सोचिए, सदी के महानायक अमिताभ बच्चन जिनके सामने आ जाएं, तो किसी के भी हाथ कांप जाएं. लेकिन एक दिन ऐसा भी आया जब खुद अमिताभ बच्चन मंच पर एक महिला के सामने नतमस्तक हो गए, उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया. आखिर कौन थीं वो महिला? ऐसा क्या कर दिखाया था उन्होंने? आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं महाराष्ट्र की 'माई' यानी सिंधुताई सपकाल की वो दास्तान, जो रूह कंपा देने वाले अंधेरों से शुरू होकर हजारों अनाथ बच्चों की जिंदगी में उजाला भरने की सबसे बड़ी मिसाल बन गई. यह एक ऐसी मां की कहानी है जिसने दुनिया से ठुकराए बच्चों को ही नहीं, वक्त आने पर अपने गुनहगार पति को भी एक बच्चे की तरह गोद ले लिया.

बचपन का संघर्ष और 9 महीने के गर्भ पर लात
कहानी शुरू होती है आजादी के ठीक बाद, 1948 में महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव से. सिंधुताई को पढ़ने-लिखने का जबरदस्त शौक था. लेकिन घर में गरीबी का यह आलम था कि स्लेट खरीदने तक के पैसे नहीं थे. वो पेड़ों के पत्तों पर लिखकर पढ़ाई करती थीं. मगर पहाड़ जैसी बंदिशों के आगे उनका यह सपना टूट गया.
उस दौर की कुप्रथा के चलते महज 11 साल की कच्ची उम्र में उनकी शादी 30 साल के एक शख्स से कर दी गई. 20 साल की होते-होते वो तीन बच्चों की मां बन चुकी थीं. लेकिन असली जुल्म तब हुआ जब वो चौथी बार 9 महीने की गर्भवती थीं.
गांव के दबंगों की फैलाई एक घिनौनी अफवाह पर भरोसा करके उनके पति ने इंसानियत की सारी हदें पार कर दीं. बेरहम पति ने उनके पेट पर इतनी जोर से लातें मारीं कि सिंधुताई बेसुध होकर गिर पड़ीं. इसके बाद उन्हें घसीटकर गाय-बैलों के बाड़े में मरने के लिए फेंक दिया गया.
उसी अधमरी और बेहोशी की हालत में सिंधुताई ने एक बच्ची को जन्म दिया. कहते हैं, जब इंसान को दुनिया छोड़ देती है तो कुदरत सहारा बनती है. बाड़े में खड़ी एक गाय ने अपनी ममता दिखाई और इस तरह खड़ी हो गई कि कोई दूसरा जानवर उस बेबस मां और नवजात बच्ची को कुचल न दे.

जब जिंदा इंसानों से डर लगा, तो श्मशान को बनाया आशियाना
होश आने पर पत्थर से अपनी बच्ची की नाल काटी और वह बेसहारा मां दर-दर भटकने लगी. अपने मायके पहुंची तो मां-बाप ने भी दरवाजे बंद कर लिए.
अब जिंदा रहने का एक ही सहारा था- रेलवे स्टेशनों पर भीख मांगना. लेकिन रात की दरिंदगी से अपनी और अपनी बच्ची की आबरू कैसे बचाई जाए? तब सिंधुताई ने रात गुजारने के लिए चुना- श्मशान घाट. उनका मानना था कि रात के अंधेरे में श्मशान में कोई इंसान नहीं आता. उस दौर में उन्हें मुर्दों और भूतों से नहीं, बल्कि जिंदा इंसानों की नीयत से डर लगता था.
जब भूख से जब आंतें कुलकुलातीं, तो मुर्दे की जलती चिता के अंगारों पर आटा गूंथकर रोटियां सेंकती थीं. तबेले में गाय-भैंसों के बीच रातें गुजारीं. वो कहती थीं, "इंसानों ने तो मुझे दुत्कार दिया था, लेकिन उन बेजुबान जानवरों ने मेरी बच्ची को ममता की छांव दी."
सड़क के अनाथों से बना '1500 बच्चों का परिवार'
एक दिन स्टेशन पर भीख मांगते वक्त उनकी नजर एक रोते हुए बेसहारा बच्चे पर पड़ी. सिंधुताई ने सोचा- "यह दर्द क्या होता है, मुझसे बेहतर कौन जानेगा?" उन्होंने उस बच्चे को अपनी गोद में उठा लिया.
बस, यहीं से शुरू हुआ एक चमत्कारी सफर. जो भी लावारिस बच्चा मिलता, माई उसे अपनी ममता के आंचल में समेट लेतीं. खुद भूखी रहकर भीख मांगतीं, लेकिन उन बच्चों का पेट भरतीं और पैसे बचा-बचाकर उनकी पढ़ाई का इंतजाम करतीं.
धीरे-धीरे दानदाताओं और लोगों की मदद से माई ने महाराष्ट्र में 6 बड़े अनाथालय खड़े कर दिए. जहां सरकारी अनाथालय 18 साल की उम्र के बाद बच्चों को छोड़ देते हैं, वहीं माई का नियम अलग था- जब तक बच्चा अपने पैरों पर खड़ा होकर नौकरी न पा ले, शादी न कर ले, तब तक वो माई की ही जिम्मेदारी रहेगा.
जो लड़की 11 साल की उम्र में बेसहारा छोड़ दी गई थी, आगे चलकर वो 1500 से ज्यादा बच्चों की मां बनीं. उनके पाले हुए बच्चे आज डॉक्टर, इंजीनियर, वकील और बड़े अफसर हैं. उनके परिवार में 250 से ज्यादा दामाद और 50 बहुएं हैं.
पति को माफ करके 'बेटा' बनाया
जब सिंधुताई का नाम पूरे देश में गूंजने लगा, तो बुढ़ापे की चौखट पर लाचार होकर वही पति उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया, जिसने उन्हें पेट पर लात मारकर बाड़े में फेंक दिया था.
सोचिए, उस वक्त उस औरत के दिल पर क्या गुजरी होगी? लेकिन सिंधुताई ने जो किया, वह सिर्फ एक फरिश्ता ही कर सकता है. उन्होंने अपने पति को माफ कर दिया, लेकिन एक अनोखी शर्त रखी. माई ने कहा, "मैं तुम्हें माफ करती हूं. लेकिन अब तुम मेरे पति बनकर मेरे पास नहीं रह सकते, क्योंकि मैं अब सिर्फ एक मां हूं. अगर तुम्हें मेरे पास रहना है, तो मेरे बाकी अनाथ बच्चों की तरह मेरा सबसे बड़ा बेटा बनकर रहना होगा." और उन्होंने अपने ही पति को अपने अनाथालय में एक बेटे की तरह पनाह दी.
750 से ज्यादा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मान
जिस महिला को समाज ने कूड़े की तरह फेंक दिया था, उन्हें देश के 4 अलग-अलग राष्ट्रपतियों ने राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा. उन्हें 'पद्मश्री' समेत 750 से ज्यादा पुरस्कार मिले. हर अवॉर्ड के साथ मिले पैसों को उन्होंने कभी अपने लिए इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि अनाथालयों और बच्चों के भविष्य पर न्योछावर कर दिया.

लोग अक्सर कहते हैं कि जब हमारे पास बहुत पैसा होगा, तब हम दूसरों की मदद करेंगे. लेकिन सिंधुताई की जिंदगी एक कड़ा सबक सिखाती है- दूसरों का दर्द बांटने के लिए जेब में पैसा नहीं, सीने में बड़ा दिल होना चाहिए.
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