पड़ने लगता है. खाद्य, नागरिक आपूर्ति और उपभोक्ता संरक्षण विभाग का 12 सितंबर का आदेश कहता है कि 1 प्रतिशत कमी पर नोटिस, 1 से 2 प्रतिशत पर विभागीय जांच और 2 प्रतिशत से ज़्यादा पर निलंबन, जांच और एफआईआर अनिवार्य है.
इसके बावजूद जिले-दर-जिले तीन प्रतिशत से ज्यादा की कमी को प्राकृतिक कहकर सामान्य बना दिया जा रहा है. NDTV ने इस पर महासमुंद कलेक्टर विनय लांगेह से फोन और मैसेज के जरिए संपर्क करने की कोशिश की, तो उन्होंने कहा संबंधित अधिकारियों से बात करके वो इस बारे में पूरी जानकारी दे पाएंगे.
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पहले भी आ चुकी है लापरवाही
इस लापरवाही का खतरा पहले ही कवर्धा में सामने आ चुका है, जहां 26,000 क्विंटल धान की कमी (लगभग 7 करोड़ रुपये) दो केंद्रों में पाई गई थी. पहले कहा गया कि चूहे और कीड़े खा गए. जांच हुई तो फर्जी एंट्री, फर्जी बिल, फर्जी मजदूर उपस्थिति और सीसीटीवी से छेड़छाड़ सामने आई. केंद्र प्रभारी को हटाना पड़ा.
अब जशपुर में और भी गंभीर मामला सामने आया है. 2024-25 के खरीफ सीजन में 6.55 करोड़ रुपये की अनियमितता पकड़ी गई. रिकॉर्ड में 1,61,250 क्विंटल धान खरीदा दिखाया गया, लेकिन मिलों और गोदामों में पहुंचा केवल 1,40,663 क्विंटल. 20,586 क्विंटल का अंतर जिसकी कीमत 6.38 करोड़ रुपये बैठती है. साथ में 4,898 बोरे भी गायब, जिनकी कीमत करीब 17 लाख है. कुल नुकसान, 6.55 करोड़.

करोड़ों रुपये की धान गायब कर रहे चूहे-पक्षी
अब “चूहे और पक्षी” वाला तर्क मजाक सा लगने लगता है. अगर एक जिले में चूहे 7 करोड़ का धान खा रहे हैं, दूसरे में दीमक 6 करोड़ चबा रही है और महासमुंद में पक्षी हर घंटे ट्रक भर उड़ाकर ले जा रहे हैं, तो छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े उपभोक्ता अब किसान नहीं, बल्कि अदृश्य और बेहद कुशल प्राणी हैं.
यह सब उस समय हो रहा है जब सरकार अपनी रिकॉर्ड खरीद पर गर्व कर रही है. 14 नवंबर 2025 से अब तक 93.12 लाख मीट्रिक टन धान 16.95 लाख किसानों से खरीदा गया है और 20,753 करोड़ रुपये सीधे खातों में डाले गए हैं, 2,740 केंद्रों के जरिये. पैमाना बड़ा है, जवाबदेही छोटी.
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खाद्य मंत्री ने नहीं दिया जवाब
हमने इस मामले पर खाद्य मंत्री दयालदास बघेल से भी संपर्क किया. पहले उन्होंने फोन नहीं उठाया, बाद में सवाल सुनते ही “कार्यक्रम में हूं” कहकर कॉल काट दिया. अब सवाल यह नहीं रह गया कि कितना धान खरीदा गया, बल्कि यह है कि उसमें से कितना सच में मिलों, राशन दुकानों और लोगों तक पहुंचा और कितना एक्सेल शीट, गोदामों और खामोशी के बीच गुम हो गया. अगर इसका जवाब नहीं मिला, तो धान का कटोरा जल्द ही ऐसा कटोरा बन जाएगा जिसमें धान नहीं, सिर्फ सवाल भरेंगे और पेट सिर्फ चूहों का भरेगा.
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