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This Article is From Jan 17, 2026

12 साल बाद उत्तराखंड में होने जा रही 280 किमी की दुर्गम राजजात यात्रा, चार सींग वाला मेढ़ा करता है अगुवाई

उत्तराखंड में हिमालय की एक ऐसी पर्वतीय यात्रा होती है जिसकी अगुवाई चार सींग वाला मेढ़ा या भेड़ा करता है. यही नहीं इस यात्रा में शामिल होने के लिए लोगों को 12 साल का लंबा इंतजार भी करना पड़ता है. ये उत्तराखंड ही नहीं बल्कि एशिया की सबसे प्राचीनतम यात्रा कही जाती है जिसकी शुरुआत 8वीं शताब्दी में हुई थी.

12 साल बाद उत्तराखंड में होने जा रही 280 किमी की दुर्गम राजजात यात्रा, चार सींग वाला मेढ़ा करता है अगुवाई
यात्रा के दौरान बंदिशें ये हैं कि तेज आवाज न करें और प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठाकर ये यात्रा करनी होती है.

Rajjat Yatra 2026 : उत्तराखंड की पावन धरती पर 12 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर एशिया की सबसे प्राचीन और दुर्गम सांस्कृतिक यात्रा 'राज जात यात्रा' का आयोजन होने जा रहा है. 8वीं शताब्दी से चली आ रही यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि हिमालयी संस्कृति और प्रकृति के अटूट मेल की मिसाल भी है.

चार सींग वाला भेड़ा करता है अगुवाई

इस यात्रा की सबसे खास बात यह है कि इसकी अगुवाई चार सींग वाला मेढ़ा या भेड़ा करता है. यही नहीं  इस यात्रा में शामिल होने के लिए लोगों को 12 साल का लंबा इंतजार भी करना पड़ता है. 280 किमी की ये दुर्गम राजजात यात्रा में उत्तराखंड ही नहीं बल्कि दूर-दूर से लोग शामिल होते हैं. राजजात यात्रा में चार सींग वाले अदभुत भेड़ा का विशेष महत्व है. 

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मान्यता ये है कि कुंवरों के गांव के आसपास चार सींग वाले मेढ़ा जन्म लेता है उसी साल से राजजात यात्रा की तैयारी शुरु हो जाती है. उत्तराखंड में 12 साल बाद इस साल होने वाली होने वाली राज जात यात्रा पर 'प्रकृति पथ-नंदा पथ' नाम की सर्वेश उनियाल और हरीश भट्ट ने एक किताब लिखी है, जिसका विमोचन पुस्तक मेले में किया गया.

इस किताब में फोटो समेत नन्दा राजजात यात्रा के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है.किताब के लेखक सर्वेश उनियाल खुद भी इस यात्रा में भाग ले चुके हैं उनके मुताबिक 2026 में ये यात्रा 12 साल बाद होनी है बसंत पंचमी के दौरान निश्चित तारीख़ पता चलेगी लेकिन आमतौर पर अगस्त सितंबर में ये यात्रा होनी है.

हिमालय की दुर्गम यात्रा नन्दा राजजात क्या है ? 

नन्दा जात गढ़वाल की एक उत्सव परंपरा है..ये चमोली के नौटी गांव से शुरु होती है और 280 किमी की हिमालय की दुर्गम यात्रा, घाटियों और पर्वतमालाओं से गुजरती हुई त्रिशूल पर्वत के पास होम कुंड में पूजा अर्चना के बाद नौटी वापस लौट आती है. इस यात्रा में नन्दा देवी की 240 से ज्यादा डोलियां और प्रतिमा जात शामिल होती है.

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मान्यता है कि नन्दा देवी का भगवान शंकर से से विवाह हुआ था नन्दा राजजात नन्दा देवी के ससुराल भेजने की धार्मिक परंपरा है. नौवीं शताब्दी के राजा कनकपाल के सपने में देवी ने शिवधाम जाने की इच्छा प्रकट की तब पहली बार राज जात का अनुष्ठान किया गया.

डाक्टर सर्वेश उनियाल की किताब प्रकृति पथ नन्दा पंथ में लिखते हैं कि कन्नौज के राजा यशधवल ने भी 14 शताब्दी में राज जात की यात्रा की थी

राजजात का आध्यात्मिक मार्ग 

राजजात यात्रा दुर्गम हिमालय पर्वत में शुरु होती है. ये यात्रा नौटी से शुरु होती है और कासुंवा, कोटी, नंद केसरी ,गैरोल पाताल जैसे 20 जगहों से गुजरती है. नंदा नगर की 25 किमी और नौटी की 60 किमी की दूरी बस से तय करने के अलावा सभी रास्ते पैदल ही जाना पड़ता है. इस यात्रा को पूरा करने में करीब 20 दिन का वक्त लगता है. 

यात्रा के दौरान बंदिशें ये हैं कि तेज आवाज न करें और प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठाकर ये यात्रा करनी होती है.

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