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Bilaspur Nasbandikand: बिलासपुर नसबंदी कांड के गुनहगारों को 12 साल बाद मिली सजा, सर्जन अब 'जेल में पीसेंगे चक्की'

Bilaspur news: दरअसल, नवंबर 2014 में सकरी क्षेत्र के नेमिचंद्र जैन अस्पताल सहित पेंडारी और पेंड्रा में सरकारी नसबंदी शिविर आयोजित किए गए थे. इन शिविरों में बड़ी संख्या में महिलाओं की नसबंदी की गई थी, लेकिन ऑपरेशन के बाद कई महिलाओं की तबीयत बिगड़ गई थी, जिसके चलते 100 से ज्यादा महिलाओं को सिम्स, जिला अस्पताल और निजी अस्पतालों में भर्ती कराया गया था. इस घटना में 15 महिलाओं की मौत हो गई थी, जिससे प्रदेशभर में हड़कंप मच गया था.

Bilaspur Nasbandikand: बिलासपुर नसबंदी कांड के गुनहगारों को 12 साल बाद मिली सजा, सर्जन अब 'जेल में पीसेंगे चक्की'

Bilaspur Nasbandi Case: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर का बहुचर्चित नसबंदी कांड में लंबी सुनवाई के बाद जिला अदालत ने अहम फैसला सुनाया. एडीजे की कोर्ट के न्यायाधीश शैलेश कुमार ने सर्जन इस मामले से जुड़े डॉ. आरके गुप्ता को गैर इरादतन हत्या का दोषी मानते हुए 2 साल की सजा और 25 हजार रुपये जुर्माना लगाया है. कोर्ट ने अपने फैसले में माना कि कम समय में अत्यधिक ऑपरेशन किए जाने और लापरवाही बरतने के कारण यह गंभीर घटना हुई थी. साथ ही धारा 337 के तहत 6 महीने की सजा और 500 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है. इसके अलावा एक अन्य धारा में एक महीने की सजा भी सुनाई गई है.

राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा था मामला

यह मामला उस समय देशभर में सुर्खियों में रहा था. घटना के बाद कई बड़े नेता बिलासपुर पहुंचे थे और पीड़ित परिवारों से मुलाकात की थी, जिससे यह मुद्दा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो गया था.

2014 में हुई थी दर्दनाक घटना

नवंबर 2014 में सकरी क्षेत्र के नेमिचंद्र जैन अस्पताल सहित पेंडारी और पेंड्रा में सरकारी नसबंदी शिविर आयोजित किए गए थे. इन शिविरों में बड़ी संख्या में महिलाओं की नसबंदी की गई थी, लेकिन ऑपरेशन के बाद कई महिलाओं की तबीयत बिगड़ गई थी, जिसके चलते 100 से ज्यादा महिलाओं को सिम्स, जिला अस्पताल और निजी अस्पतालों में भर्ती कराया गया था. इस घटना में 15 महिलाओं की मौत हो गई थी, जिससे प्रदेशभर में हड़कंप मच गया था.

दवा और प्रबंधन पर भी उठे थे सवाल

घटना के बाद ऑपरेशन में लापरवाही के साथ-साथ दवाओं की गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हुए थे,जांच में जिंक फास्फाइड जैसे जहरीले तत्व मिलने की आशंका जताई गई थी.


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मामले में दवा सप्लाई से जुड़े महावर फार्मा और कविता फार्मास्यूटिकल्स के संचालकों सहित पांच आरोपियों रमेश महावर, सुमित महावर, राकेश खरे, राजेश खरे और मनीष खरे को अदालत ने पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के कारण बरी कर दिया. करीब 12 साल बाद आए इस फैसले ने एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था और लापरवाही के मुद्दे पर सवाल खड़े कर दिए हैं. यह मामला आज भी प्रशासनिक जिम्मेदारी और मेडिकल प्रोटोकॉल पर बड़ी सीख के रूप में देखा जा रहा है.

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